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डॉ़ चंद्र त्रिखा का लेख : किसान पर भी राजनीति

लगभग 52 प्रतिशत परिवार रोटी-रोजी के लिए गांव और खेती से जुड़े हैं। किसानों (Farmers) की संख्या का सही आंकड़ा तो आसान नहीं, मगर किसान संगठन बताते हैं कि खेती-मजदूरों व मंडियों के कारिंदों को मिला लें तो लगभग 62 करोड़ लोग खेती पर निर्भर हैं।

डॉ़ चंद्र त्रिखा का लेख : किसान पर भी राजनीति
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किसानों की चर्चा अब शिखर पर है। शुक्र है देश कंगना, कोकीन और रिया-सुशांत सरीखी बहसों से बाहर आया। ऊबाऊ हो गई थीं ये कवायदें। अब एक बार फिर बातें क से किसान, ख से खेेत और ग से गेहूं पर केंद्रित हो गई हैं। बलराज साहनी की दो बीघा जमीन प्रेमचंद (Prem chand) का गोदान और फणीश्वर नाथ रेणु का मैला आंचल याद आ रहा है। आज के हालात में भी गोदान के होरी का गोदान नहीं हो पा रहा। एक लम्बे समय में किसानों की आत्महत्याओं का सिलसिला भी थमा नहीं है।

चलिए थोड़ा आंकड़ों पर नज़र डाल लें। इस समय भी लगभग 52 प्रतिशत परिवार रोटी-रोजी के लिए गांव और खेती से जुड़े हैं। किसानों की संख्या का सही आंकड़ा तो आसान नहीं, मगर किसान संगठन बताते हैं कि खेती-मजदूरों व मंडियों के कारिंदों को मिला लें तो लगभग 62 करोड़ लोग खेती पर निर्भर हैं। इन 62 करोड़ लोगों के पास सांझा मंच नहीं है। किसान-संगठन भी बंटे हुए हैं। मगर ये संगठन इस मुद्दे को गर्माने में तो सफल रहे हैं।

सरकार के पास ढेरों दलीलें हैं। किसानों की आत्महत्याओं का एक कारण कर्ज था। बैंक कर्जों में तो एक-दो बार माफी मिल भी गई, लेकिन आढ़ती का कर्ज नहीं चुकाया जा सका। लटक गए फांसी पर। मंडियों की बात करें। इस समय देश में 7000 मंडियां हैं। मगर ज़रूरत 42000 मंडियों की है। आज भी किसानों का बड़ा वर्ग अपनी उपज सीधे अनाज मंडी ले जाने पर विवश है।

उसे पुराना उधार भी चुकाना है, नया लेना भी है और आगे उधारी पर बीज-खाद का रास्ता भी खोले रखना है। आढ़ती को शोषक कहा जाता है मगर किसान के साथ उसका रिश्ता टूटना आसान नहीं है। बड़े किसान स्वयं आढ़ती भी हैं। उन्हें मालूम है धंधा कैसे चलेगा। इनमें टिकैत भी थे, चौधरी चरण सिंह भी, बादल परिवार भी, चौटाला परिवार भी और लालू-मुलायम परिवार भी। ये सब आढ़ती भी थे।

वर्तमान आंदोलन में बैनर किसानों का है, मगर इसमें आढ़ती भी शामिल हैं। सरकार का तर्क है बिचौलिए समाप्त किए बिना कोई विकल्प नहीं है। मगर इन किसानों को, उनके संगठनों को, उनके पैरोकारों को इस बात पर सरकार की नीयत भरोसेमंद नहीं लगती। कृषि-बाजार के ये सुधार अमेरिका में लागू हुए थे। मगर वहां भी इस साल किसानों पर 425 अरब डॉलर का कर्ज बढ़ गया है। वहां के ग्रामीण इलाकों में आत्महत्याओं की दर भी शहरों की तुलना में 45 प्रतिशत ज़्यादा है।

यूरोप में भी यही स्थिति है। फ्रांस में एक साल में 5000 किसान आत्महत्या कर रहे हैं। अमेरिका में वर्ष 1990 से लेकर अभी तक 13 प्रतिशत डेयरी फार्म बंद हो चुके हैं। इंग्लैंड में तीन साल में तीन हजार डेयरी फार्म बंद हुए हैं। अमेरिका, यूरोप और कनाडा में सिर्फ कृषि नहीं बल्कि कृषि निर्यात भी सब्सिडी पर टिका है।

वर्ष 2006 में बिहार में अनाज मंडियों वाले एपीएमसी एक्ट को हटा दिया गया। कहा गया कि इससे निजी निवेश बढ़ेगा, निजी मंडियां होंगी, किसानों को अच्छी कीमत मिलेगी। आज बिहार में किसान बहुत मेहनत करता है, लेकिन उसे जिस अनाज के लिए 1300 रुपएये प्रति क्विंटल मिलते हैं, उसी अनाज की कीमत पंजाब की मंडी में 1925 रुपये है। पंजाब और हरियाणा में मंडियों और ग्रामीण सड़कों का मजबूत नेटवर्क है। इसी वजह से पंजाब और हरियाणा की, देश की खाद्य सुरक्षा में अहम भूमिका है।

अब जब वैध रूप से मंडी के बाहर भी अनाज बिकेगा तो एक देश दो बाजार हो जाएगा। मंडी में जो खरीद होगी उस पर टैक्स लगेगा, लेकिन मंडी के बाहर होने वाली खरीद पर नहीं लगेगा। इस वजह से मंडियां धीरे-धीरे खाली होती जाएंगी। सरकार का कहना है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य भी जारी रहेगा, पर किसानों को शंका है कि जब एपीएमसी का महत्व कम होगा तो न्यूनतम समर्थन मूल्य का महत्व भी खत्म हो जाएगा।

शांता कुमार समिति कहती है कि देश में सिर्फ छह प्रतिशत किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलता है और 94 प्रतिशत किसान खुले बाजार पर निर्भर हैं। साफ है, अगर खुला बाजार अच्छा होता तो किसानों की समस्या इतनी क्यों बढ़ती? ओईसीडी की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2000 व 2016 के बीच भारत के किसानों को 45 लाख करोड़ का नुकसान हुआ है क्योंकि उन्हें उचित दाम नहीं मिला। आर्थिक सर्वेक्षण 2016 कहता है कि किसान परिवार की औसत आय सालाना 20 हजार रुपये है। बड़ा सवाल है कि इतने कम पैसे पर किसान परिवार जीवित कैसे रहता होगा?

अब सरकार पांच साल तक की अनुबंध खेती को भी मंजूरी दे रही है। उपज की कीमत पहले तय हो जाएगी। कोई समस्या होगी, तो पहले एसडीएम के पास जाना पड़ेगा। किसानों को क्या फायदा होगा? जो नुकसान होगा, उपभोक्ता भुगतेंगे। आज प्याज की जो कीमत बढ़ रही है तो उसका मुख्य कारण जमाखोरी है। किसान जमाखोरी कर नहीं सकता। उसे पैसे चाहिए। फसल जिस भाव भी बिके उसे बेचनी ही पढ़ती है। ऐसे कई मसले हैं जो समाधान के मोहताज हैं। विपक्षी खुश हैं कि किसान नाराज होंगे तो वोटों की फसल अच्छी होगी। सरकार सोचती है कि जब किसान के अच्छे दिन आएंगे तो सब ठीक हो जाएगा।

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