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सैन्य कार्रवाई पर सवाल उठाना राष्ट्र हित में नहीं

सजिर्कल स्ट्राइक को लेकर देश में सियासत होना बताता है कि हमारी राजनीति का स्तर कितना नीचे गिर गया है।

सैन्य कार्रवाई पर सवाल उठाना राष्ट्र हित में नहीं
सजिर्कल स्ट्राइक को लेकर देश में सियासत होना बताता है कि हमारी राजनीति का स्तर कितना नीचे गिर गया है। देश की आन-बान-शान के लिए अपनी जान न्योछावर करने वाली हमारी सेना की कार्रवाई को सवाल के बहाने कटघरे में खड़ा करने वालों को जरा भी अंदाजा नहीं है कि वे संदेह करके किस कदर सेना के मनोबल को तोड़ रहे हैं। जब सेना ने खुद देश को बताया है कि हमने पीओके में आतंकी ठिकानों पर सजिर्कल स्ट्राइक की, उसके बाद कुछ नेताओं का शक जाहिर करते हुए सरकार से सबूत मांगना जाहिर करता है कि उनका सेना पर भरोसा नहीं है।
ऐसे नेताओं की अनुभवहीनता, सतही समझ और राष्ट्र के मसले को भी सियासी चश्मे से देखने की प्रवृत्ति के चलते देश की छवि को धक्का लगता है। इस समय जरूरत हमें राजनीतिक एकजुटता दिखाने की थी। उसमें भी जब पाक पहले दिन से नकार रहा है कि पीओके में कोई सजिर्कल स्ट्राइक नहीं हुई है और वह इंटरनेशनल मीडिया को पीओके ले जाकर बरगलाने की कोशिश कर रहा है, उस परिस्थति में भारत से ही अपनी इस स्ट्राइक पर संदेह जताया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है।
इससे हमारे विरोधी को अपने प्रोपेगैंडा में और शह ही मिलता है। पाक 1947 से ही भारत के खिलाफ जहर उगल रहा है, दुष्प्रचार कर रहा है। ऐसे में नेताओं को इतनी समझ तो होनी चाहिए कि कोई भी देश अपने सैन्य अभियान को गुप्त रखता है। आतंकी ओसामा बिन लादेन को पाक के एबटाबाद में मारने के अपने सैन्य अभियान को भी अमेरिकी सेना पेंटागन ने गुप्त रखा था। सेना पर सवाल उठाने वालों यह भी देखना चाहिए कि अगर सजिर्कल स्ट्राइक नहीं हुई, तो पाकिस्तान क्यों लगातार हाईलेवल की मीटिंगें कर रहा है?
पाक सेना प्रमुख जनरल राहिल शरीफ वार रूम का जायजा क्यों ले रहे हैं? पाक पीएम नवाज शरीफ और उनके मंत्री क्यों भारत को युद्ध की धमकियां दे रहे हैं, नवाज सरकार ने क्यों संसद का संयुक्त अधिवेशन आहूत किया है? वह बार-बार यूएन में कश्मीर का राग क्यों आलाप रहा है? जबकि सजिर्कल स्ट्राइक के बाद भारत को विश्व समुदायों से सर्मथन मिल रहा है। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, र्जमनी, जापान, रूस, ईयू आदि देश खुलकर भारत के साथ खड़े हैं। रूस और फ्रांस ने आतंकवाद प्रायोजित के लिए खुल कर पाक का नाम लिया।
र्जमनी ने कहा कि हर देश को अपनी आत्मरक्षा का अधिकार है। इस मसले पर चीन ने भी पाक का साथ नहीं दिया। संयुक्त राष्ट्र ने भी पाक की मांग पर कश्मीर मुद्दे को अपने एजेंडे में शामिल नहीं किया। अमेरिका के व्हाइट हाउस में पाक को आतंकवाद प्रायोजित देश घोषित करने के लिए जारी ऑनलाइन वोटिंग में छह लाख से अधिक वोटरों ने पाक को आतंकी देश घोषित करने के पक्ष में अपना मत दिया, जबकि सीमा केवल पांच लाख की रखी गई थी।
सवाल है कि देश में कुछ लोगों को सजिर्कल स्ट्राइक के सबूत मांगने की इतनी जल्दी क्यों है? सेना ने स्वयं इसके सबूत सरकार को सौंपे हैं। अब सरकार पर निर्भर करेगा कि वह जारी करती है या नहीं? या फिर वह कितना अंश जारी करती है और कब जारी करती है। कुछ मीडिया रिपोटरें में भी सजिर्कल स्ट्राइक की स्थानीय लोगों ने पुष्टि की है। ऐसे में सबूत मांगने वाले नेताओं को कम से कम अपनी सरकार पर भरोसा करना चाहिए।
सरकार के मंत्रियों और सत्ताधारी दलों के नेताओं को भी सजिर्कल स्ट्राइक के बाद बेवजह अपनी पीठ थपथपाने से बचना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रियों को ठीक ही निर्देश दिया है कि गैरजरूरी बयानबाजी से बचें। भाजपा के नेताओं को भी बोलने में संयम बरतना चाहिए और भड़काने वाले पोस्टरों व संवादों से बचना चाहिए। इस समय हमें आपस में नहीं, आतंकवाद के खिलाफ लड़ना चाहिए।
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