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अजन्ता देव की दो कविताएं

मेरा मिथ्यालय और अन्य जीवन से

अजन्ता देव की दो कविताएं

मेरा मिथ्यालय

आमन्त्रण निमन्त्रण नहीं
अनायास खींच लेता है अपनी ओर
मेरा मिथ्यालय श्रेष्ठ जनों के बीच यहीं रचा जाता है
कलाओं का महारास
मेरे द्वार कभी बंद नहीं होते
ये खुले रहेंगे तुम्हारे जाने के बाद भी
अन्य जीवन से
किस लोक के कारीगर हो
कि रेशे उधेड़ कर अंतरिक्ष के
बुना है पटवस्त्र
और कहते हो नदी सा लहराता दुकूल
होगा नदी सा
पर मैं नहीं पृथ्वी सी कि धारण करूं यह विराट
अनसिला चादर कर्मफल की तरह
मुझे तो चाहिए एक पोशाक
जिसे कांटा-छांटा गया हो मेरी रेखाओं से मिलाकर
इतना सुचिक्कन कि मेरी त्वचा
इतने बेलबूटे की याद ना आए
हतभाग्य पतझर
सारे रंग छीन गये हों
अन्य जीवन से
इतना झीना जितना नशा
इतना गठित जितना षड्यंत्र
मैं हर दिन बदलती हूं चोला श्रेष्ठजनों की सभा में
आत्मा नहीं हूं मैं
कि पहने रहूं एक ही देह
मृत्यु की प्रतीक्षा में
अजन्ता देव के कविता संग्रह 'एक नगरवधू की आत्मकथा' से साभार
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