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नवाज से पीएम मोदी की मुलाकात संबंधों में पड़ी बर्फ को पिघलाने की कोशिश

अगले साल प्रधानमंत्री मोदी सार्क सम्मेलन में हिस्सा लेने पाकिस्तान जाएंगे।

नवाज से पीएम मोदी की मुलाकात संबंधों में पड़ी बर्फ को पिघलाने की कोशिश
शंघाई सहयोग संगठन सम्मेलन से इतर रूस के शहर उफा में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के बीच हुई करीब एक घंटे की मुलाकात दोनों देशों के रिश्तों को पटरी पर लाने की दिशा में एक नई शुरुआत मानी जा सकती है। अगले साल जब प्रधानमंत्री मोदी सार्क सम्मेलन में हिस्सा लेने पाकिस्तान जाएंगे, तब तक उम्मीद की जानी चाहिए कि दोनों देश खासकर पाकिस्तान ऐसा कुछ नहीं करेगा जिससे संवाद की प्रक्रिया आरंभ में ही फिर से टूट जाए।
यह सच है कि भारत पाकिस्तान के संबंध ठीक नहीं हैं। पिछले कुछ महीनों से दोनों मुल्कों के संबंधों में तल्खी साफ नजर आने लगी थी, लेकिन अब इस मुलाकात के बाद दोनों के रिश्तों पर जमी बर्फ कुछ हद तक पिघली है। दोनों देश आपसी मेलजोल बढ़ाने के रास्ते तलाशते नजर आ रहे हैं। अब सितंबर महीने में बीएसएफ और पाकिस्तानी रेंर्जस के बीच बातचीत होगी। वहीं दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नियमित अंतराल पर मिलते रहेंगे। इसके अलावा दोनों देशों के मिलिट्री ऑपरेशंस के डायरेक्टर जनरल के स्तर पर भी समय-समय पर वार्ता करने पर सहमति बनी है।
इन कदमों से सीमा पर तनाव कम करने में मदद मिलेगी। साथ ही बातचीत की प्रक्रिया आरंभ होने से नए-नए रास्ते खुलने की उम्मीद भी बरकरार रहेगी। इसके साथ ही पाकिस्तान ने मुंबई हमले से संबंधित मुकदमे में तेजी लाने को कहा है। वह हमले में शामिल आतंकियों के वॉयस सैंपल देने पर भी राजी हुआ है। वॉयस सैंपल मिलने और उसे आतंकियोंकी आवाजों से मैच होने के बाद मुंबई हमले पर भारत का पक्ष और मजबूत होगा। चीन जैसे देश, जो सबूतों की कमी की बात पर जकीउर रहमान लखवी पर कार्रवाई से बचते रहे हैं, उन्हें भारत के दावों को नजरअंदाज करना कठिन होगा। वहीं पाकिस्तान पहली बार हर तरह के आतंकवाद की निंदा करने को मजबूर हुआ है। हम जानते हैं कि आतंकवाद को वह अच्छे और बुरे की र्शेणी में बांट कर देखता रहा है। भारत पाकिस्तान सहित अपने सभी पड़ोसी देशों से मधुर संबंध चाहता है।
सत्ता में आने के बाद नरेंद्र मोदी भी कई दफा कह चुके हैं कि वे पड़ोसी देश पाकिस्तान से सभी मतभेदों को हल कर अच्छे संबंध बनाना चाहते हैं। इसके लिए वे लगातार प्रयास भी कर रहे हैं। तमाम तनावों के बाद भी वे हर छोटे-बड़े मौकों पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शरीफ से संवाद कायम करते रहे हैं। सत्ता में आने के बाद यह उनकी नवाज से तीसरी मुलाकात है। यह विडंबना है कि पाकिस्तान की ओर से हर बार इसमें कोई न कोई अड़ंगा लगाया जाता रहा है। गत वर्ष अच्छी शुरुआत हुई थी पर भारत के विरोध के बाद भी उसने कश्मीरी अलगाववादियों से मुलाकात कर रिश्तों को बेपटरी कर दिया। यही नहीं भारत की ओर से जब भी कोई अच्छी पहल होती है वहां की सेना संघर्षविराम का उल्लंघन करते हुए गोलीबारी आरंभ कर देती है। और तो और पाक सेना आतंकियों की घुसपैठ कराकर भारत की भूमि को लहूलुहान करने से भी बाज नहीं आती है।
जाहिर है, संवाद की प्रक्रिया को बनाए रखने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी पाकिस्तान के ऊपर है। प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनकी सरकार माहौल को किस हद तक शांतिपूर्ण बनाए रखेंगे इस पर बहुत कुछ निर्भर करेगा। उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वे सेना और आतंकवादियों को काबू में कर पाएंगे और उनके भारत विरोधी कदमों पर अंकुश लगा पाएंगे। नई शुरुआत का भविष्य इसी पर निर्भर करेगा।
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