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रश्मि रेखा की तीन कविताएं

खिड़की के पार, छत और बाढ

रश्मि रेखा की तीन कविताएं
1. खिड़की के पार
चौखट की तरह जड़ दी गई खिड़की के पार
देखती है वह अनंत दृश्य
सड़क से गुज़रते हुए
सड़क पर बनते हुए
जिसमे हमेशा शामिल है वह
एक अभाव की तरह
दृश्य के अदृश्य हो जाने के बाद भी
खिड़की की सरहदों के पार
आती-जाती सवारियों,लाउडस्पीकरों और जिंदगियों
के जिन्दा शोरगुल के बीच
वह बाँटना चाहती है
दवा की शीशी पकड़ें धीरे-धीरे लौटती
उस बहुत उदास औरत का दुःख
या जीविका की तलाश में खाली टोकरी
का असह्य बोझ ढ़ोते उस आदमी का दर्द
खिड़की की सींखचों के अन्दर
अकेले चाँद के साथ सितारों से भरी रात
या सूरज के उजास भरे दिन में भी
वह अक्सर नहीं रोक पाती है
आँखों की दहलीज पार करते आँसुओं को
जब लोगों के मन की इच्छा-भाषाऍ जान
उन्हें पूरा न कर पाने की परवशता में
उसकी आत्मा तक खरोंच डाली जाती है
तब इन सलाखों से देखती है वह
आकाश के फैलाव में उडान भरते डैने
खुली सड़क पर चलते हुए पाँव
हवा के आँधी में तब्दील होने के अनेक रंग
फ़िर अपने भीतर खुलती उस खिड़की में
खोजती है अपने उन पंखों को
जो पिता ने आते समय दिए ही नहीं
माँ ने चुपचाप रख लिए थे अपने पास
बक्से में रखे अपने कटे पंखों के ऊपर
2. छत
किराये के मकान से भी आँखें देख लेती है आकाश
देखते हुए आकाश आँखें बन जाती है आकाश
कई तरह की छतों के साए में एक के बाद
एक कई तरह की छतों में अपने को बदलती
अपने लिए एक अलग छत की तलाश में
जुटी रही तमाम उम्र
एक ऐसा दरवाज़ा होता जहाँ सिर्फ़ अपनी दस्तक होती
आज कितना मुश्किल होता जा रहा है
इतने बड़े भूमंडल पर
बचाए रखना एक कोना
जहाँ सर पर अपनी छत हो और
उस छत से उड़ान के लिए एक आसमान
याद आती है बचपन की वह छत
जहाँ ढेर सारे सपने देखे
मीलों लम्बी चहलकदमी की
चाँद से की जी भर दोस्ती
आँगन की कैद से ली मुक्ति
बगल की छत से की दोस्ती
जुलूस में हुए शामिल
आज अदृश्य होते जा रहे है वे माथे
जिस पर कई बार त्योंरियाँ पड़ जाया करती थी
क्या कभी संभव है
स्मृतियों की बस्ती में मिल पाना
बचपन का वह खोया रास्ता
जिसपर चलते हुए
सर पर महसूस करती थी एक छत
3. बाढ़
इस बीच बहुत पानी बह चुका था
जिन्दगी और मौत की कशमकश में
उनके पास बची नहीं थी मनु की नाव
जिससे की जाती एक नई शुरुआत
समुन्द्र की तरह दिखने की ललक में
तिरोहित हो गई थी नदी की दुनिया
कटाव से टूट कर लगातार
धारा में समाते जा रहे थे किनारे
सैलाब में डूबी जा रही थीं आकृतियाँ
बहे जा रहे थे उनके छोटे-छोटे सुख
उजड़ रहा था आशियाना
बचाने के नाकाम हो रहे थे सारे नुस्ख़े
वायु-मार्ग में मची थी हलचल
आकाश में देवता कर रहे थे कूच
प्रलय के बाद क्या अभी भी बचा था जीवन
चील सी झपट्टे मारती मृत्यु से बचते हुए
बेसब्री से कर रहे थे वे किसी मसीहा का इंतजार
लगातार किसी राहत का इंतजार
नहीं बचा था उनके पास एक तिनका भी
कि मिलता उन डूबतों को सहारा
दूर से चलकर आई थी मीडिया की जीप
जिसमे भरी थी ख़ुशहाल ज़िन्दगी की हलचल
उनके पास भाग कर आ जुटी थी
बिलबिलाती फटेहालों की लाचार भीड़
जो देर तक करती रही राहत का इंतजार
पर वे तो आये थे उन्हीं से लेने
भूख और मौत के कुछ दर्दनाक किस्से
उनकी बदहवासी की कुछ बेतरतीब तस्वीरें
जो छपेगी कल के अखवार में
दिखाई जायेगी टी.वी.चैनलों पर
देर तक भीड़ देखती रही उनका जाना
टूट चुका था उनका ढाँढस का बाँध
वहाँ गुस्सा था, बेचैनी थी
अजीब सी छटपटाहट थी
इस भीच बहुत पानी बह चुका था
ज़िन्दगी और मौत की कशमकश में
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