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आम चुनावों में मतदान प्रतिशत बढ़ने के मायने

जनता को लगने लगा है कि वे अपने वोट के सहारे अपनी किस्मत बदल सकते हैं

आम चुनावों में मतदान प्रतिशत बढ़ने के मायने
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नई दिल्‍ली.लोकतंत्र को जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए शासन कहा गया है। यह ऐसी शासन व्यवस्था है जिसमें जनता अपना शासक खुद चुनती है। लोकतंत्र का वजूद बना रहे इसके लिए जरूरी है कि जनता मतदान में बढ़ चढ़कर हिस्सा ले। वर्तमान में 16वीं लोकसभा के लिए संपन्न अब तक चार चरणों के मतदान में रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस बार दिल्ली के लोगों ने लोकसभा चुनाव के 30 सालों का रिकॉर्ड तोड़ते हुए 64 प्रतिशत से ज्यादा मतदान किया। यही स्थिति उत्तर-पूर्व के राज्यों और हरियाणा में भी देखी गई है।

जहां-जहां भी अब तक लोकसभा के लिए चुनाव हुए हैं लोगों ने बढ़ चढ़कर भाग लिया है। लोकसभा चुनाव, 2014 में मतदान का बढ़ा प्रतिशत क्या संकेत कर रहा है? चुनावी बहस में बहुत से लोग इसे मोदी लहर से भी जोड़ रहे हैं। सच्चाई जो भी हो एक बात से इंकार नहीं किया जा सकता हैकि देश में बदलाव की लहर है। सत्ता पक्ष से लोगों में भारी नाराजगी है। ऐसा देखा गया हैकि जब-जब बदलाव की बयार बहती है तब-तब भारी मतदान होते हैं। हालांकि इसका एक दूसरा पहलू भी हैकि देश के नागरिक अब जागरूक हो रहे हैं।

क्योंकि गत वर्ष छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, मिजोरम, दिल्ली और राजस्थान में हुए विधानसभा चुनावों में भी मतदान का नया रिकॉर्ड बनते हुए हमने देखा है। इस तरह लोकतंत्र की टूट रही जड़ता भारतीय लोकतंत्र के किसी सुनहरे भविष्य की ओर इशारा कर रही है। नक्सलियों ने अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में बकायदा चुनाव बहिष्कार करने का ऐलान कर रखा था, उसके बावजूद मतदान केंद्रों पर मतदाताओं की लंबी कतारें इस बात का बखूबी अहसास करा रही हैं कि जनता बुलेट की जगह बैलेट के रास्त समस्याओं का समाधान खोजना चाहती है।

चुनावों को लोकतंत्र का महाकुंभ कहा जाता है। लिहाजा, जब तक इसमें जनता की रिकॉर्ड भागीदारी न हो तो इसकी सफलता संदिग्ध मानी जाती है। हालांकि किसी भी लोकतांत्रिक देश में जनता जितनी जल्दी अपने मत की ताकत को जान ले उसके लिए उतना ही बेहतर होता है। यह वोट की शक्ति ही जनता को लोकतंत्र का जनार्दन होने का अहसास कराती है। भारत को गणतंत्र बने छह दशक बीत चुके हैं ऐसा लग रहा है कि यहां की जनता भी इस शक्ति को धीरे-धीरे पहचानने लगी है।

अब मतदाता अपनी पुरानी सोच और चुनावों के प्रति उदासीनता, चुनावों के दिन जब अधिकांश अपने-अपने घरों में छुट्टी मनाते थे, से बाहर निकल रहे हैं। आंकड़े इसकी पुष्टि कर रहे हैं। वे इस धारणा में भी विश्वास करने लगे हैंकि राजनीति ही परिवर्तन ला सकती है। जब लोगों को यह लगने लगता है कि वह अपने वोट के सहारे अपनी किस्मत बदल सकते हैं तो इससे उस देश में लोकतंत्र की जड़ें और भी गहरी होती जाती हैं।

इसमें चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे जागरूकता अभियानों की भी अहम भूमिका है। आज जिस तरह से निष्पक्ष तथा शांतिपूर्ण चुनाव हो रहे हैं उससे भी जनता में लोकतंत्र के इस महापर्व में आस्था बढ़ी है। अब निश्चित रूप से राजनीतिक दलों को भी इसके मायने समझने होंगे।

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