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डाॅ. गौरीशंकर राजहंस का लेख : शांति भारत-चीन के हक में

अब चीन ने यह समझ लिया कि वह अब बहुत देर तक इस सत्य को नहीं छिपा सकता है। चीन के सरकारी प्रवक्ता ने यह वक्तव्य दिया है कि चीन के केवल चार सैनिक इन झड़पों में मारे गए हैं, परन्तु इन झड़पों के बाद भी कठोर ठंड में भारतीय सैनिक जिस तरह वहां डटे रहे उससे चीन को यह समझ में आ गया कि भारत की फौज का वह बहुत अधिक नुकसान नहीं कर पाएगा। अन्त में लाचार होकर और संभवतः अपने देश के सलाहकारों की सलाह पर चीन ने इस मुद्दे पर भारत से समझौता कर लेना ही उचित समझा।

डाॅ. गौरीशंकर राजहंस का लेख : शांति भारत-चीन के हक में
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डाॅ. गौरीशंकर राजहंस

पूर्वी लद्दाख में पैंगोग झील क्षेत्र से चीन और भारत के सैनिकों के पीछे हटने का काम पूरा हो गया है। भारत और चीन दोनों देशों के सैनिक एक समझौते के तहत अपने-अपने क्षेत्रों में लौट गए हैं। आठ महीने पहले भारत और चीन के सैनिकों के बीच जो हिंसक झड़पें हुई थी जिनमें भारत के शीर्ष अधिकारी कर्नल बाबू भी शहीद हो गए थे। उसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव बहुत बढ़ गया था। भारत ने तो यह कबूल किया था उसके प्रायः 20 सैनिक शहीद हो गए हैं, परन्तु चीन ने सारी दुनिया से यह आंकड़ा छिपाकर रखा कि उसका इन झड़पों में चीन का कोई सैनिक नहीं मारा गया। अब आकर चीन ने अाधिकारिक रूप से इन झड़पों में चीन के चार सैनिकों के मारे जाने की सूचना दी है। पहले तो वह एक भी सैनिक के मारे जाने की बात नहीं मान रहा था और अब भी वह केवल 4 सैनिकों के मारे जाने की पुष्टि कर रहा है, जबकि उसके 50 के लगभग सैनिक मारे गए थे। इस सिलसिले में यह याद रखना आवश्यक है कि आकाश में जो सैटेलाइट घूमते रहते हैं वे वास्तविकता की तस्वीर भेजते रहते हैं। रूसी न्यूज एजेंसी ने कहा था कि इन झड़पों में चीन के 45 सैनिक मारे गए थे जबकि ब्रिटिश जासूसों ने यह पता लगाया था कि 40 के करीब चीनी सैनिक हताहत हुए थे।

अब चीन ने यह समझ लिया कि वह अब बहुत देर तक इस सत्य को नहीं छिपा सकता है। चीन के सरकारी प्रवक्ता ने यह वक्तव्य दिया है कि चीन के केवल चार सैनिक इन झड़पों में मारे गए हैं, परन्तु इन झड़पों के बाद भी कठोर ठंड में भारतीय सैनिक जिस तरह वहां डटे रहे उससे चीन को यह समझ में आ गया कि भारत की फौज का वह बहुत अधिक नुकसान नहीं कर पाएगा। अन्त में लाचार होकर और संभवतः अपने देश के सलाहकारों की सलाह पर चीन ने इस मुद्दे पर भारत से समझौता कर लेना ही उचित समझा। यह राहत की बात है कि भारत के रक्षा मंत्री ने सार्वजनिक रूप से यह बयान दिया है कि चीनी सैनिक जिन्होंने सीमा पर अपने टेंट लगाकर गोला बारूद और सैनिक साजो सामान इकट्ठा कर रखा था वे पीछे हट गए हैं और उनकी देखा-देखी भारतीय फौज भी पीछे हट गई। दोनों पक्षों में यह समझौता हुआ कि बाकी द्विपक्षीय मुद्दों पर दोनों देशों के सैनिक कमांडर वार्ता करेंगे। चीन एक परमधूर्त देश है। सैकड़ों वर्षों से उसकी विस्तारवादी नीति रही है। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने चीन के इतिहास को सही संदर्भ में नहीं पढ़ा था। उनका मानना था कि जिस तरह भारत अंग्रेजों के द्वारा गुलाम बनाया गया उसी तरह चीन भी पश्चिमी देशों का सताया हुआ देश है और जब कभी भविष्य में दोनों देश आजाद होंगे वे एक दूसरे के परम मित्र बन जाएंगे, परन्तु धूर्त चीन कभी भारत की मित्रता का पक्षधर नहीं रहा। उसने हमेशा कोशिश की कि भारत के निकटवर्ती क्षेत्र को चीन में मिलाकर हड़प ले।

पंडित नेहरू से सबसे बड़ी गलती तो तब हो गई जब 1949 में चीन ने अपने देश में साम्यवादी शासन स्थापित कर लिया, माओ-त्से-तुंग चीन के राष्ट्पति बन गए, चाउ-एन-लाई चीन के प्रधानंत्री बन गए और पंडित नेहरू से दोस्ती का स्वांग रचने लगे तथा नेहरू उनकी बातों में आ गए। अचानक ही चीनी आकाओं ने तिब्बत पर कब्जा करना शुरू कर दिया। उस समय तक तिब्बत एक तरह से भारत का उपनिवेश समझा जाता था। वहां पर भारतीय मुद्रा का चलन था, भारतीय डाकघर थे और भारतीय पुलिस भी वहां रहती थी। हर तरह से यह समझा जाता था कि तिब्बत भारत का ही अंग है, परन्तु रातों रात साम्यवादी चीन ने तिब्बत को हड़प लिया। जब पंडित नेहरू ने इसका घोर विरोध किया तब चाउ-एन-लाई ने पंडित नेहरू को समझाया कि तिब्बत की स्वतंत्रता अक्षुण रहेगी और चीन किसी भी हालत में तिब्बत के आन्तरिक मामलों मे हस्तक्षेप नहीं करेगा, परन्तु चीनी नेता धूर्त थे और वे शीघ्र ही अपने वादों से मुकर गए और धड़ाघड़ तिब्बत में स्थापित बौद्व मठों को ध्वस्त करना शुरू कर दिया और बात यहां तक आई कि वे दलाई लामा को ल्हासा से गिरफ्तार कर चीन ले जाना चाहते थे। जब दलाई लामा के गुप्तचरों ने दलाई को इसकी सूचना दी तब दलाई लामा रातों रात ल्हासा से प्रायः 100 खच्चरों पर अपने अनुयायियों के साथ सवार होकर भारतीय सीमा में प्रवेश कर गए। जब वे सुरक्षित रूप में भारत में प्रवेश कर गए तब पंडित नेहरू ने उन्हें राजनीतिक शरण दे दी और इसकी घोषणा भारत की संसद में भी कर दी। चीनी नेता पंडित नेहरू के इस बर्ताव से बहुत नाराज हुए और उन्होंने पंडित नेहरू से कहा कि वे दलाई लामा को चीन के हवाले कर दें।

पंडित नेहरू इस बात के लिए तैयार नहीं हुए और तभी से दोनों देशों के बीच संबंधों में खटास आती गई। चाउ-एन-लाई फिर भी धूर्तता दिखाते रहे और पंडित नेहरू से मित्रता का स्वांग रचत रहे और अन्त में 1962 में जब वे अपने देश लौट गए और पंडित नेहरू को यह पता चला कि चीनी सैनिक बड़ी तेजी से तिब्बत और भारतीय क्षेत्र को हड़प रहे हैं तो नेहरू ने भारतीय सैनिकों को आदेश दे दिया कि चीनी सैनिकों का मुकाबला कर उन्हें भगा दें, परन्तु चीनी सैनिक तो पहले ही युद्ध के लिए तैयार थे, भारतीय सैनिक अन्धविश्वास का चोला पहनकर यह सोच रहे थे कि चीन उन पर कभी आक्रमण नहीं करेगा। अन्त में चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया और 1962 में भारत की बहुत ही शर्मनाक हार हो गई। तब से आज तक भारत और चीन के संबंध कभी सामान्य नहीं रहे, परन्तु नरेन्द्र मोदी के पहले देश का कोई ऐसा प्रधानमंत्री नहीं था जो चीन को आंखें दिखा सकता। नरेन्द्र मोदी ने चीन को दो टूक कह दिया कि भारत उसकी विस्तारवादी नीतियों का समर्थन नहीं करता है और भारत का जो भूभाग चीन ने हड़प रखा है उस भूभाग को चीन को भारत को वापस करना ही होगा। हाल में गलवान घाटी में जो झड़पें हुई थी उनमें चीन को यह एहसास हो गया कि भारत की सेना बहुत ही बहादुर है और चीन के लिए भारतीय सेना को हराना संभव नहीं होगा। गलवान घाटी में चीनी और भारतीय सैनिकों को बीच जो झड़प हुई उनसे चीन यह समझ गया कि इन वर्षों में भारत अत्यन्त मजबूत राष्ट्र बन कर उभरा है। इसी कारण लद्दाख में दोनों देशों की सेना पीछे लौट गई और दोनों के बीच समझौता हुआ कि दोनों पक्षों केे वरिष्ठ सैनिक अधिकारी वार्ता करेंगे व एक सर्वमान्य समझौता करेंगे।

कुल मिलाकर स्थिति यह बनी है कि भारत एक मजबूत देश के रूप में उभरा है। चीन को समझ में आ गया है कि भारत से पंगा लेना अब उसके बस की बात नहीं रही। भारत की छवि एक अत्यन्त ही सबल राष्ट्र के रूप में विश्व पटल पर बनी है और इसमें कोई संदेह नहीं कि संसार के अधिकतर देश भारत के पराक्रम का लोहा मानने लगे हैं। अब यह बात तो सबों के समझ में आ गई कि भारत को बिना वजह नीचा दिखाना आसान नहीं है। हाल में कोरोना महामारी के दौरान भी नरेन्द्र मोदी ने अनेक देशों को वैक्सीन पहुंचाकर मानवीय संवदेना का संदेश दिया है, जिससे इन सभी देशों की जनता भारत के पक्ष में हो गई है। इसमें कोई संदेह नहीं कि आने वाले समय में भारत और मजबूत बनकर उभरेगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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