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राजनीतिक दल संवैधानिक संस्थाओं की मर्यादाओं को करते हैं तार-तार

देश में संवैधानिक संस्थाओं पर कीचड़ उछालने की बात नई नहीं है।

राजनीतिक दल संवैधानिक संस्थाओं की मर्यादाओं को करते हैं तार-तार
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देश में संवैधानिक संस्थाओं पर कीचड़ उछालने की बात नई नहीं है। राजनीतिक दल संवैधानिक संस्थाओं की मर्यादाओं को तार-तार करते रहे हैं। चाहे सत्ता में रहे हों या विपक्ष में, राजनीतिक पार्टियाें ने कभी न कभी देश की किसी न किसी संवैधानिक संस्था का अवमानना जरूर किया है।

इस मामले में कोई भी पार्टी दूध की धुली हुई नहीं है, लेकिन पक्ष या विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस सबसे अधिक बार देश की संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा का भंजन करते दिखी है।

इस समय देश में केवल अदालतों को अपनी आवमानना के खिलाफ कार्रवाई का अधिकार है, लेकिन चुनाव आयोग, महिला आयोग, सीबीआई, कैग जैसी स्वायत्त संवैधानिक संस्थाओं को अपनी अवमानना के खिलाफ एक्शन लेने का अधिकार नहीं है।

हाल-फिलहाल में विपक्षी दलों के निशाने पर सबसे अधिक चुनाव आयोग रहा है। पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों के बाद हारे हुए दलों ने आरोप लगाया कि ईवीएम को टैम्पर किया जा सकता है।

ताजा ईवीएम विवाद के बाद चुनाव आयोग को जिस तरह बार-बार सफाई देनी पड़ी कि ईवीएम सुरक्षित है और इसे टैम्पर नहीं किया जा सकता है, उससे चुनाव आयोग आहत है कि उसकी प्रतिष्ठा धूमिल हुई है।

आहत होना भी स्वाभाविक है, क्योंकि ईवीएम टैम्पर करने का आरोप लगाने वाले दलों ने टैम्पर करने की चुनौती का सामना नहीं किया। यूपी में हार के बाद बसपा, सपा व कांग्रेस ने ईवीएम में धांधली का आरोप लगाया।

दिल्ली एमसीडी चुनाव में हार के बाद आम आदमी पार्टी ने चुनाव आयोग पर भाजपा के पक्ष में ईवीएम टैम्पर करने का आरोप मढ़ा। आप ने ईवीएम टैम्पर करने का सार्वजनिक डेमो भी दिया।

उसके बाद चुनाव आयोग ने सभी दलों को ईवीएम हैक करने की चुनौती दी। इसमें आप, सीपीएम और एनसीपी ने चुनौती स्वीकार की। 3 जून की तारीख मुकर्रर हुई, लेकिन किसी ने भी चुनौती का सामना नहीं किया।

इससे साफ हो गया कि ये सभी दल सयास चुनाव आयोग की छवि खराब कर रहे थे। ऐसे में चुनाव आयोग का अनाप-शनाप आरोप लगाने वालों के खिलाफ कार्रवाई का अधिकार मांगना उचित ही है।

चुनाव अायोग ने केंद्रीय विधि मंत्रालय को पत्र लिख कर अदालतों की तरह अवमानना की कार्रवाई का अधिकार मांगा है। उसने कहा कि उस पर कीचड़ उछालने वालों के खिलाफ उसे अवमानना की कार्रवाई का अधिकार होना चाहिए।

दरअसल, चुनाव आयोग संवैधानिक संस्थाओं पर बेबुनियादी आरोप लगाकर उनकी छवि खराब करने की बढ़ती प्रवृत्ति से चिंतित है। विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग पर सत्ताधारी दल के एजेंट होने जैसे लांछन लगाए हैं।

चुनाव आयोग ने अदालत की अवमानना अधिनियम 1971 में संशोधन कर उस जैसी संवैधानिक संस्थाओं को भी इस अधिकार के दायरे में लाने की सिफारिश की है। आयोग ने इस बाबत पाकिस्तान चुनाव आयोग को मिले अवमानना की कार्रवाई के अधिकार का हवाला भी दिया है।

सरकार ने भी चुनाव आयोग की मांग पर विचार का संकेत दिया है। इससे पहले भी राजनीतिक दलों द्वारा सीबीआई को ताेता कहा जा चुका है। कांग्रेस के कई नेता सरकार में मंत्री रहते हुए कैग व सीबीआई पर सवाल उठा चुके हैं।

ऐसे में समय आ गया है कि देश की संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता बहाल रखने के लिए लांछन लााने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की व्यवस्था की जानी चाहिए।

यह सरकार को देखना है कि वह चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं को किस रूप में अधिकार देती है, लेकिन अधिकार देते वक्त इस बात का पूरा ख्याल रखा जाय कि वह निहित स्वार्थ के वशीभूत होकर अपने अधिकार का उपयोग नहीं कर पाए।

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