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संपादकीय लेख : अफगानिस्तान में शांति विश्व-एशिया के हित में

दक्षिण एशिया में शांति बरकरार रखने के लिए जरूरी है कि अफगानिस्तान में लोकतांत्रिक माहौल बना रहे। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक में अफगानिस्तान के भविष्य को लेकर चिंता जताकर चीन, पाकिस्तान समेत एससीओ के सभी सदस्य देशों का ध्यान आकृष्ट किया है। जयशंकर ने कहा कि अफगानिस्तान का भविष्य उसका अतीत नहीं हो सकता और दुनिया हिंसा और बल द्वारा सत्ता हथियाने के खिलाफ है। अफगानिस्तान ने लंबे समय तक कट्टरपंथी हिंसा का सामना किया है, तालिबान के हिंसक दौर को झेला है।

संपादकीय लेख : अफगानिस्तान में शांति विश्व-एशिया के हित में
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संपादकीय लेख

Haribhoomi Editorial : दक्षिण एशिया में शांति बरकरार रखने के लिए जरूरी है कि अफगानिस्तान में लोकतांत्रिक माहौल बना रहे। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक में अफगानिस्तान के भविष्य को लेकर चिंता जताकर चीन, पाकिस्तान समेत एससीओ के सभी सदस्य देशों का ध्यान आकृष्ट किया है। जयशंकर ने कहा कि अफगानिस्तान का भविष्य उसका अतीत नहीं हो सकता और दुनिया हिंसा और बल द्वारा सत्ता हथियाने के खिलाफ है। अफगानिस्तान ने लंबे समय तक कट्टरपंथी हिंसा का सामना किया है, तालिबान के हिंसक दौर को झेला है। खनिज संपदा से भरपूर यह देश पहले दोनों महाशक्तियों अमेरिका व रूस की महत्वाकांक्षा का केंद्र बना, रूस के हटने के बाद वह अमेरिकी रणनीति का हिस्सा बना। जिन ताकतों ने तालिबान के उदय में साथ दिया, अब उन्हीं ताकतों के लिए तालिबान नासूर बन चुका है। अफगानिस्तान को तालिबान के प्रभाव से बाहर निकाल कर लोकतंत्र की राह पर लाने में अहम भूमिका निभाने वाले अमेरिका की फौज 20 साल बाद अब 31 अगस्त तक वहां से लौट रही है।

अमेरिकी फौज की मौजूदगी से अफगानिस्तान लोकतंत्र की राह पर आगे बढ़ रहा था। भारत ने अफगानिस्तान के नव निर्माण अहम भूमिका निभाई है। भारत 20,000 अफगान छात्रों को सुविधा, नई अफगान संसद के निर्माण समेत अन्य बुनियादी परियोजनाओं में सहयोग कर रहा है। वहां लोकतंत्र को मजबूत करने और शांति बनाए रखने में अमेरिका और भारत सक्रिय रूप से मौजूद हैं। अमेरिकी फौज के जाने के निर्णय के बाद से तालिबान तेजी से सक्रिय है। अमेरिका व तालिबान की समझौता वार्ता सिरे नहीं चढ़ी, दूसरी तरफ अमेरिका के जाने के बाद जहां भारत के लिए राह कठिन होने वाली है, वहीं इसका फायदा उठाने के लिए चीन व पाकिस्तान ताक में हैं। चीन व पाक को तालिबान को समर्थन देने से भी गुरेज नहीं होगा। भारत की चिंता यही है कि कहीं फिर से अफगानिस्तान में हिंसा के दौर की वापसी न हो जाए। इसलिए विदेश मंत्री जयशंकर ने एससीओ की बैठक में इस मुद्दे को उठाया है व शांति वार्ता की पैरवी की है। एक स्वीकार्य समझौता जो दोहा प्रक्रिया, मास्को प्रारूप और इस्तांबुल प्रक्रिया को दर्शाता है, वह आवश्यक है। एससीओ में भारत, चीन, रूस, पाक, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, तजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान हैं। एशिया, विश्व समेत इन सभी देशों के लिए अफगानिस्तान में शांति फायदेमंद है।

आगे अफगानिस्तान को आतंकवाद, अलगाववाद और चरमपंथ से भारी खतरा है। भारत में अफगानी राजदूत फरीद मामुंडजे के मुताबिक अफगानिस्तान में सेना के जवान 376 जिलों में से 150 में तालिबान से लड़ रहे हैं। अप्रैल से दो लाख से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं व करीब 4,000 लोग मारे गए हैं। तालिबान ने 9 जुलाई को मॉस्को में दावा किया था कि अफगानिस्तान के 85 फीसदी से अधिक क्षेत्र पर उसका नियंत्रण हो चुका है। एक तालिबानी जज ने कहा है कि पूरा नियंत्रण होने के बाद शरिया कानून लागू करेंगे, चोरों के हाथ-पैर काट देंगे, समलैंगिकों को पत्थर मारकर या 8 से 10 फीट की ऊंचाई से फेंककर उसकी जान लेंगे। तालिबान की वापसी से अफगानिस्तान में इस्लामिक कट्टरपंथी शासन का बोलबाला हो जागा। तालिबान से वार्ता विफल होने पर अफगानिस्तान भारत से सैन्य मदद लेने की तैयारी कर रहा है। माना जा रहा है कि दोहा में हो रही शांति वार्ता काफी हद तक विफल हो गई है और तालिबान अब पूरी तरह से बंदूक की नोक पर अफगानिस्तान पर अपना शासन थोपने को तैयार है। ऐसे में भारत को फूंक-फूंक कर कूटनीतिक कदम उठाना होगा और हाथ नहीं जलाने के जोखिम से बचना होगा।

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