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युवा कवि विमलेश त्रिपाठी की कविताएं- नदी और बिछड़ने का गीत

मेरे बचपन को अपनी गोद में समेटने वाली/ हाथ पकड़कर खुद के सीने पर तैराने वाली/ आज इतने वर्षों बाद /तुम्हें क्यों याद कर रहा हूं ?

युवा कवि विमलेश त्रिपाठी की कविताएं- नदी और बिछड़ने का गीत

1. नदी

( धर्मावति नदी को समर्पित)
मेरे बचपन को अपनी गोद में समेटने वाली
हाथ पकड़कर खुद के सीने पर तैराने वाली
आज इतने वर्षों बाद
तुम्हें क्यों याद कर रहा हूं ?
मेरे पैरों के निशान मिटे नहीं तुम्हारे किनारे से
मेरी छोटी नौकाएं बंधी छूट गई हैं उसी घाट पर
जहां से पार होते थे बाजार तक जाने वाले मुसाफिर
सुना है अब एक पुल बन गया है मजबूत
तुमने क्या सोचा - क्या कहा उस पुल के बनने पर
तुम हंसी कि रोईं
किसी को कुछ नही पता
यहां इतनी दूर इस शहर में मुझे भी नहीं मालूम
सूखने लगा है तुम्हारी देह का रक्त
सिराओं में भर गया है धूल-गर्द
क्या तुम अब बूढ़ी हो चली हो
क्या एक दिन मुझे मोबाईल पर देगा संदेश
तुम्हारे नहीं रहने का
वह मल्लाह जिसकी रोजी जुड़ी थी तुमसे ही कभी
औरतें कहां जाएंगी तुम्हारे नहीं रहने पर
किस किनारे तीज और जिऊतिया का पूरा होगा उनका व्रत
मरने के बाद हमारे गांव के लोगों की हड्डियां कहां ठंढी होंगी
अब तुम्हारे पास बचा है सिरफ आंसू जितना पानी
और संकरे परनाले जितनी छाती
क्या समय बदल गया है
हम अब किसी दूसरे समय में चले आए हैं
चलते-चलते अनजान
इस समय में तुम्हारे लिए कितनी जगह है मेरी मां
आज जो याद आ रही हो तुम बेतरह
तो कल क्या मैं पहली गाड़ी पकड़कर
जा पाऊंगा तुमसे मिलने बदहवास
यह किस समय में आ गया हूं
जहां से तुम तक लौटना असंभव हो गया है
क्या इस जन्म में
तुमसे फिर मिल पाऊंगा
देख पाऊंगा तुम्हे
किसी सुहागिन की तरह धधाते हुए..??

2. बिछड़ने का गीत
चले जाओ दूर समंदर के पार घने जंगलों में स्वर्ग-सी चमकीली किसी धरती पर
अब मैं तुम्हें नहीं पुकारूंगा
नहीं कहूँगा कि तुम्हारे होंठ बहुत खूबसूरत हैं
और मैं अपने होंठ से वहाँ एक झरने की तस्वीर बनाना चाहता हूँ
कि तुम्हारी देह पर रोपना चाहता हूँ
गुलमुहर का एक पेड़
कि बचपन से शब्द जो सँचकर रखा था
जिसे खर्चना था मुझे प्रेम कविताएँ लिखने में
तुम्हारे नाम
उन शब्दों को मैंने अब अपने लहू में मिल जाने दिया है
तुम चले जाओ
कि अब कभी गुलमुहर के खिलने का मौसम नहीं आएगा
हवा नहीं बहेगी दो लटों को एक साथ उड़ाती
बारिश नहीं होगी कभी
दो हथेलियों पर एक साथ
दो जिह्वाएँ नहीं उचरेंगी
एक ही शब्द एक साथ गहन एकांत में
किसी पहाड़ी पर सीतलहरी बीच
हम एक दूसरे को स्वेटर की तरह बुन नहीं पाएँगे
हां, तुम चले जाओ
इससे पहले कि समय मर जाय हमारे बीच
ऑक्सिजन जैसी किसी चीज के अभाव में
पृथ्वी यह रसातल में चली जाए काँपती थरथराती
अंधकूप बन जाय यह अंतरिक्ष
तुम चले जाओ
कि मैं फिर से लौट सकूँ अपनी ही अँधेरी खाइयों में
गहरे पाताल बीच
सदियों से गुम एक ढिबरी शब्द की तलाश करता।
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