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चिंतन : अमेरिकी संसद से पीएम मोदी का विश्व को संदेश

बहुत ही कम विदेशी शासनाध्यक्षों को अमेरिकी संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करने का मौका मिलता है।

चिंतन : अमेरिकी संसद से पीएम मोदी का विश्व को संदेश
पीएम नरेंद्र मोदी की इस बार की अमेरिका यात्रा कई मायनों में यादगार कही जा सकती है। एमटीसीआर सदस्यता की प्रक्रिया पूरी होने और एनएसजी की सदस्यता के लिए यूएस का सर्मथन मिलने के अलावा नरेंद्र मोदी का अमेरिकी संसद के ज्वाइंट सेशन को संबोधित करना दुनिया में भारत का कद बढ़ने जैसा है। क्योंकि बहुत कम ही विदेशी शासनाध्यक्षों को अमेरिकी संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करने का मौका मिलता है।
अमेरिकी कांग्रेस में मोदी के भाषण का जादू इस कदर सिर चढ़कर बोला कि 48 मिनट के संबोधन में करीब 66 बार तालियां बजीं और 8 बार स्टैंडिंग ओवेशन दिया गया। तीन ऐसे मौके भी आए जब अमेरिकी सांसदों ने ठहाके भी लगाए। यूएस हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में मोदी के आते ही अमेरिका सांसदों ने खड़े होकर तालियां बजाईं। ताली तब तक बजती रही जब तक पीएम वहां मौजूद सांसदों से मिलते रहे। यह दौर चार मिनट तक चला। भाषण खत्म होने के बाद अमेरिकी सांसदों में मोदी का ऑटोग्राफ लेने की होड़ लग गई। कई सांसद हाथ मिलाने के लिए बेताब दिखे।
नरेंद्र मोदी की शख्सियत के आगे विश्व के सबसे ताकतवर देश के सांसदों का नतमस्तक होना वाकई किसी ऐतिहासिक पल से कम नहीं है। अचंभा इसलिए है कि यह वही देश है, जिसकी संसद ने एक समय नरेंद्र मोदी को अमेरिका आने के लिए वीजा देने से इनकार कर दिया था। नरेंद्र मोदी जब गुजरात के सीएम थे, उस समय उन पर गुजरात दंगे के दौरान राजधर्म नहीं निभाने का आरोप लगा था। उस समय मोदी के खिलाफ भारत में भी और विदेशों में भी खूब दुष्प्रचार किया गया था, उनके खिलाफ मामला अदालत तक गया था। उसी दरम्यान भारत से कुछ कांग्रेसी सांसदों ने बाकायदा पत्र लिख कर अमेरिका से मोदी को वीजा नहीं देने का आग्रह किया था।
हालांकि मोदी अदालतों में बेदाग साबित हुए। जब अमेरिका ने देखा कि मोदी के खिलाफ अभियान राजनीति से प्रेरित है, तब उसे अपनी भूल का एहसास हुआ था। फिर उसने मोदी के खिलाफ लगे सभी प्रतिबंध हटा लिए। अब जब मोदी पीएम बने हैं, तब से मोदी भारत और अमेरिका के संबंधों को और मजबूती दे रहे हैं। दो साल में चार बार वे अमेरिका जा चुके हैं। सात बार अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से मिल चुके हैं। मैडिसन स्क्वायर, सिलिकॉन वैली में वे अपने व्यक्तित्व की छाप छोड़ चुके हैं। इस यात्रा से मोदी का दुनिया में ग्लोबल लीडर के रूप में रुतबा और बढ़ गया है। इस समय इस्लामिक आतंकवाद दुनिया की बड़ी चुनौती है। भारत इससे पीड़ित है। आतंकवाद की नर्सरी कहां है यह भी सभी जानते हैं।
मोदी ने अमेरिकी कांग्रेस का इस्तेमाल आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई की जरूरत को रेखांकित करने के लिए किया। वहां से पीएम ने बिना नाम लिए पाकिस्तान को बेनकाब किया। अमेरिका को एहसास दिलाया कि आतंकवाद को पालने-पोसने वालों को अलग-थलग करना जरूरी है। इस यात्रा की एक और उपलब्धि है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने पठानकोट हमले के गुनहगारों को सजा दिलाने में ढीले रवैये अपनाने के लिए पाकिस्तान को फटकार भी लगाई। इसी के साथ अमेरिका ने भारत के साथ मिलकर ग्लोबल आतंकवाद के खिलाफ लड़ने का संकल्प दोहराया है।
इसके साथ ही अर्थव्यवस्था के लिहाज से भी भारत और अमेरिका मिलकर विश्व में बड़ी भूमिका निभा सकता है। भारत वैश्विक मंदी में भी तेजी से ग्रांथ करने वाला विकासशील देश बना हुआ है। अमेरिका चीन की विस्तारवादी नीति से नाखुश है और वह भारत को अपना स्वाभाविक साझीदार मानता है। यूएस, जापान और भारत की तिकड़ी एशिया में शक्ति संतुलन के लिए जरूरी है। हालांकि मोदी चीन के साथ भी मजबूत संबंध चाहते हैं। यूएस से दोस्ती बढ़ाने के साथ भारत को रूस से रिश्ते का भी ध्यान रखना जरूरी है।
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