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धमाकों से जुड़े तथ्यों का राजनीतिकरण अनुचित

बिहार की राजधानी पटना में सीरियल बम विस्फोट के बाद पुलिस-प्रशासन हरकत में आई है और दो संदिग्धों को हिरासत में लिया गया है। इनकी निशानदेही पर पुलिस ने विभिन्न जगहों पर छापेमारी कर कई अहम सूचनाएं प्राप्त की है।

धमाकों से जुड़े तथ्यों का राजनीतिकरण अनुचित

बिहार की राजधानी पटना में सीरियल बम विस्फोट के बाद पुलिस-प्रशासन हरकत में आई है और दो संदिग्धों को हिरासत में लिया गया है। इनकी निशानदेही पर पुलिस ने विभिन्न जगहों पर छापेमारी कर कई अहम सूचनाएं प्राप्त की है। उम्मीद की जानी चाहिए कि आगे और भी अहम सुराग मिलेंगे, जिससे इस वारदात के पीछे के मकसद और चेहरों को उजागर करने में मदद मिलेगी। प्रशासन इसे एक आतंकवादी घटना मान रही है और शुरुआत जांच के आधार पर कहा जा रहा है कि इसमेंइंडियन मुजाहिदीन का हाथ है। साथ ही इन धमाकों का स्वरूप कुछ माह पूर्व बिहार के बोध गया में हुए सीरियल बम धमाकों जैसा ही बताया जा रहा है। परंतु इस घटना में जिस तरह की सूचनाएं मिल रही हैं उनको आतंकवाद के खिलाफ लड़ाईमें हथियार बनाने की बजाय दुर्भाग्यवश उन पर राजनीति भी की जा रही है। कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के दंगों का बदला लेने के लिए आईएम ने भारतीय जनता पार्टीकी रैली में धमाके किए हैं। यह बात बिल्कुल निराधार है। भाजपा को सिर्फ एक राजनीतिक फेस सेविंग के लिए कुछ राजनीतिक दलों की ओर से निशाना बनाया जा रहा है। मुजफ्फरनगर दंगे से इसका कोई लेना-देना नहीं है। यह हमला बिहार सरकार और राज्य की कानून व्यवस्था की विफलता का प्रमाण है। यदि सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त होते तो इस आतंकवादी हमले को टाला जा सकता था। अब जो बातें सामने आ रही हैं, उससे पता चल रहा हैकि इस घटना में प्रशासन की ओर से हर स्तर पर लापरवाही बरती गई है। महीने पूर्व रैली का कार्यक्रम तय किया गया था, लेकिन केंद्र स्तर पर इससे संबंधित खुफिया सूचनाएं नहीं मुहैया कराई गईं। राज्य सरकार के पुलिस अधिकारी भी रैली में सुरक्षा इतजामों को लेकर सुस्त रहे। जब मालूम था कि इसमें पार्टी के बड़े नेताओं की उपस्थिति होगी तब भी न तो विशिष्ट प्रवेश द्वार बनाए गए, न ही मेटल डिटेक्टर से मैदान की तलाशी ली गई। वह भी ऐसी स्थिति में जब बिहार को आईएम के आतंकियों का गढ़ माना जाने लगा है। अभी कुछ ही दिनों पूर्व इंडियन मुजाहिद्दीन के संस्थापक यासीन भटकल की गिरफ्तारी बिहार के सीमावर्ती क्षेत्र से हुई। भारत को सीमा पार के आतंक से तो खतरा है ही लेकिन उससे भी कहीं ज्यादा खतरा देश के अंदर पनप रहे ऐसे आतंकी जमातों से है। और इनके हौसले बढ़ाने का काम देश में चल रही वोट बैंक की राजनीति कर रही है। इसका प्रमाण उन्होंने पटना के गांधी मैदान के हर हिस्से में बम बिछाकर दे दिया है, वो भी पुलिस की मौजूदगी में। सुरक्षा व्यवस्था का मुद्दा अपनी जगह है और यह बड़ा प्रश्न बना हुआ है कि आतंकियों से कैसे निपटा जाए। इसके लिए लंबे समय से राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केंद्र (एनसीटीसी) के गठन की कवायद हो रही है पर केंद्र और राज्यों के बीच राजनीति में यह अटकी हुई है। हमारा देश एक लोकतांत्रिक देश है। यहां खुले में बड़े बड़े आयोजन होते हैं यदि इसी तरह सुरक्षा व्यवस्था की अनदेखी होती रही तो फिर भयावह स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। जरूरत, देशहित के लिए एकजुट होकर आतंकवादियों के मनोबल को तोड़ने की है।

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