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लोकतंत्र में ''खानदान'' की लड़ाई एक बेशर्म मजाक

असली चुनावी नतीजा पिता पुत्र की लड़ाई से नहीं, मतदान से निकलेगा।

लोकतंत्र में
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पिछले कुछ महीनों से मुलायम परिवार की अंदरूनी लड़ाई इस तरह सुर्खी बनी हुई है, मानों देश की यह सबसे बड़ी समस्या है। संगठन और सत्ता में वर्चस्व की यह लड़ाई वंशवादी राजनीति का सबसे कुरूप चेहरा पेश कर रही है। हालांकि भारतीय राजनीति में वंशवाद को बढ़ावा देने वाला मुलायम का अकेला उदाहरण नहीं है। हर राज्य में और केंद्र की राजनीति में भी ऐसे अनेक परिवार हैं, जो कई पीढ़ी से राज भोगते आ रहे हैं। किसी लोकतंत्र में वंशवाद की यह राजनीति एक बड़ा प्रश्न खड़ा करती है, परंतु दिक्कत यही है कि सैकड़ों साल तक गुलामी का दंश झेलते-झेलते भारत का आम जनमानस इसे किसी बुराई की तरह देखना और मानना ही भूल गया है। किसी के दादा मुख्यमंत्री थे। फिर पिता बने और उनके बाद पोते को भी मुख्यमंत्री बनने का मौका मिल गया।
तीन-तीन पीढ़ी राजसी सुख सुविधाएं भोगती रहीं, परंतु तब पीड़ा होती है, जब इनके लिए सत्ता और शक्ति अहम हो जाती है और वे देश का हित तिरोहित करने पर आमादा हो जाते हैं। कई ऐसे परिवार भी इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में राज्यों के मुख्यमंत्री और केंद्र की सत्ता में अहम पदों तक पहुंचे हैं, जो अंग्रेजी शासनकाल में राजे-रजवाड़ों के मालिक होते थे, जिन्हें राजा के तौर पर प्रजा सिर झुकाकर सलाम करती थी। आजादी के पहले भारत में पांच सौ साठ से ज्यादा रियासतें थीं। उनमें से अधिकांश राजाओं की संतानें अब भी अलग-अलग राज्यों में सत्ताओं का सुख भोग रही हैं। गरीब पहले भी हुक्म उदूली करता था। आज भी उसकी हालत में कोई गुणात्मक बदलाव देखने को नहीं मिलता।
बहुत हुआ तो वह सिपाही, रोडवेज बस में चालक-परिचालक या किसी दफ्तर में लिपिक की नौकरी पाकर अपने वरिष्ठों के आदेश का पालन करने को बाध्य है। मुलायम सिंह यादव जैसे खानदानी राज परिवार भी हैं, जो आजादी से पहले तो राजघराने नहीं होते थे, परंतु बाद में किसी आंदोलन के गर्भ से पैदा होने के बाद किसी जाति विशेष अथवा समुदाय के नेता बनकर सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने में सफल हो गए। सामाजिक न्याय के नाम पर एक बड़े वर्ग का वोट हासिल करके अलट-पलटकर सत्ता की दहलीज पर चढ़ने वाले ये परिवार बाद में कई तरह के रोगों के शिकार हो गए। इनमें आय से अधिक संपत्ति के मामलों से लेकर वंशवादी राजनीति को बढ़ावा देने के गंभीर रोग तक शामिल हैं। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि काबिल चेहरों, समर्पित नेताओं और कार्यकर्ताओं की निरंतर अनदेखी करके दादा के बाद पिता और उसके बाद पुत्र ही पार्टी के सर्वोच्च पदों को हक के साथ हड़पते रहे,परंतु लोकतंत्र में भरोसा रखने वाली ताकतें होठों को सीलकर यह तमाशा देखती रही।
किसी ने इसका कभी विरोध नहीं किया। मुलायम खानदान के मौजूदा झगड़े पर भी यदि गौर फरमाएं तो इससे आम जनता का क्या लेना-देना हो सकता है? उसका इस तरह के विवादों से क्या भला होने वाला है? क्या यह झगड़े राज्य के गरीब, वंचित, शोषित और घोर उपेक्षित लोगों के हितों के संरक्षण के लिए हो रहे हैं? क्या उस पिछड़े वर्ग या अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए हो रहे हैं, जो इन्हें पालकी पर बैठाकर सत्ता की दहलीज तक पहुंचाते रहे हैं? वास्तविकता यह है कि पिता मुलायम सिंह और पुत्र अखिलेश कई तरह की कुंठाओं और गलतफहमियों के शिकार हैं। अतीत की कई घटनाओं से एक-दूसरे से बुरी तरह भरे बैठे हैं और अब मौका मिलते ही बदले की भावना से ग्रस्त होकर एक-दूसरे को उसकी औकात बताने पर आमादा हैं।
इससे प्रदेश की जनता का क्या भला होने वाला है, जो मीडिया हर वक्त सिर्फ इस एक झगड़े की लाइव कवरेज करके सभी मुद्दों की तिलांजलि दे रहा है? सबसे चौकाने वाली बात यह है कि इसे कुछ इस तरह पेश किया जा रहा है, जैसे जो इस जंग में विजयी होगा वो प्रदेश की सत्ता पर काबिज हो जाएगा? इससे मूर्खतापूर्ण बात और क्या हो सकती है? अखिलेश सरकार के पांच साल के कार्यकाल और कारनामों पर जनता सात चरणों के मतदान में फैसला देने वाली है। असली चुनावी नतीजा पिता पुत्र की लड़ाई से नहीं, मतदान से निकलेगा जिसकी प्रतीक्षा की जानी चाहिए।
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