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ममता बनर्जी की राजनीति और संवैधानिक संस्थाएं

ममता बनर्जी भारतीय राजनीति का वह तुनक मिजाज चेहरा हैं जो कभी-भी कहीं-भी और किसी के भी खिला हो।

ममता बनर्जी की राजनीति और संवैधानिक संस्थाएं
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नई दिल्‍ली. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चुनाव आयोग के फैसले के खिलाफ जिस तरह से अड़ गई हैं, उससे देश में एक तरह से संवैधानिक संकट पैदा होने का खतरा बढ़ गया है। दरअसल, आयोग चाहता है कि चुनाव होने तक राज्य के कुछ अधिकारियों का तबादला इस रुख के दो पक्ष हैं। ममता बनर्जी भारतीय राजनीति का वह तुनक मिजाज चेहरा हैं, जो कभी-भी, कहीं-भी और किसी के भी खिला हो। उनकेफ इस तरह का व्यवहार बेहिचक कर सकती हैं। ऐसी घटनाओं की सूची लंबी है, जब उन्होंने इस तरह के तेवर दिखाए हैं।

कभी अपने वरिष्ठ राजनीतिक साथियों के खिलाफ तो कभी-कभी अपने ही पार्टी के नेताओं के खिलाफ। पूर्व रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी के खिलाफ उनका व्यवहार भला कौन भूल सकता है? अपनी ही पार्टी के नेता त्रिवेदी को अपमानित कर उन्होंने पद से हटवा दिया था। खुद ममता ने भी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार से एक छोटी-सी बात पर इस्तीफा दे दिया था। मौजूदा यूपीए सरकार से भी जब वे अलग हुईं तो खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश को मुद्दा बनाया था। माना जाता हैकि वह इसी तरह छोटी बातों को मुद्दा बनाती हैं।

इसके लिए वे पहले मुद्दों का चयन करती हैं। उससे जुड़े बहाने तलाश करती हैं। फिर उसको चरम सीमा तक ले जाती हैं। और इस तरह वे उसका राजनीतिक लाभ लेने की भी कोशिश करती हैं, लेकिन ये जो राजनीतिक स्टंट है इसमें कभी-कभी देश की संवैधानिक संस्थाएं भी उनके निशाने पर आती हैं। जिनकी गरिमा, र्मयादा दांव पर लग जाती है। एक बार संसद में महिला आरक्षण विधेयक पर चर्चा हो रहीथी। बहस के दौरान समाजवादी पार्टी के एक सदस्य की टिप्पणी से वे इतनी नाराज हो गईं कि संसद में ही उनका गिरेबान पकड़ लिया था।

साथ ही उन्होंने वहां मौजूद कागजातों को लोकसभा स्पीकर के ऊपर फेंक दिया था। इसमें कोई दो राय नहीं कि ममता बनर्जी एक ईमानदार नेता हैं। वे सादगी से जीवन जीती हैं। किसानों, गरीबों और वंचित वगरें की परवाह करती हैं, लेकिन इसके साथ-साथ उनका यह भी दायित्व बन जाता है कि वे संवैधानिक संस्थाओं व व्यवस्थाओं का सम्मान करें। ऐसी अराजक स्थिति पैदा न करें जिससे तमाम संस्थाओं पर प्रश्न चिह्न् खड़ा हो जाए और वे लकवाग्रस्त हो जाएं।

सब जानते हैं कि जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 28(क) के अनुसार चुनावों के दौरान स्टेट की पूरी मशीनरी, तंत्र और पुलिस चुनाव आयोग के अधीन आ जाते हैं और उसके तहत ही काम करते हैं। चुनाव आयोग यदि यह महसूस कर रहा है कि चुनाव होने तक कुछ खास अधिकारियों के तबादले होने चाहिए या उन्हें हटाया जाना चाहिए तो निष्पक्ष, पारदर्शी और साफ-सुथरे चुनाव के लिए यह जरूरी है, परंतु इसे भी ममता बनर्जी अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बनाकर आयोग को चुनौती दे रही हैं और उससे स्पष्टीकरण मांगने पर उतारू हैं तो उनके इस व्यवहार को कहीं से भी जायज नहीं ठहराया जा सकता और ना ही इसका सर्मथन किया जा सकता है।

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