Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

आलोक पुराणिक का लेख : पेट्रोल-डीजल के दाम और सियासत

केंद्र सरकार अपने कर में कटौती नहीं चाहती। राज्य सरकारें अपने हिस्से में कटौती नहीं चाहतीं, इसलिए तेल का अर्थशास्त्र सतत राजनीति को जन्म देता रहेगा। कटौती कहीं नहीं होगी, आरोप और प्रत्यारोप बराबर चलते रहेंगे। पर तेल के अर्थशास्त्र का एक आयाम और है। जब भाव बढ़ते हैं तो महंगाई बढ़ना तय होता है।

BS6 Fuel: बढी हुई कीमतों के साथ 1 मार्च से पेट्रोल पंपों पर मिलेगा बीएस-6 ईंधन, जानें क्या होंगे इससे फायदे
X
प्रतीकात्मक फोटो

आलोक पुराणिक

पेट्रोल-डीजल के भाव फिर चर्चा में हैं, आर्थिक और राजनीतिक वजहों से। वैसे पेट्रोल और डीजल के भावों के तेवर आर्थिक के साथ राजनीतिक तौर पर भी बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। ग्लोबल राजनीति से लेकर घरेलू राजनीति तक कच्चे तेल, पेट्रोल और डीजल के भावों के इर्द गिर्द घूमती है। ग्लोबल राजनीति और कच्चे तेल के भावों में एक पक्का रिश्ता है। सऊदी अरब, अमेरिका, रूस समेत इस तेल अर्थशास्त्र और तेल राजनीति के बड़े खिलाडी हैं। भारत की हैसियत कच्चे तेल के ग्लोबल बाजार में एक ग्राहक की है। पर भारत में कच्चे तेल के भावों से ज्यादा महत्व और असर उन भावों का पड़ता है, जो भारत में ग्राहकों से वसूले जाते हैं। कच्चे तेल से जो दो उत्पाद सबसे महत्वपूर्ण निकलते हैं-डीजल और पेट्रोल, इनके भावों को लेकर राजनीति बराबर जारी है।

एक जुलाई 2020 को चेन्नई में पेट्रोल का भाव 83.63 रुपये प्रति लीटर था और डीजल चेन्नई में 77.72 रुपये प्रति लीटर बिक रहा था। दिल्ली में पेट्रोल के भाव 80.43 रुपये लीटर थे और डीलर 80.53 रुपये लीटर बिक रहा था। कोलकाता में पेट्रोल का भाव 82.10 रुपये प्रति लीटर था और डीजल के भाव 75.64 रुपये लीटर बिक रहा था। मुंबई में एक लीटर पेट्रोल का भाव 87.19 रुपये प्रति लीटर था और डीजल 78.63 रुपये प्रति लीटर बिक रहा था। ग्लोबल बाजारों में कच्चे तेल के भाव तमाम वजहों से कम हुए फिर थोड़े मजबूत हुए। पेट्रोलियम मंत्रालय के आंकड़ों के हिसाब से कच्चे तेल की भारतीय टोकरी या इंडियन बास्केट के भाव प्रति बैरल अप्रैल 2020 में 19.90 डालर प्रति बैरल थे, इनमें मजबूती आई मई में 30.60 प्रति बैरल पर जा पहुंचे। एक बैरल में 159 लीटर होते हैं। पर देखने की बात यह है कि कच्चे तेल में सस्ताई का फायदा आम तौर पर भारतीय उपभोक्ताओं को नहीं पहुंचता। तेल की सस्ताई का गणित यह है कि सरकार को तेल की खरीद पर कम खर्च होना होता तो वह इन सस्ते भावों का फायदा या आशिंक फायदा ग्राहकों को नहीं देती। केंद्र सरकार डीजल और पेट्रोल पर अपने हिस्से का कर बढ़ा देती है तो डीजल और पेट्रोल ग्राहकों को लिए महंगा हो जाता है। यानी ग्लोबल बाजार में अगर कच्चा तेल सस्ता होता है, तो सरकार को उसका फायदा मिल जाता है। पर ग्राहक की जेब से जाने वाली रकम में कमी नहीं आती।

इस स्थिति को विपक्षी दल लूट कह सकते हैं, सरकार की लुटेरी वृत्ति कह सकते हैं। इस स्थिति को सरकार वक्त की जरुरत बता सकती है। कोरोना काल में जब सरकारी खजाने खाली हो गए हैं, तब सरकार किस भी जरिये से संसाधनों को बढ़ाने की योजना बना रही है तो यह अनुचित नहीं है, ऐसा भाव सरकारी प्रवक्ताओं का रहता है। कुल मिलाकर स्थिति यह रहती है कि विपक्ष सरकार पर लूट का आरोप लगा सकता है और सरकार कह सकती है कि कोई लूट नहीं है, यह संसाधन संग्रह है।

एक ही आइटम के भाव देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग हैं। वजहें साफ हैं कि करों की दर से भाव ऊपर या ज्यादा हो जाते हैं। डीजल और पेट्रोल पर केंद्र सरकार भी कर वसूलती है और राज्य सरकारें भी कर वसूलती हैं। पेट्रोल और डीजल की जो कीमत उपभोक्ता चुकाता है, उसके मोटे तौर पर चार हिस्से होते हैं। पहला हिस्सा लागत पेट्रोल-डीजल की लागत, दूसरा हिस्सा केंद्र सरकार का हिस्सा यानी केंद्र सरकार द्वारा लिया जाने वाला कर, तीसरा हिस्सा राज्य सरकार द्वारा लिया जाने वाला कर। चौथा हिस्सा डीलर का कमीशन यानी जिस पेट्रोल पंप से पेट्रोल लिया जा रहा है, उसका हिस्सा। इन चारों तत्वों में किसी भी तत्व में कमी हो तो भावों में कमी होनी चाहिए। पर अगर कच्चे तेल की लागत में कमी हो जाए और केंद्र सरकार कर का हिस्सा बढ़ा दे तो फिर कमी होने के आसार नहीं होंगे।

केंद्र सरकार ने 14 मार्च को पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में तीन प्रति लीटर की बढ़ोत्तरी की थी और फिर पांच मई को पेट्रोल में 10 रुपये प्रति लीटर की और डीजल में 13 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोत्तरी की। इन बढ़ोत्तरियों से ही केंद्र सरकार को करीब 2 लाख करोड़ रुपये के अतिरिक्त कर संग्रह की उम्मीद है। दो लाख करोड़ रुपये खासी बड़ी रकम है, यह रकम कितनी बड़ी है, इसका अंदाज इस बात से लग सकता है कि कोरोना पूर्व काल में जीएसटी से औसतन हर महीने करीब 1 लाख करोड़ रुपये का संग्रह होता था। कोरोना के बाद के हालात खराब हो गये हैं। कर संग्रह में बढ़ोत्तरी की बजाय इसमें सिकुड़ाव के आंकड़े देखने को मिल रहे हैं।

मोटा गणित यह है कि डीजल और पेट्रोल की जो कीमत अंत में ग्राहक चुका रहा है, उसका करीब दो तिहाई हिस्सा सिर्फ और सिर्फ कर है, जो केंद्र और राज्य सरकारें वसूलती हैं। केंद्र उत्पाद शुल्क वसूलता है और राज्य सरकारें वैट के नाम पर शुल्क वसूलती हैं। कांग्रेस अगर चाहे तो अपने शासन वाले राज्यों के मुख्यमंत्रियों को आदेश दे कर डीजल और पेट्रोल के राज्य वाले कर को कम करवा सकती है। पर अगर राज्य स्तर पर कर संग्रह कम हुआ तो राज्य सरकारों के संसाधन कमजोर होंगे। कोरोना काल में राज्य सरकारों के खजाने पर भी भारी बोझ है। वो भी अपने हिस्से के करों में कटौती नहीं चाहते।

केंद्र सरकार अपने हिस्से में कटौती नहीं चाहती। राज्य सरकारें अपने हिस्से में कटौती नहीं चाहतीं। इसलिए तेल का अर्थशास्त्र सतत राजनीति को जन्म देता रहेगा। कटौती कहीं नहीं होगी, आरोप और प्रत्यारोप बराबर चलते रहेंगे। पर तेल के अर्थशास्त्र का एक आयाम और है। डीजल और पेट्रोल के भाव अगर लगातार बढ़ते हैं तो फिर लगभग हर आइटम के भाव बढ़ना तय होता है। क्योंकि लगभग हर वस्तु या सेवा की लागत में परिवहन लागत किसी ना किसी रुप में शामिल होती है। इसलिए पेट्रोल और डीजल की महंगाई लगभग हर आइटम को ही महंगा करती है। इसलिए पेट्रोल डीजल के बढ़े हुए भाव महंगाई का मुद्दा बन जाते हैं। पर यह मुद्दा भोथरा हो जाता है इसलिए कि जो विपक्षी दल पेट्रोल और डीजल की महंगाई का विरोध कर रहे होते हैं, वो भी अपनी सरकारों से डीजल और पेट्रोल पर लगनेवाले करों में कटौती नहीं करवा पाते। अर्थशास्त्र और राजनीति टकरा जाती है। इसलिए पेट्रोल और डीजल के भावों पर राजनीतिक प्रहसन खूब चलेंगे पर इसके भाव उपभोक्ताओं के लिए कम होंगे, ऐसी उम्मीद निरर्थक है। क्यों सब सरकारों को अपने संसाधनों के बारे में सोचना है।

Next Story