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डाॅ. रहीस सिंह का लेख : यरूशलम में शांति अभी कोसों दूर

इजरायली फलस्तीनियों का विद्रोह इसी से प्रेरित दिख रहा है। कारण यह कि कई इस्लामी देश जियोनिज्म अथवा यहूदीवाद को इजरायल की मूल विशेषता मानते हैं। उनका यह भी मानना है कि इजराइली नेतृत्व इसे दैवी हैसियत प्रदान करने के लिए सैन्य शक्ति का प्रयोग करता है। नेतन्याहू स्वयं इसी दिशा में बढ़ रहे हैं। जाहिर सी बात है कि इजरायल के अंदर रह रहे फिलिस्तीनी (अरब) भी इससे अछूते नहीं रहेंगे। संभव है कि उनकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया भी हो। इसका मतलब यह हुआ कि यह लड़ाई उतनी सरल नहीं है। केवल संघर्ष विराम हो जाने से सबकंछ शांत नहीं हो गया है। यह अभी और उलझेगी और अशांत होगी?

डाॅ. रहीस सिंह का लेख : यरूशलम में शांति अभी कोसों दूर
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डाॅ. रहीस सिंह।  

डाॅ. रहीस सिंह

कुछ समय पहले अपरूटेड पैलेसटीनियन डाॅट वर्ल्डप्रेस डाॅट काॅम में रिचर्ड एडमंडसन ने अपने ब्लाॅग में एक बच्चे का उल्लेख किया था जो सीरिया में हमले में घायल हो गया था। इस बच्चे की अंदरूनी रक्तस्राव के कारण मृत्यु हो गई थी। तीन साल के इस बच्चे ने असहनीय दर्द के बाद डाॅक्टरों से कहा था कि,'मैं भगवान से तुम सबकी शिकायत करूंगा। मैं उसे सब बताऊंगा।' इसके कुछ देर बाद ही उसकी धड़कनें थम गई थीं। यह एक बच्चे की नहीं बल्कि मानवीय संवेदना की मौत थी, जिसे मध्य-पूर्व के क्रूर शासक और तानाशाही वाली व्यवस्थाएं शायद कभी नहीं समझ सकतीं। यदि समझी होतीं तो इस समय जो गाजा पट्टी में हुआ है, वह नहीं होता। हमास और इजरायल आमने-सामने रहे और निशाना बने इजरायल और गाजा के कुछ शहर और बहुत से बेकसूर लोग। अब हमास के सहयोगी और समान वैचारिक वाले हमास को बेचारा बताकर इजरायल को क्रूर साबित कर रहे हैं और इजरायल उसे आतंकवादी संगठन मानकर जवाबी कार्रवाई कर रहा है? पर सच क्या है? क्या यह इजराइल का अंधराष्ट्रवाद है या हमास का चरम आतंकवाद? गाजा में जो कुछ भी हुआ है, उसके लिए दोषी कौन है?

'जब तक जरूरी होगा बम बरसाए जाएंगे।' यह वक्तव्य इजरायली प्रधानमंत्री का है। इसका मतलब है कि इजरायल से आप तब तक उम्मीद नहीं कर सकते जब तक हमास अपनी हरकतें बंद नहीं करता। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का कहना कि,'इस टकराव के लिए दोषी हम नहीं हम पर हमला करने वाली पार्टी है। इस ऑपरेशन में हमने केवल अपना बचाव किया है। अभी यह खत्म नहीं हुआ है। यह आॅपरेशन तब तक जारी रहेगा जब तक आवश्यक होगा।' क्या यह इजरायल का अभिव्यक्त पक्ष है या फिर हमास को कठोर दंड देने की प्रक्रिया? एक बात और, अरब देश अभी भी अरब राष्ट्रवाद के बेहद कमजोर तंतुओं को पकड़कर झूठी एकता और फिलिस्तीन के प्रति चिंता का नाटक कर रहे हैं। ऐसा क्यों? इसलिए कि ईरान और अरब या शिया एवं सुन्नी दुनिया के बीच खिंची रेखाओं को ढका और इजरायल के खिलाफ प्रोपगेंडा किया सके। यदि ऐसा नहीं है तो फिर ओआईसी के राग में ठीक-ठाक सुर लगते क्यों नहीं दिखे? हमास ने पिछले सोमवार को इजरायल पर 300 राकेट दाग दिए जिससे कुछ इजरायली नागरिकों की मौत हुई। प्रतिक्रिया में इजरायल ने गाजा के शहरों को तबाह करना शुरू कर दिया। उसने फिलिस्तीन में हमास के 150 से अधिक ठिकानों को टारगेट किया। जैसे ही यह कार्रवाई हुई अरब दुनिया में हलचल शुरू हो गई और 57 देशों वाले ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (ओआईसी) ने जेद्दा (सऊदी अरब) में आपात बैठक बुला ली।

बैठक में ओआईसी ने अल-अक्सा मस्जिद को रेडलाइन के रूप में पेश किया और इसके उल्लंघन पर इजरायल को खतरनाक परिणामों की चेतावनी दी लेकिन इजरायल पर कोई असर नहीं हुआ। होना भी नहीं था क्योंकि उसे अरब दुनिया और ओआईसी की हैसियत पता है। इसी वजह से फिलिस्तीनियों को भ्रुगतना पड़ा है। हमास आज भी अमेरिका और कई यूरोपीय देशों की नजर में एक आतंकवादी संगठन है। इजराइल तो इसे शुरू से ही आतंकवादी गुट मानता है। ऐसे में अरब देशों द्वारा हमास का खुला समर्थन किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। स्वाभाविक है कि इसका विरोध करने वाले बहुत से देश इजरायल के साथ खड़े होंगे और इजरायल के आत्मरक्षा के अधिकार की वकालत करेंगे। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने जब अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से बात की तो उन्होंने भी हमास के रॉकेट हमले के जवाब में इजरायल के आत्मरक्षा के अधिकार का समर्थन किया। फ्रांस और जर्मनी के तरफ से भी इजरायल के कदम का समर्थन किया गया। यही राजनय है, लेकिन इस राजनय ने कुछ बड़े संकेत दिए हैं। सबसे बड़ा संकेत तो यह है कि इसमें कोई बड़ा डिप्लोमैटिक गेम प्लेयर अथवा शक्ति केन्द्र नहीं दिखा। जो बाइडेन का दबा हुआ स्वर बताता है कि वे इस विषय पर सहज नहीं हैं। संभावना थी कि वे ओबामा रिजीम की ओर लौटेंगे लेकिन अभी वे इसके लिए तैयार नहीं दिख रहे। इसलिए मध्य-पूर्व में प्रभावी हस्तक्षेप की संभावनाएं बेहद कम हैं।

क्या जो बाइडेन पिछले वर्ष सितम्बर में हुए अब्राहम एकॉर्ड्स को ठीक से लागू करा पाएंगे? ध्यान रहे कि संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) बहरीन, मोरक्को और सूडान ने इजरायल के साथ समझौतों पर हस्ताक्षर किए थे। अब इनके अस्तित्व पर सवालिया निशान लग रहा। हालांकि सऊदी अरब इसमें शामिल नहीं हुआ था। इसलिए वह वह इजरायल की खुलकर आलोचना कर सकता है, लेकिन सवाल यह है कि आखिर वह अब्राहम एकाॅर्ड्स का हिस्सा क्यों नहीं बना था? इसके दो कारण हो सकते हैं। पहला यह कि सऊदी अरब को यह पता था कि फिलिस्तीन मसला सुलझने वाला नहीं है, इसलिए मध्य-पूर्व में इजरायल विरोध की स्थितियां बनी रहेंगी। दूसरा-उसे लग रहा होगा कि यदि वह भी अब्राहम एकाॅर्ड्स का हिस्सा बन जाएगा तो इजरायल विरोध की कमान पूरी तरह से ईरान के हाथ में पहुंच जाएगी जिसके कारण इस्लामी दुनिया में उसका ट्रस्ट डेफिसिट बढ़ सकता है। यह स्थिति रियाद के मुकाबले तेहरान को मजबूत करती और यह रियाद को स्वीकार्य नहीं होता।

एक बात और, क्या हमास के प्रति सहानुभूति और इजरायल का विरोध एक सुलझा हुआ राजनीतिक समाजशास्त्र अथवा सामाजिक-अर्थशास्त्र है? यहां पर दो तथ्यों पर विचार करने की जरूरत है। प्रथम-हमास को बिना किसी सवालिया निशान के सर्वस्वीकार्य राजनीतिक सत्ताधारी मान लेना और उसका तरफदारी करना क्या उचित है? द्वितीय-यदि हमास इजराइल से अधिक ताकतवर होता या इजराइल हमास जैसी स्थिति में और हमास इजराइल की हैसियत में होता तो वह इजरायल के साथ कैसा व्यवहार करता?

बहरहाल अभी तक यह लड़ाई फिलिस्तीन बनाम हमास दिख रही थी, लेकिन अब इसमें इस्लाम बनाम जियोनिज्म की एक निर्णायक फैक्टर बनता दिखा। इजरायली व फलस्तीनियों का विद्रोह इसी से प्रेरित दिख रहा है। कई इस्लामी देश जियोनिज्म अथवा यहूदीवाद को इजरायल की मूल विशेषता मानते हैं। उनका यह भी मानना है कि इजराइली नेतृत्व इसे दैवी हैसियत प्रदान करने के लिए सैन्य शक्ति का प्रयोग करता है। नेतन्याहू स्वयं इसी दिशा में बढ़ रहे हैं। जाहिर सी बात है कि इजरायल के अंदर रह रहे फिलिस्तीनी (अरब) भी इससे अछूते नहीं रहेंगे। संभव है कि उनकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया भी हो। इसका मतलब यह हुआ कि यह लड़ाई उतनी सरल व एकल रेखीय नहीं है जितना कि कभी-कभी मान लिया जाता है। बेशक अभी इजराइल व हमास के बीच संघर्ष विराम हो गया हो, लेकिन यरुशलम की धरती पर स्थाई शांति अभी कोसों दूर है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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