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शरद कुमार यादव का लेख : महामारी में संवरा पर्यावरण

महामारी की वजह से आया यह परिवर्तन इंसान को सुखद अहसास के साथ-साथ कुछ सबक व चेतावनी भी देता है। इतिहास गवाह है कि जब-जब इस प्रकार की महामारियां आई हैं, उसके पर्यावरण ने साकारात्मक करवटें ली हैं।

शरद कुमार यादव का लेख : महामारी में संवरा पर्यावरण

शरद कुमार यादव

जहां एक ओर कोविड-19 ने दुनिया भर में चुनौतियों को पैदा किया है। वही दूसरी तरफ, प्रकृति की सुंदरता और जीवंतता भी लौटी है। महामारी की वजह से आया यह परिवर्तन इंसान को सुखद अहसास के साथ-साथ कुछ सबक व चेतावनी भी देता है। इतिहास गवाह है कि जब-जब इस प्रकार की महामारियां आई हैं, उसके पर्यावरण ने साकारात्मक करवटें ली हैं। क्या जब कोरोना का खतरा खत्म हो जाएगा, तब यहीं पर्यावरण की स्थिति बरकरार रह पाएगी? ऐसे कई सारे सवाल हैं जिनके उत्तर भविष्य के गर्भ में छुपे हैं।

पर्यावरणविद् चन्द्र भूषण कहते हैं कि कोविड-19 के कारण जो पर्यावरणीय सुधार दिख रहे हैं, यह महज अल्पकालिक है। वर्तमान महामारी और पर्यावरण के लिहाज से 1610 में लेटिन अमेरिका में हुए चेचक के प्रकोप को समझना जरूरी है। इस बीमारी की वजह से वहां 5 करोड़ लोगों की मौत हो गई थी। उस दौरान भी कार्बन उत्सर्जन की समस्या बहुत हद तक कम हुई थी, परंतु उसके बाद आर्थिक पुनर्विकास के लिए बृहद स्तर पर जंगलों का दोहन किया था। इतिहास मे ऐसे कई उदाहरण मिलते है जो इस बात की पुष्टि करते है कि महामारियों ने पर्यावरण पर गहरी छाप छोड़ी है, लेकिन महामारी के फौरन बाद आर्थिक विकास की रफ्तार को बढ़ावा देने के लिए प्राकृतिक संसाधनो का बड़े पैमाने पर दोहन भी किया गया है। पद्मभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी कहते है कि हमारे पास वर्तमान समय में प्रकृति को समझने का सही मौका है। प्रकृति के साथ छेड़छाड़ के दुष्परिणाम का अंदाजा कोरोना-कहर से लगाया जा सकता है। अन्य पर्यावरणविदों का भी मानना है कि यह वायरस मनुष्य और प्रकृति के बीच पैदा हुए प्राकृतिक असंतुलन का ही दुष्परिणाम है।

दरअसल, विगत कुछ दशकों से हो रहे परिवर्तन, बेरोकटोक आर्थिक विकास और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन ने पारिस्थितिकीय तंत्र के अनुचित तथा असंतुलित प्रयोग को बढ़ाया है। नतीजतन,जैविक और प्राकृतिक असंतुलन की स्थिति पैदा हुई है। पर्यावरणीय विसंगतियों का खुलासा करती विश्व मौसम विज्ञान संगठन द्वारा जारी रिपोर्ट द स्टेट ऑफ द ग्लोबल क्लाइमेट बताती है कि हाल के वर्षों में ग्लोबल वार्मिंग के कारण तापमान बढ़ोतरी के रिकॉर्ड टूटे हैं। मसलन, जहां वर्ष 2019 सबसे गर्म वर्ष रिकॉर्ड दर्ज किया गया और वही वर्ष 2010-2019 के दशक को सबसे गर्म दशक के रूप में रिकॉर्ड किया गया।

ये तथ्य हमें सोचने पर मजबूर करते हैं कि आखिर पिछले कुछ दशकों में ऐसा क्या हुआ कि प्रकृति की ये दुर्गति हुई है। यकीनन संकट के इस दौर में मनुष्य के अति-भौतिकवाद,उत्पादनवाद और उपभोगवाद को विकास का पर्याय मान लेने की मानसिकता पर सवाल उठा है। पर्यावरणविद वंदना शिवा कहती है कि वैश्वीकृत औद्योगिक व्यवस्था, अपर्याप्त खाद्य और वर्तमान कृषि का मॉडल न केवल सृष्टि के अन्य प्रजातियों के पारिस्थितिक आवास में लगातार घुसपैठ कर रहा है बल्कि जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की अखंडता और स्वास्थ्य के प्रति भी असम्मान का भाव पैदा कर रहा है। परिणाम स्वरूप कोरोना जैसे नई-नई बीमारियां मानव जीवन में दस्तक दे रही है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने अपनी एक रिपोर्ट मे इस बात की पुष्टि भी कर चुका है कि मनुष्यों में हर चार महीने में एक नई संक्रामक बीमारी सामने आती है। इन बीमारियों में से 75 फीसदी बीमारी जानवरों से आती है। इसके बावजूद, इंसान यह भूलता जा रहा है जैव-विविधता को चोट पहुंचना कितना खतरनाक है।

इसीलिए अगर हमे वाकई आर्थिक विकास और संवहीयता के बीच सह-अस्तित्व की भावना बनाए रखनी है तो उपभोग और जीवन-शैली को इस तरह का बनाना पड़ेगा जिससे प्रकृति पर नकारात्मक असर न पड़े। इस प्रसंग में महात्मा गांधी को उध्दृत करना समीचीन होगा। गांधी अपनी पुस्तक हिन्द स्वराज में कहते हैं कि पृथ्वी सभी मनुष्यों की जरूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त संसाधन प्रदान करती है, लेकिन लालच पूरा करने के लिए नहीं। गांधी जी इस पंक्ति को आत्मसात करने के साथ प्रकृति के साथ एकात्मकता, समन्वय और सह-अस्तित्व का भाव ही सृष्टि में संतुलनपरक है। अत: महामारी और पर्यावरणीय विसंगतियों को दूर करने के लिए आर्थिक स्तर पर मूलभूत संरचनात्मक बदलाव लाने होंगे। इस बीमारी ने हमंे यह अवसर प्रदान किया है कि स्थानीय और वैश्विक स्तर पर अर्थव्यवस्था और पर्यावरणीय राजनीति को पारिस्थिकीय सम्मान और न्याय के तर्ज पर पुनर्भाषित किया जाए। भूमंडलीकरण के बरक्स स्थानीयकरण को बढ़ावा देने की भी चर्चा हो रही है, लेकिन हमे यह नहीं भूलना चाहिए कि इस बीमारी की तरह पर्यावरणीय समस्या भी वैश्विक है, इसलिए रोजगार को बढ़ावा देने के साथ-साथ वैश्विक संस्थाओं मे सहयोग और निवेश को भी मजबूत किया जाना आवश्यक है। न केवल हरित अर्थव्यवस्था और पर्यावरणीय से जुड़े कार्यक्रम को बढ़ावा देने की जरूरत है बल्कि व्यक्तिगत, कानूनी व प्रबंधकीय स्तर पर भी परिस्थिकीय-प्रबंधन व संरक्षण को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इन प्रयासों, नवाचारों और राजनीतिक इच्छा-शक्ति के सहारे हम महामारी संकट से उबरने में कामयाब हो सकते हैं।

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