Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh
Breaking

अशोेक शाह की कविताएं

दुःख ही जीवन की कथा नहीं , जोशीमठ का कल्पवृक्ष और आम आदमी

अशोेक शाह की कविताएं

1. दुःख ही जीवन की कथा नहीं

जिसे चाहते पाना हरदम
क्या सच में लता सुख उसी से
ठगते आये हैं जीवन भर
कितना अपना है, मन से
देने जग को आये हम
सुख से ही पैदा होता दुःख
सुख से बड़ा नहीं हो सकता
जीवन-वृक्ष पर पनपी मृत्यु
पलती, बढ़ती रस उसका लेकर
जीवन के आश्रय में छिपी मृत्यु
जीवन से बड़ी नहीं हो सकती
मंजिल नहीं हम मृत्यु के
रोज़ डरा करें थर- थर कर
जीवन अनन्त के सखा- सहचर हम
बहा करें कल- कल कर
आलोकित है सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड
कण- कण सिंचित है दिव्य प्यार से
घृणा तो है तिमिर पल का
फिर बस क्यों जाये इस जीवन में
साध्य नहीं हो सकते कभी
इस जग के अवसाद- विषाद
पुष्पित करने जीवन वृक्ष को
खाद समझ कर डाला करें
क्रोध निराशा तृष्णा अहंकार
जीवन-प्रवाह बहता लगातार
परे पृथ्वी से है अनन्य विस्तार
इस क्रम की अंतिम कड़ी मनुष्य हो
कितना हास्यास्पद यह विचार
स्थूल नहीं हो सकता स्थायी
विघटित निर्मित से होता है
सहचर हम अन्नत यात्रा के
मृत्यु के मोड़ पर कहाँ रुकना है
सृजन के अनुपम समुच्चय का
विनाश एक निश्चित परिणति है
वृत्तीय पथ पर चलते रहना है
मंज़िल एक यही सबकी है
दुःख ही जीवन की कथा नहीं
जीना कोई व्यथा नहीं
जीवन से निर्मित पूरी दुनिया
मेरी दुनिया, तेरी दुनिया

2. जोशीमठ का कल्पवृक्ष
शंकर साक्षी तुम कल्पवृक्ष
शान्ति वरण यतीश्वर सदृश
तुमसे पुराना है ज्योतिर्मठ
घिस-घिस कर हो गया जोशीमठ
हरिहर तुम तरुवर विशाल
सृष्टि के लगते आद्योपान्त
खिलते तुममें हैं पुष्प प्रतिवर्ष
पर फलता नहीं अब शहतूत
शंकर की अनुकम्पा से क्या
तुम हुए जन्म मरण से मुक्त
सन्यासी तुम स्वयं वृक्ष
सूखी टहनियों से हरे पत्ते
निकल आते प्रतिवर्ष अनेक
जैसे हिमालय से सोते
झरते रहते अविरल
कठोर तप का साक्षात् फल
हुआ तना तुम्हारा भूधराकार
अँट जाए एक पूरा संसार
हे चेतन यतीश्वर
कर दो हमें भवबाधा से मुक्त
हमारा यह जीवन अबूझ
बन जाए वह प्रसून
जीवन सुगन्ध से युक्त
3. आम आदमी
बैठा हमारे बीच दरी पर
बोलते जब उसकी गरीबी पर
हम उसकी तरह साधारण हो सकते हैं लेकिन
वह उघाड़ रहा हमारे भय को
नहा रहा सार्वजनिक हैण्डपंप पर
गमछा निचोड़कर डालेगा तार पर
गंवाता नींद दूसरे के लिए
करता प्यार गरीबों से
करोड़ों व्यक्ति एक पंक्ति में खड़े हो
सजदा करते हैं उसकी
बकरी की पीठ पर फेरते हाथ
वह हँंस सकता है नमक रोटी खाकर
लिखता अच्छी कविता
गाता गीत सबसे मार्मिक
जिसके पीछे चलने में दिली खुशी होती है,
नहीं हो सकता वह साधारण
नहीं हमें स्वीकार
भदेस देहाती कपड़े में लगे
त्याग का आकार
इसलिए साधारण होना स्वीकार नहीं
उसका असाधारण रहना ही सुकूनदायक
एक बड़ा खतरा है उसका साधारण होना
शायद वह इंसान भी नहीं हो सकता
हाँ, हाँ उसे भगवान ही होना चाहिए,
सामान्य का अद्भुत उदाहरण किसे सहन
चुनौती देता करता परिवार से विमुख
इसके पहले कि हमारी अँधेरी दुनिया में
जलाये रोशनी का चिराग
मिलाये हमारे स्वार्थ की कमाई में सत्य का स्वाद
आओ कर दें उसे बिरादरी से बाहर
दफ़ना दें उसे किसी मंदिर या गिरज़ाघर
आँखें मूंदकर उस पर चढ़ायेे श्रद्धा- सुमन
और रहें हम निर्विवाद, सुरक्षित
मध्यमवर्गीय समझदार नागरिक
इतिहास के पन्नों में निष्प्राण अंकित
मोबाइल : 09425016311
ईमेल - ashokshah7@gmail.com
खबरों की अपडेट पाने के लिए लाइक करें हमारे इस फेसबुक पेज को फेसबुक हरिभूमि, हमें फॉलो करें ट्विटर और पिंटरेस्‍ट पर-
Next Story
Top