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चिंतन: संसद चर्चा का मंच है हंगामा करने का नहीं

यह पहली बार नहीं है कि संसद को बाधित करने की संभावना बन रही है।

चिंतन: संसद चर्चा का मंच है हंगामा करने का नहीं
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मंगलवार से संसद का मानसून सत्र आरंभ हो रहा है। देश में जिस तरह के राजनीतिक हालात बने हैं, उसे देखते हुए संसद के हंगामेदार रहने के कयास लगाए जा रहे हैं। विपक्षी दलों खासकर कांग्रेस के रुख को देखते हुए कहा जा रहा है कि राजग सरकार के लिए इस सत्र को सही तरह से चलना आसान नहीं होगा।
कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद ने कहा है कि जब तक विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाती, तब तक पार्टी संसद नहीं चलने देगी। वहीं सत्तापक्ष ने संसद को शोरगुल से बचाने और देशहित में सार्थक कामकाज हो सके इसके लिए सभी दलों से सहयोग मांगा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि उनकी सरकार सभी मुद्दों पर बहस के लिए तैयार है। लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने भी सर्वदलीय बैठक बुलाकर आम सहमति बनाने की कोशिश की हैं।
हालांकि यह पहली बार नहीं है कि संसद को बाधित करने की संभावना बन रही है। 15वीं लोकसभा का उदाहरण हमारे सामने है, लेकिन इसे नजीर नहीं बनाया जाना चाहिए। संसद का कामकाज रोक देना अच्छा संसदीय व्यवहार नहीं है। संसद लोगों से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा का सर्वोच्च मंच है। इसकी अपनी एक गरिमा है, जहां जनता से जुड़े कई अहम निर्णय लिए जाते हैं। यदि संसद के इस उद्देश्य की अनदेखी की जाएगी तो इससे उसकी गरिमा और र्मयादा प्रभावित होने के साथ ही देश को निराशा भी हाथ लगेगी। हाल के सभी विवादित मुद्दों पर सदन में विचार-विर्मश किया जाना चाहिए। विपक्षी दलों को चाहिए कि वे इन मुद्दों पर संसद में चर्चा करें और सरकार से जवाब मांगें।
देश जानता है कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) और भूमि अधिग्रहण सहित कई महत्वपूर्ण विधेयक लंबित हैं, जिन्हें मानसून सत्र में पारित होना जरूरी है। यदि भूमि अधिग्रहण और जीएसटी विधेयक इस सत्र में पारित हो जाते हैं तो निश्चित रूप से देश में विकास की रफ्तर तेज होगी। भूमि अधिग्रहण बिल पर कांग्रेस का रुख सराहनीय नहीं है कि वह किसी भी कीमत पर इसे पारित नहीं होने देगी। देश का हित इस बिल को लंबित रखने में नहीं, बल्कि किसी समाधान पर पहुंचने में है। बेहतर यह होगा कि वह इस पर चर्चा करे।
प्रधानमंत्री ने भी कहा है कि वे अच्छे सुझावों को बिल में शामिल करेंगे। भाजपा भी साफ कर चुकी है कि वह संसद को सार्थक बहस का मंच बनाना चाहती है। ऐसे में संसद को पंगु करने की मंशा विपक्ष को विकास विरोधी ही ज्यादा साबित करेगी। उन्हें अपनी मंशा पर पुन: विचार करना चाहिए। मोदी सरकार का विरोध करने के क्रम में कहीं ऐसा न हो कि देश की आम जनता के हित प्रभावित हो जाएं! लिहाजा विपक्षी दल भी शोरगुल करने की बजाय बहस को प्राथमिकता दें तो बेहतर होगा।
संसद सुचारू रूप से चले, यह सुनिश्चित करना और जरूरी विधेयकों को पास कराना बेशक सरकार का दायित्व होता है, लेकिन विपक्ष की भूमिका भी जन हित के कायरें में बाधा पैदा करने की नहीं होनी चाहिए। संसद को शांतिपूर्ण चलाने में सत्तापक्ष के साथ-साथ विपक्ष की भी उतनी ही जिम्मेदारी बनती है।
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