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आजादी के सपने साकार करने की चुनौती बरकरार

1947 से अब तक हमने सात दशक का लंबा सफर तय किया है।

आजादी के सपने साकार करने की चुनौती बरकरार
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हमारी आजादी को सत्तर साल हो गए। हम सभी अवगत हैं कि कितनी मुश्किलों-संघर्षों से देश को स्वतंत्रता मिली। आज जब हम स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं, तो इस गौरवमयी बेला में पीछे मुड़कर देखना जरूरी है कि इन सत्तर वर्षों में हम उम्मीदों की कसौटी पर खरा उतरे हैं? क्या हम आम आदमी के जीवन को और बेहतर बना सकते थे? क्या हम देश को उस मुकाम तक पहुंचा पाए हैं, जहां उसे होना चाहिए था?

यदि इन सवालों का जवाब नहीं है, तो आखिर कमी कहां रह गई? इसमें कोई दोराय नहीं कि 1947 से अब तक हमने सात दशक का लंबा सफर तय किया है। इस दौरान हमने कई उपलब्धियां भी हासिल की हैं। चाहे खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता हो, अंतरिक्ष विज्ञान में कामयाबी हो, संचार क्रांति हो, श्वेत क्रांति हो, आर्थिक प्रगति हो, भारी उद्योग हो, इन क्षेत्रों में हम काफी आगे आए हैं।

लेकिन बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं, जहां हमने बेहतर काम नहीं किया है। ये ऐसे क्षेत्र हैं, जिनकी नाकामियां हमारी उपलब्धियों पर भारी हैं। गरीबी उन्मूलन की दिशा में हमने बेहतर काम नहीं किया है। स्वाधीनता के 70 साल बाद भी हमारी एक तिहाई से अधिक आबादी गरीब है। सामाजिक सुरक्षा और मानव विकास में भी हम फिसड्डी हैं। बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में भी योजनाबद्ध तरीके से हमने काम नहीं किया है।

हमने बेतरतीब बुनियादी ढांचा खड़ा किया है। कहीं एक्सप्रेस वे, हाई स्पीड ट्रेन, तो कहीं कच्ची सड़क, कहीं सड़कें भी नहीं। रेल लाइन का संजाल जैसा आजादी के समय था, लगभग आज भी हम उसी स्थान पर हैं। कुछेक सौ किमी ही हम जोड़ सके हैं। देश मेंे रेलवे का विस्तार किया जा सकता था। बिजली के उत्पादन में भी हम पीछे हैं। सबको बिजली नहीं दे पाए हैं। सभी नागरिकों को पेयजल उपलब्ध नहीं करवा पाए हैं।

अफोर्डेबल आवास की दिशा में भी हमने कुछ खास काम नहीं किया है। सुविधा पहुंचाने के मामले में भी हमने भेदभाव किया। शहरों में अधिक सुविधाएं दीं, जबकि गांवों में नहीं के बराबर। हमने योजनाबद्ध तरीके से न ही शहरीकरण किया है और न ही गांवों का विकास। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे दो अहम क्षेत्र में हमने अपेक्षित प्रगति नहीं की है।

हमारा इतिहास ज्ञान से परिपूर्ण भूमि का रहा है, लेकिन आजादी के बाद राष्ट्रीय शिक्षा पर जितना काम होना चाहिए था, नहीं हुआ। इसे राज्यों के हवाले छोड़ दिया और बाद में बाजार के हवाले। जबकि हमारी शिक्षा पद्धति जैसी होगी, भावी पीढ़ी भी वैसी ही होगी। आज भी देश में मेकाले की शिक्षा पद्धति हैैै। भाषा के स्तर पर भी हमने राष्ट्रीय सोच के साथ काम नहीं किया।

वैसे ही स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी हमने उल्लेखनीय काम नहीं किया है। गोरखपुर जैसे हादसे हमारी समूची सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोलती है। सरकारी अस्पतालों की हालत खस्ता है। गरीबों के लिए इलाज दुरूह बना हुआ है। आजादी से अब तक आर्थिक नीति ऐसी अपनाई जो यूरोप व अमेरिका की चकाचौंध से उधार ली थी और जिसके चलते अमीर-गरीब के बीच फासला बढ़ता ही गया।

हमें अपनी जरूरतों के मुताबिक आर्थिक नीति अपनानी चाहिए थी। हमने जवाबदेह प्रशासनिक तंत्र भी खड़ा नहीं किया। सामाजिक न्याय का सपना भी अधूरा है। हमारा न्याय तंत्र भी मुकदमों के बोझ से दबा पड़ा है। आज हमारे सामने जातिवाद, आतंकवाद, नक्सलवाद, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता, असमानता, बेरोजगारी आदि समस्याएं हैं।

श्रेष्ठ संविधान होने के बावजूद सही नीतियों की कमी, सरकारी उदासीनता, लालफीताशाही के चलते ये सभी समस्याएं उत्पन्न हुईं। आज वर्तमान सरकार व आने वाली सरकारों के सामने इन समस्याओं को हल करना चुनौती रहेगी। आज हमें इन समस्याओं से मुक्ति का संकल्प लेना होगा, तभी सही मायने में आजादी के सपने साकार होंगे।

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