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सुशील राजेश का लेख : जेबी संस्था नहीं पीएम केयर्स

पीएम केयर्स फंड और राष्ट्रीय आपदा राहत कोष में क्या बुनियादी फर्क है? दोनों अलग-अलग कोष हैं। दोनों में स्वेच्छा से दान दे सकते हैं, लेकिन पीएम केयर्स का धन, आपदा राहत कोष में, स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाला यह धर्मार्थ न्यास है। जिसमें रक्षा मंत्री, गृह मंत्री और वित्त मंत्री पदेन न्यासी हैं। यह कोई पारिवारिक ट्रस्ट नहीं है।

PM केयर्स फंड में 38 सरकारी कंपनियों ने दान दिया 2105 करोड़ रुपये, CSR फंड से किया गया डोनेट
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PM केयर्स फंड

सुशील राजेश

सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि पीएम केयर्स फंड और राष्ट्रीय आपदा राहत कोष में क्या बुनियादी फर्क है? दोनों अलग-अलग कोष हैं। दोनों में स्वेच्छा से दान दे सकते हैं, लेकिन पीएम केयर्स का धन, आपदा राहत कोष में, स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाला यह धर्मार्थ न्यास है। जिसमें रक्षा मंत्री, गृह मंत्री और वित्त मंत्री पदेन न्यासी हैं। यह कोई पारिवारिक ट्रस्ट नहीं है। यदि सरकार बदलती है तो जो देश का नेतृत्व संभालेंगे, वे स्वतः ही इस न्यास से जुड़ जाएंगे। यह प्रधानमंत्री मोदी का कोई जेबी कोष नहीं है, जिसकी पारदर्शिता और ईमानदारी पर सवाल उठाए जाते रहे हैं। सर्वोच्च अदालत के फैसले के बावजूद सवाल उठाने और संदेह करने के सिलसिले जारी हैं।

कांग्रेस मीडिया प्रकोष्ठ के प्रभारी रणदीप सुरजेवाला की टिप्पणी है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला पारदर्शिता और लोगों के प्रति सरकार के उत्तरदायित्व पर प्रहार है। पार्टी के एक अन्य प्रवक्ता टीवी चैनल की बहस के दौरान यही राग अलापते रहे कि जज भगवान नहीं होते। दरअसल उनका मन्तव्य स्पष्ट था। सर्वोच्च अदालत ने तभी इस मुद्दे में राजनीतिक बू सूंघ ली थी, जब अप्रैल में पीएम केयर्स फंड को शीर्ष अदालत में चुनौती दी गई थी। हालांकि उस याचिका को तुरंत खारिज कर दिया गया और न्यायिक पीठ ने चेतावनी दी थी कि याचिका वापस ली जाती है अथवा भारी जुर्माने का दंड सुनाया जाए! नतीजतन यह मुद्दा वहीं समाप्त हो जाना चाहिए था कि पीएम केयर्स फंड को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती,क्योंकि आपातकाल और जरूरत के वक्त सरकार ऐसे कोष बना सकती है।

बेशक यह महामारी और गंभीर संकट का दौर है। ऐसे कोष धर्मार्थ माने जाएं, जबकि आपदा राहत कोष पूरी तरह सरकारी हैं। पीएम केयर्स फंड को बजटीय समर्थन भी नहीं है। आॅडिट दोनों कोषों का होना चाहिए। बेशक नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक आपदा कोष का आॅडिट करे और पीएम केयर्स का आडिट किसी मान्यता प्राप्त कंपनी से करवाया जाए। यदि पीएम केयर्स फंड का आडिट भी कैग कर सके, तो बेहतर और निष्पक्ष माना जाएगा। उसकी रपट पर संसद में भी चर्चा हो सकेगी, लेकिन यहां स्पष्ट होना अनिवार्य है कि पीएम कोष के दानदाता सरकारी मंत्रालय नहीं हैं। विभिन्न बड़ी कंपनियों, संगठनों और देश के नागरिकों ने संकटकाल के मद्देनजर आर्थिक मदद की है। धर्मार्थ कोष की वेबसाइट पर दान के ब्योरे दिए गए हैं कि 3100 करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि दान में आई। विदेशों से भी 39 लाख रुपये से अधिक की रकम आई है। उसमें से 2000 करोड़ रुपये वेंटिलेटर पर, प्रवासी मजदूरों की मदद के लिए 1000 करोड़ रुपए विभिन्न राज्यों को और 100 करोड़ रुपए कोरोना वायरस के परीक्षण किए जा रहे टीके के लिए आवंटित किए गए हैं। क्या विपक्ष को इस ब्योरे पर कोई आपत्ति है? दरअसल हम भी चाहेंगे कि पीएम केयर्स फंड के दानवीरों के नाम और राशि को भी सार्वजनिक किया जाए तो विरोधियों को सांप सूंघ जाएगा।

एक और तथ्य गौरतलब है, जो सामने आया है कि तेल और बिजली से जुड़े 38 सार्वजनिक उपक्रमों ने भी सीएसआर के तहत कुल 2105 करोड़ रुपये पीएम केयर्स फंड में दान दिए हैं। उस रकम को वेबसाइट पर दिखाया क्यों नहीं गया? जवाब यह हो सकता है कि यह कोष कोई सार्वजनिक प्राधिकरण नहीं है, लिहाजा सूचना के अधिकार कानून के दायरे में नहीं आता,लिहाजा कोष का पूरी तरह खुलासा करना भी न्यायोचित नहीं है। सवाल यह भी हो सकता है कि दानवीरों के नाम इसलिए भी छुपाए गए होंगे, क्योंकि उस सूची में चीनी कंपनियों के नाम भी होंगे। तब चीन के साथ हमारे रिश्ते इतने कड़वे नहीं हुए थे और न ही चीन की कंपनियों पर पाबंदियां चस्पा की गई थी। बहरहाल इस बार याचिका एक एनजीओ सेंटर फाॅर पब्लिक इंटररेस्ट लिटिगेशन ने दी थी और राशि स्थानांतरण को मुद्दा बनाया था। सर्वोच्च अदालत ने उस पक्ष और दलील को भी खारिज कर दिया है। अब इस निष्कर्ष पर भी सरकार के विरोधी सहमत न हों तो फिर देश में कानून के संदर्भ में अंतिम निर्णय किसका माना जाएगा।

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