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कुमार अनुपम की कविताएं

उसका देखना और तानाशाह

कुमार अनुपम की कविताएं
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1. उसका देखना

बीमार था भाई और अस्पताल भरा हुआ
खुले आकाश के नीचे
नसीब हुआ उसे किसी तरह एक बेड
बेहद जद्दोजहद के बाद
ऐसा आपातकाल था
ड्रिप की सीली-सी आवाज थी जब बुदबुदाया -
हमारे देखने की सीमा तो देखिए !
वह चाँद देख रहा था और तारे
अब उसका बोलना बर्फ हो रहा था -
और जमीन पर थोड़ी ही दूरी पर
चलता हुआ आदमी तो ओझल हो जाता है
यकायक हमारी निगाह से
भैया, देखिए जरा कितने पेंच हैं इस दुनिया में !
वह बहुत मासूम दिख रहा था और खतरनाक तरीके से गंभीर
अब मैं
उसे बीमार कहकर शर्मिंदा हो रहा हूँ।

2. तानाशाह

इस बार आया
तो पूछा उसने
कि कौन बनेगा करोड़पति
फिर दस सरलतम सवाल पूछे
उदाहरणार्थ एक सवाल तो यही
कि तिरंगे में कितने रंग होते हैं
पूछते हुए इसकी वाणी से इतना परोपकार टपक रहा था
कि हमें हर हाल में जीतने की मोहलत दी उसने
और सही जवाब पर
हमारी पीठ ठोंकी
बढ़कर हाथ मिलाया और कुशलतम बुद्धि की
तारीफ की दिल खोलकर
फिर भला किसकी मजाल
कि पूछे उससे
कि लेकिन तुम क्या मूर्ख हो अव्वल
जो इतने सरलतम सवालों पर
दिए दे रहे हो करोड़ों
यहाँ तक कि संदेह भी नहीं हुआ तनिक
उसकी किसी चतुर चाल पर
हमारी अचानक अमीरी की खुशी में वह इस कदर शरीक हुआ
कि नाचने तक लगा हमारे साथ साथ
बल्कि तब
अपने निम्न-मध्य रहन-सहन पर हमें लाजवाब लज्जा हुई
हम निहाल होकर उसकी सदाशयता पर सहर्ष सब कुछ हार बैठे
इस बार आया
तो अपने साथ लाया
देह-दर्शना विश्वसुंदरियों का हुजूम
वे इतनी नपी-तुली थीं कि खुद एक ब्रांडेड प्रॉडक्ट लगती थीं
उनकी हँसी और देह और अदाएँ इतनी कामुक
कि हर कीमत उनके लायक बनना हमने ठान लिया मन ही मन
तब गृहस्थी की झुर्रियों और घरेलूपन की मामूलियत
से घिरी अपनी पत्नियों पर
हमें एक कृतघ्न घिन-सी आई
वे शुरू शुरू में किसी लाचारी और आशंका में
अत्यधिक मुलायम शब्दों में प्रार्थना करती हमारे आगे काँपती थीं थरथर
किंतु इस आपातकाल
से उबरने में उन्होंने गँवाया नहीं अधिक समय
और किसी ईर्ष्या के वशीभूत
मन ही मन
उन्होंने कुछ जोड़ा कुछ घटाया
और हम एक विचित्र रंगमहल में कूद पड़े साथ साथ
जीवन की तमाम प्राथमिकताओं और पुरखा-विश्वासों
को स्थगित करते हुए हम
अपनी आउटडेटेड परंपराओं
से निजात पाने के लिए दिखने लगे आमादा
यह मानने के बावजूद कि हमारा सारा किया-धरा
ब्रांडेड बनावट के बरक्स
बहुत फूहड़
और हमारी औकात
क्षेत्रीय फिल्मों के नायक-नायिकाओं से भी गई-गुजरी
फिर भी
एक अजब दंभ में हम
एक आभासी विश्व की पाने के लिए विश्वसनीयता
सब कुछ करने को तत्पर थे फौरन से पेशतर
हमने अपनी अस्मिता से पाया छुटकारा और जींस पैंट्स और शर्ट्स की
एकरंग आइडेंटिटी में गुम हो गए
हमने खुरच खुरच कर छुड़ा डाले
अपने मस्तिष्क से चिपके एक एक विचार
सिवा इस खयाल के कि अब
हमें सोचना ही नहीं है कुछ
कि हमारे लिए सोचनेवाला
ले चुका है इस धराधाम पर अवतार
इस बार आया
तो उसके मुखमंडल पर एक दैवीय दारुण्य था
दहशतगर्दी के खिलाफ
उसने शुरू किया विश्वव्यापी आंदोलन जिसे सब
उसी की पैदाइश मानते रहे थे
अपने पूर्व पापों के पश्चात्ताप में विगलित उसने
एक देश के ऊर्जा संसाधनों
को पूरे विश्व की पूँजी मानने
का सार्वजनीन प्रस्ताव पेश किया
विरुद्धों से भी कीं वार्ताएँ संधियाँ कीं रातोंरात
और प्राचीन सयताओं की गारे-मिट्टी से बनी रहनवारियों
को नेस्तोनाबूद कर डाला
यहाँ तक कि हाथ-पंखों और कोनों-अँतरों में छुपती लिपियों
और भाषाओं और नक्काशीदार पतली गर्दनोंवाली सुराहियों को भी
कि अगली पीढ़ियों
को मिल न सके उनका एक भी सुराग
कि उन्हें शर्मिंदा न होना पड़े कतई
नए-नवेले उत्तर-आधुनिक विश्व में
उसने कितना तो ध्यान रखा हमारी भावनाओं का
इस बार आया जबकि कहीं गया ही नहीं था
वह यहीं था हमारे ही बीच
पिछले टाइप्ड तानाशाहों के किरदारों से मुक्ति की युक्ति
में इतना मशगूल
इतना अंतर्धान
कि हमें दिखता नहीं था
पूरी तैयारी के साथ आया इस बार तो उसकी कद-काठी और रंग
बहुत आम लगता था और बहुत अपना-सा
उसने
नदी में डगन डालकर धैर्य से मछलियाँ पकड़ीं
उसकी तसवीरें छपती रहीं अखबारों में लगातार
उसने तो
सोप-ऑपेरा की औचित्य-अवधारणा में चमत्कारी चेंज ही ला दिया
टीवी पर कई कई दिनों तक
उसके फुटेज दिखाए जाते रहे जब वह
हमारी ही तरह
अपने बच्चों को स्कूल छोड़ने गया
और हज्जाम से गाल और गले पर
चलवाता रहा उस्तरा बिना किसी भी आशंका के
उसने कई प्रेम कर डाले और गजब तो यह
कि उसने स्वीकार भी किया सरेआम
महाभियोग झेलकर
उसने पेश किया
प्रेम के प्रति ईमानदार समर्पण का नायाब नमूना
और सबका दिल ही जीत लिया
धीरे धीरे
वह ऐसा सेलिब्रिटी दिखने लगा
कि छा गया पूरे ग्लोब पर अपनी मुस्कुराहट के साथ
राष्ट्रों का सबसे बड़ा संघ घबराकर अंततः
तय करने लगा अपने कार्यक्रम उसके मन-मुताबिक
तमाम धर्म राजनीति साहित्य दर्शन वगैरह
उसकी शैली से प्रभावित दिखने लगे बेतरह
इस तरह तमाम कारनामों के बावजूद
वह इतना शांत और शालीन दिखता था
कि उसकी इसी एक अदा पर रीझकर
दुनिया के सर्वाधिक प्रतिष्ठित शांति पुरस्कार
के लिए उसका नाम
सर्वसम्मति से निर्विरोध चुन लिया गया
अब सिरफिरों का क्या किया जाए
सिरफिरे तो सिरफिरे
जाने किस सिरफिरे ने फेंककर मार दिया उसे जूता
जो खेत की मिट्टी से बुरी तरह लिथड़ा हुआ था
और जिससे
नकार भरे कदमों की एक प्राचीन गंध आती थी।
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