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मनीष कुमार यादव की तीन कविताएं

मेरे हाथ का लाल झंडा, मैं सपने में हत्याएं करता हूँ, हम गरीब हैं...

मनीष कुमार यादव की तीन कविताएं

1. मेरे हाथ का लाल झंडा

(लीलाधर मंडलोई की कविता “ओबामा के रंग में यह कौन है?” के जवाब में.)
ओबामा के रंग में ये वो है
जिसे हम कभी भी होने नही देना चाहते थे, शायद
न अपने पास, और ना उनके पास
जो शहरों में बसते हैं, हमारे अपने
मगर शायद सबसे बड़ा पेंच भी यही है
की हमें अपने लाल झंडे के साथ-साथ
हमारे ऐशो-आराम भी चाहिए थे
हमें चाहिए था कि हम अपनी मर्सेडीज़ भी रखें
और साथ रखें अपने लाल झंडे को भी
मगर शायद किसी को भी पता नही था
कि मर्डोक का मारा लाल झंडा
डॉमिनो के ऊपरी कोने पे जा अटकेगा
मेरे घर तो वो झंडा आज भी मेरी साँसों में है
मगर शहर के परिजन शायद अब भूल चुके हैं सबकुछ
वो भूल गए हैं कि उन्हें उस झंडे को
कहाँ रखना चाहिए था, दर-असल
उन्होंने तो झंडे को ये सोच कर ऊपर लगाया होगा
कि वो वहाँ से दुनिया को अपनी उपस्थिति का आभास कराएगा
मगर इसी मासूम सोच के चलते सब गच्चा खा गए
हम भी, हमारे परिजन भी
अब क्या करें
किसी की भी समझ से परे है
इसीलिए लाल झंडे के वहाँ होने का मामला
आज भी पेंडिंग है
संसद के बाहर भी
और संसद में भी
जो मेरे हाथ में है, उसे देखने पर
सरकार अब मुझे नक्सलवादी कहती है....
2. मैं सपने में हत्याएं करता हूँ
मैं सपने में हत्याएँ करता हूँ
मैं जानता हूँ
हत्याएं करना अच्छी बात नहीं है
शायद इसलिए मैं देख नहीं पाता
कि मेरी हत्याओं का भुक्तभोगी कोन है
ठीक-ठीक कुछ भी, चिन्हित नहीं होता
मगर साथ ही
मैं यह भी जानता हूँ
कि मैं किसी व्यक्ति विशेष की
हत्या की नीयत नहीं रखता
मैं चाहता हूँ करना विद्रोह
और ख़त्म कर देना चाहता हूँ
दुनिया भर की
सारी विसंगतियां, सारी कुंठाएं
सारा लोभ, सारी नफ़रत
और वो सबकुछ, जो हमें
एक अदद इंसान बनने से
दूर रखती है।

3. हम गरीब हैं
आपकी ही मिल्कियत है, आपकी आवाम है
हर तमाचे-जूते पे लिखा हमारा नाम है
आपकी सब हरकतों पे चुप्पी सधी है देखता हूँ
हमारी ख़ामोशी की भी चर्चा सर-ए-आम है
आप मालिक हैं, सरकार हैं, कोई हिम्मत करे तो कैसे
हमारा क्या है, गरीब हैं, मुफ़्त में बदनाम हैं
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