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कर्नाटक में सियासी नाटक, कुर्सी और घोड़ी सबके नसीब में नहीं होती

कर्नाटक चुनाव के परिणाम आने के बाद वहां सियासी नाटक चल रहा है। अपने भियाजी भी अजीब किस्म के जीव हैं। उन्हें रोज कुछ न कुछ हुआ ही रहता है। इसी कुछ होने के चलते आजकल पता नहीं उन्हें क्या हो गया है कि जहां कहीं अपनी पीठ पर बैठे दूल्हे को गालियां देती बूढ़ी घोड़ी दिखी, चार लंगड़ाते फंगड़ाते पलटियां खाते बाराती दिखे, फटे ढोल वाले ढोल बजाने के बदले खुद ही बजते दिखे, वहीं लग जाते हैं सीना तान कर सहर्ष घोषणा करने,‘ मैं घोड़ी चढ़ने को तैयार हूं।''

कर्नाटक में सियासी नाटक, कुर्सी और घोड़ी सबके नसीब में नहीं होती
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कर्नाटक चुनाव के परिणाम आने के बाद वहां सियासी नाटक चल रहा है। अपने भियाजी भी अजीब किस्म के जीव हैं। उन्हें रोज कुछ न कुछ हुआ ही रहता है। इसी कुछ होने के चलते आजकल पता नहीं उन्हें क्या हो गया है कि जहां कहीं अपनी पीठ पर बैठे दूल्हे को गालियां देती बूढ़ी घोड़ी दिखी, चार लंगड़ाते फंगड़ाते पलटियां खाते बाराती दिखे, फटे ढोल वाले ढोल बजाने के बदले खुद ही बजते दिखे, वहीं लग जाते हैं सीना तान कर सहर्ष घोषणा करने,‘ मैं घोड़ी चढ़ने को तैयार हूं।'

नहीं मानते तो नहीं मानते। उन्हें कई बार समझाया भी, भियाजी! तुम तो बरसों से घोड़ी चढ़ने को सेहरा बांधे तैयार हो पर जनता तो माने पहले। एक घोड़ी मात्र से अगर काम चल जाता तो समाज में एक भी कुंआरा न रहता। घोड़ी चढ़ने के लिए केवल घोड़ी नहीं, घोड़ी के साथ साथ और भी बहुतों की जरूरत होती है। वैसे भियाजी! औरों को घोड़ी पर चढ़े देख, औरों की घोड़ी कुर्सी पर जबरदस्ती चढ़ना खतरे से खाली नहीं।

घोड़ी पर चढ़ने के उतने नुकसान नहीं जितने घोड़ी पर चढ़ हिम्मत से बैठने के होते हैं। सच कहूं तो ये घोड़ी कुर्सी से भी अधिक खराब होती है। लगाम कितनी ही कसकर पकड़ कर रखो भैया! जब इसके मन में आता है तो जनता से भी जल्दी अपनी पीठ से गिरा कर धूल चटा देती है। भियाजी! वैध घोड़ी पर बैठने के लिए अपने बाराती चाहिएं। जहां घोड़ी जानी है, घोड़ी को उस घर का पता होना चाहिए, नहीं तो घोड़ी गुस्से में गिरा भी देती है।

वह दूल्हे के अरमान नहीं समझती। वह दूल्हे का हिडन मुकाम नहीं समझती। इसलिए भियाजी! राजनीति शास्त्र तो कहता है कि वैध घोड़ी पर चढ़ने के बाद भी मस्त नहीं होने का। शरारती बारातियों का कुछ पता नहीं होता। वे घोड़ी के आगे घोड़ी को हौसला देते नाच तो दूल्हे के पैसों की दारू पीकर रहे होते हैं पर हाथ में सुई छुपा रखते हैं। और दाव लगते ही उसे घोड़ी के चुभो हवा हो लेते हैं, दूसरों की घोड़ियों के आगे नाचने के लिए।

ऐसे बाराती और पार्टी वर्कर पर विश्वास कम ही। अरे भियाजी! कितनी बार कहा आपसे कि जिसकी किस्मत में दूल्हा बनना नहीं लिखा होता, वह लाख घोड़ियों को हायर कर ले। वह घोड़ी नहीं चढ़ सकता तो नहीं चढ़ सकता। अगर दूल्हा जिद्दी हो जाए तो घोड़ियां भी जिद्द पर उतर आती हैं। नेता कुर्सी से और दूल्हा घोड़ी के बदले चाहे किसी से भी पंगा ले ले तो ले ले पर कुर्सी घोड़ी से सपने में भी पंगा नहीं लेने का।

कुर्सी घोड़ी जो एकबार बिदकी तो समझो रह गए जन्म भर बेचारे कुंआरे। घोड़ी और कुर्सी की पीठ बड़े संजोग से मिलती है भियाजी! अब देखो न, जिनकी किस्मत में कुर्सी लिखी होती है, वे इस पार्टी के राज में भी कुर्सी पर जमे रहते हैं और उस पार्टी के राज में भी। इसके विपरीत जो कुर्सी के लिए दिन रात हाथ पांव मारता रहा हो, वही जानता है कि कुर्सी के लिए क्या-क्या पापड़ नहीं बेलने पड़ते।

वैसे भियाजी! कुंआरे और कुर्सी के भूखे में एक समानता होती है। दोनों दूसरों को गिराने की सदा फिराक में रहते हैं। मैं तो उन्हें समझाते-समझाते थक गया, पर अपने को सबसे अधिक समझदार समझने वाले के साथ बहुधा यह दिक्कत रहती है कि वह दूसरों को हमेशा अंडर इस्टीमेट करता है और चने के झाड़ पर चढ़ एवरेस्ट-एवरेस्ट करता है।

सुनो भियाजी! कुर्सी और घोड़ी सबके नसीब में नहीं होती भियाजी! जिसकी किस्मत में वह नहीं वह चाहे कितने ही जुगाड़ क्यों न लगा ले, वह जनता और घोड़ी को कितना ही क्यों न भरमा ले, उसका हर सीधा पैंतरा भी उल्टा ही पड़ता है। भियाजी चलो, अब कुछ और करते हैं। पर भियाजी नहीं मानते तो नहीं मानते।

बस, जब भी जहां किसी भी उम्र की पापी पेट के लिए दूल्हे को उठाए घोड़ी दिखी, सारी बातें छोड़ बच्चों की तरह जिद कर बैठते हैं,‘ मैं घोड़ी चढ़ने को तैयार हूं। मैं घोड़ी चढ़ना चाहता हूं। कोई मुझे घोड़ी चढ़ा दे प्लीज!' अब आप ही भियाजी को समझा दें प्लीज! मेरे समझाने का तो वे अब उल्टा अर्थ लेने लगे हैं। सोचते हैं, जैसे उनके कुंआरे रहने में ही मेरी जवानी का राज छिपा हो।

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