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अवधेश कुमार का लेख : चोट और चंडी पाठ की राजनीति

ममता 34 प्रतिशत मुस्लिम वोट के कारण यहां आई हैं तो हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण उनके खिलाफ हो सकता है। इसका असर प्रदेश के अन्य जगहों भी हो सकता है, इसलिए उन्होंने नंदीग्राम में मंच से चंडी पाठ किया। यह कहा कि मैं ब्राह्मण हूं, प्रतिदिन चंडी पाठ करके घर से निकलती हूं, कोई मुझे हिंदुत्व न सिखाए। अस्पताल से बाहर आने के बाद ह्वीलचेयर के साथ अपनी हर सभा में वो हिंदू और हिंदुत्व की व्याख्या करती हैं। इस तरह चंडीपाठ से चोट तक की उनकी राजनीति और रणनीति आसानी से समझ में आ जाती है।

अवधेश कुमार का लेख :  चोट और चंडी पाठ की राजनीति
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प्रतीकात्मक तस्वीर

अवधेश कुमार

ममता बनर्जी के चोटिल होने से लेकर अस्पताल पहुंचने और बाहर आने की तस्वीरें बार-बार देश देख रहा है। निश्चित रूप से यह ममता एवं तृणमूल कांग्रेस की रणनीति के अनुरूप है। चोटिल या घायल होने वाले के प्रति आम लोगों की स्वाभाविक सहानुभूति होती है। राजनीति में घायल करने का आरोप यदि प्रतिस्पर्धी पर लग जाए तो समर्थक ज्यादा आवेग से नेताओं के इर्द-गिर्द खड़े हो जाते हैं। आप तृणमूल कार्यकर्ताओं और समर्थकों के एक वर्ग की आक्रामकता देख सकते हैं। तो क्या मान लिया जाए कि नंदीग्राम में घायल होने के बाद मतदान करते समय ममता और तृणमूल कांग्रेस के प्रति आमजन और समर्थकों की प्रतिक्रिया ऐसी ही होगी? इसमें दो राय नहीं कि ममता को चोट लगी।

उन्होंने रणनीति के तहत लोगों की सहानुभूति पाने तथा अपने कार्यकर्ताओं को भाजपा के खिलाफ आक्रामक करने के लिए इसका उपयोग भी किया है। बयान दे दिया कि उन पर चार-पांच लोगों ने हमला किया। वहां से कोलकाता अस्पताल जाते, अंदर बिस्तर पर सिर, पैरों पर प्लास्टर के साथ बीमार अवस्था में लेटी, डॉक्टरों द्वारा देखभाल किए जाते और फिर ह्वीलचेयर पर बाहर निकलती तस्वीरें अपने-आप जारी नहीं हुईं। इसके साथ उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों की अपील वाला अपना एक वीडियो संदेश भी जारी किया। अस्पताल से बाहर होने के पहले उन्होंने बयान दिया कि उन्हें चोट लगी है, लेकिन चुनाव अभियान में अपना सारा कार्यक्रम पूरा करेंगी। व्हीलचेयर पर उन्होंने चुनाव प्रचार आरंभ भी कर दिया। इससे पार्टी के नेताओं और घनघोर समर्थकों को लगता है कि ममता अब भाजपा के मुकाबले पहले से ज्यादा बेहतर स्थिति में है।

इसका दूसरा पक्ष भी है। जिस तरह उन्होंने उसका राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश की उसके संदेश उल्टे भी जा सकते हैं। आयोग ने ममता के सुरक्षा निदेशक, स्थानीय पुलिस अधीक्षक को निलंबित तथा जिलाधिकारी सह जिला चुनाव अधिकारी का तबादला अवश्य किया है, किंतु उसके कारण अलग हैं। आयोग ने माना उनकी सुरक्षा जिम्मेदारी संभाल रहे अधिकारियों को गैर बुलेटप्रुफ या बख्तरबंदविहीन गाड़ी का इस्तेमाल तथा सुरक्षा को खतरा पहुंचाने वाले व्यवहार उन्हें नहीं करने देना चाहिए था। पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट में किसी तरह के हमले को नकारा गया है। जनता इसे मानेगी या ममता और तृणमूल के आरोपों को? इसके पूर्व पश्चिम बंगाल पुलिस की रिपोर्ट भी यही कह रही है। टीवी चैनलों ने उनके रोड शो से लेकर दुर्घटनाग्रस्त होने तक के वीडियो के एक-एक अंश को दिखाया और विश्लेषित किया है। उसमें दिख रहा है कि चोट लगने के तुरंत बाद वो गाड़ी की अगली सीट पर पालथी लगाकर बैठी हैं। जैसे ही मीडिया आती है उनका पैर नीचे हो जाता है। इसके पहले गाड़ी के धीरे-धीरे आगे बढ़ने, भीड़ के उनके निकट आने की कोशिशें, उसमें ममता का दरवाजा खोलकर एक पैर दरवाजा और एक अंदर रखकर खड़ा होना, दो पिलरों का सामने आ जाना... ये सारे दृश्य लोगों ने देखे हैं। गाड़ी चाहे जितनी धीमी गति में हो दरवाजे पर खड़ा होना हमेशा जोखिम भरा होता है। इसमें दुर्घटना की संभावना पूरी तरह मौजूद रहती है। किसी वीडियो में हमला का छोटा अंश भी नजर नहीं आया है। स्थानीय लोग बता रहे हैं कि सामने पिलर आ गए जिनसे दरवाजा टकराया या टकराने वाला था कि अचानक बंद हुआ और उसमें उनको चोट लग गई। सच यही है।

किंतु ममता के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस ने एक स्वर में इसे भाजपा का हमला करार देना शुरू कर दिया। प्रधानमंत्री के ब्रिगेड मैदान में दिए गए भाषण को उद्धृत करके साबित करने की कोशिश की गई कि उन पर हमले की योजना बड़े स्तर पर बनी थी। कल्पना भी नहीं की जा सकती कि प्रधानमंत्री के स्तर पर हमले की साजिश रची जाएगी। प. बंगाल की विरोधी पार्टियों ने भी ममता के आरोपों को नकार दिया। जिस तरह तृणमूल कांग्रेस ने चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा किया उसका भी संदेश नकारात्मक गया है। चुनाव आयोग ने कठोर शब्दों में न केवल प्रतिवाद किया बल्कि तृणमूल के रवैये की आलोचना भी की। ममता के चोटिल होने की खबर आने के तुरंत बाद चुनाव आयोग ने प्रदेश पुलिस से रिपोर्ट मांगी। तृणमूल का यह आरोप गलत साबित हुआ कि ममता के कार्यक्रम के समय वहां पर्याप्त मात्रा में पुलिसकर्मी मौजूद नहीं थे। मुख्यमंत्री के नाते वो भारी सुरक्षा घेरे में चलती हैं। इस प्रकार ममता बनर्जी पर हमले की बात किसी के गले नहीं उतरती।

प्रश्न है कि आखिर ममता ने ऐसा क्यों किया होगा? आज पूरे बंगाल की तरह नंदीग्राम की लड़ाई भी एकतरफा नजर नहीं आ रही। जब शुभेंदु अधिकारी के भाजपा में जाने के बाद उन्होंने नंदीग्राम से लड़ने की घोषणा की तो ऐसा लगा कि चुनाव उनकी तरफ एकपक्षीय होगा। करीब 34 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता उनके लिए एकमुश्त मतदान करेंगे, किंतु धीरे-धीरे साफ हुआ कि शुभेंदु वहां बिल्कुल कमजोर उम्मीदवार नहीं है। नंदीग्राम संघर्ष में वे अगुवा और ममता के साथी थे। स्थानीय लोगों पर उनकी पकड़ गहरी है। ममता सरकार में तीन मंत्रालय संभालने वाला छोटे कद का व्यक्ति नहीं हो सकता। इसी तरह संपूर्ण पश्चिम बंगाल में भी आज की स्थिति में स्वय तृणमूल कांग्रेस को विजय की राह आसान नहीं दिख रही। दूसरी ओर कांग्रेस, वामदल और आईएसएफ गठबंधन भी उनके लिए सिरदर्द बन गया है। माकपा ने नीति के तहत युवा उम्मीदवारों को प्रमुखता दिया है। कुछ सीटों पर लड़ाई त्रिकोणीय हो गई है। 28 फरवरी को ब्रिगेड मैदान रैली में जितनी संख्या में लोग आए उसकी उम्मीद कांग्रेस और वामदलों ने भी नहीं की थी। इसमें मुस्लिम समुदाय की उपस्थिति अच्छी खासी थी। ममता और तृणमूल के रणनीतिकारों की चिंता इससे भी बढ़ी है। इस गठबंधन की रणनीति है कि विधानसभा में किसी दल को बहुमत न आए और उन्हें इतनी सीटें मिलें जिससे भविष्य की सरकार बनाने में उनकी भूमिका हो सके। यह मोर्चा भाजपा का वोट कम ही काटेगा। ज्यादा ममता के हिस्से का वोट इसके खाते जाएगा।

शुभेंदु अधिकारी ने ममता से अलग होने के बाद स्वयं को बेहतर प्रशासक, विकास के प्रति समर्पित होने के साथ एक बड़े हिंदू चेहरे के रूप में स्थापित करने की रणनीति अपनाया है। ममता भाजपा के दबाव में पहले से ही स्वयं को निष्ठावान हिंदू साबित करने की कोशिश कर रहीं हैं। नंदीग्राम में भी डर पैदा हुआ है कि अगर भाजपा का यह प्रचार लोगों तक पहुंच गया कि ममता 34 प्रतिशत मुस्लिम वोट के कारण यहां आई हैं तो हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण उनके खिलाफ हो सकता है। इसका असर प्रदेश के अन्य जगहों भी हो सकता है, इसलिए उन्होंने नंदीग्राम में मंच से चंडी पाठ किया। यह कहा कि मैं ब्राह्मण हूं, प्रतिदिन चंडी पाठ करके घर से निकलती हूं, कोई मुझे हिंदुत्व न सिखाएं। अस्पताल से बाहर आने के बाद ह्वीलचेयर के साथ अपनी हर सभा में वो हिंदू और हिंदुत्व की व्याख्या करती हैं। इस तरह चंडीपाठ से चोट तक की उनकी राजनीति और रणनीति आसानी से समझ में आ जाती है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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