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पंचायत चुनाव: पंचायती राज लोकतंत्र का आधार, जानिए क्या है छत्तीसगढ़ लोक सेवा गारंटी अधिनियम

प्राचीनकाल में प्रत्येक गांव की एक सभा थी, जिसके सदस्य ग्राम के बड़े एवं बुजूर्ग होते थे। प्रत्येक सभा में पांच सदस्यों की कार्यकारिणी वाला एक समूह था, जिसे पंचायत के रूप में मान्यता दी गई। यह पंचायत सामूहिक रूप से गांवों की लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए जिम्मेदार थी, गांव में ऐसा कोई भी मुद्दा नहीं होता था जो उनके नियंत्रण से परे हो।

पंचायत चुनाव: पंचायती राज लोकतंत्र का आधार, जानिए क्या है छत्तीसगढ़ लोक सेवा गारंटी अधिनियम
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प्राचीनकाल में प्रत्येक गांव की एक सभा थी, जिसके सदस्य ग्राम के बड़े एवं बुजूर्ग होते थे। प्रत्येक सभा में पांच सदस्यों की कार्यकारिणी वाला एक समूह था, जिसे पंचायत के रूप में मान्यता दी गई। यह पंचायत सामूहिक रूप से गांवों की लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए जिम्मेदार थी, गांव में ऐसा कोई भी मुद्दा नहीं होता था जो उनके नियंत्रण से परे हो।

स्वतंत्र भारत में पंचायत राज व्यवस्था को सुदृढ़ एवं सशक्त करने की जिम्मेदारी तत्कालीन सरकार आ पड़ी थी । यह स्पष्ट था कि भारत को गांवों के देश के रूप में ग्राम पंचायतों को मजबूत *करना था। महात्मा गांधी ने ग्राम स्वराज के स्वप्न को यथार्थ में बदलने के लिये जनता को सत्ता के हस्तांतरण की परिकल्पना की। उनके अनुसार गांवों को निर्वाचित पंचायतों के माध्यम से स्वयं को आत्मनिर्भर बनने के लिये स्व-शासी होना आवश्यक है।

भारत में स्थानीय स्व-शासन की संकल्पना प्राचीन युग से चली आ रही हैैै। प्राचीनकाल से अंग्रेजों के शासन काल तक ग्रामीण समुदायों ने इस व्यवस्था को जीवंत बनाये रखा था। हमारे ग्रामों में विभिन्न समुदाय, एक दूसरे के सहायक और परस्पर निर्भर भी थे। प्राचीन रीति-रिवाजों एवं परम्पराओं ने सामुदायिक भावनों को बनाये रखने में सहायता की।

कई साम्राज्य बने और ध्वस्त हुए, लेकिन इन ग्रामीण समुदायों ने अपने अस्तित्व एवं भावना को सदैव बनाये रखा। यही हमारे लोकतांत्रिक मूल्यों का आधार रहा है। प्राचीनकाल में प्रत्येक गांव की एक सभा थी, जिसके सदस्य ग्राम के बड़े एवं बुजुर्ग होते थे। प्रत्येक सभा में पांच सदस्यों की कार्यकारिणी वाला एक समूह था, जिसे पंचायत के रूप में मान्यता दी गई।

यह पंचायत सामूहिक रूप से गांवों की लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए जिम्मेदार थी, गांव में ऐसा कोई भी मुद्दा नहीं होता था जो उनके नियंत्रण से परे हो। स्वतंत्र भारत में पंचायत राज व्यवस्था को सुदृढ़ एवं सशक्त करने की जिम्मेदारी तत्कालीन सरकार आ पड़ी थी। यह स्पष्ट था कि भारत को गांवों के देश के रूप में ग्राम पंचायतों को मजबूत करना था।

महात्मा गांधी ने ग्राम स्वराज के स्वप्न को यथार्थ में बदलने के लिये जनता को सत्ता के हस्तांतरण की परिकल्पना की। उनके अनुसार गांवों को निर्वाचित पंचायतों के माध्यम से स्वयं को आत्मनिर्भर बनने के लिये स्व-शासी होना आवश्यक है। महात्मा गांधी ने 06 मई 1939 को वृंदावन में ग्राम सेवकों की सभा को संबोधित करते हुए ग्राम स्वराज के प्रति अपनी भावना को अभिव्यक्त किया कि, यह देख कर बहुत दुःख होता है कि आप लोगों में अधिकांश लोग या तो शहर से आये हैं या शहरी जीवन से अभ्यस्त है।

जब तक आप अपना मन शहर से हटाकर गांवों में नहीं लगाएगें तब तक गांवों की सेवा आप नहीं कर सकते। अर्थात्ा गांवों के विकास के लिये हमारी भावनाओं में गांवों के प्रति पूर्ण समर्पण होना चाहिए। दुर्भाग्यवश, 1948 में तैयार संविधान मसौदे में पंचायत राज संस्थाओं का कोई उल्लेख ही नहीं था। महात्मा गांधी जी ने गंभीर आलोचना की और तत्काल इस पर संविधान निर्माताओं का ध्यानाकर्षण किया।

इसके फलस्वरूप उनके आग्रह पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 40 में पंचायत को राज्य के नीति निर्देशक सिद्धान्तों में ग्राम पंचायतों के संगठन के रूप में स्थान दिया गया। राज्यों के नीति निर्देश तत्वों के अनुच्छेद 40 में ग्राम पंचायतों का संगठन कर उन्हें स्वायत्त शासन प्रदान कर एक इकाई के रूप में कार्य कर सकने योग्य बनाने के लिए आवश्यक शक्ति और प्राधिकार प्रदान करने का प्रावधान किया गया

जिसके तहत पंचायतों को संगठित कर उन्हें स्व-शासन की इकाई के रूप में कार्य करने योग्य बनाने के लिए आवश्यक शक्ति और प्राधिकार प्रदान किये गये। परन्तु अलग-अलग राज्यों में इसका स्वरूप भिन्न-भिन्न था एवं इसमें कोई गंभीरता नहीं थी। डॉ. रमन सिंह के सत्ता में आते ही सामाजिक न्याय की स्थापना एवं आर्थिक विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम, 1993 में विभिन्न वर्षों में महत्वपूर्ण संशोधन किए गए।

2004 में किए गए संशोधन में वार्षिक कार्ययोजना, हितग्राहियों का चयन, वार्षिक बजट, लेखा समपरीक्षा प्रतिवेदन एवं वार्षिक लेखा का अनुमोदन ग्राम सभा में गणपूर्ति होने पर पारित किया जायेगा। ग्राम सभा की लगातार तीन बैठकों में गणपूर्ति नहीं होने पर संबधित पंच / सरपंच को नोटिस दिया जायेगा । आगे की दो ग्राम सभा में गणपूर्ति करने का अवसर दिया जायेगा।

फिर भी गणपूर्ति ना होने की स्थिति में संबंधित पंच/सरपंच को पद से हटाने की कार्यवाही की जा सकेगी । पंचायत के किसी भी प्रकार की देनदारी (बकाया) हो, उससे 30 दिन पूर्व मांग किये जाने के बाद जमा नहीं करने पर वह अपात्र हो जायेंगे। जिसने किसी पंचायत के अथवा शासकीय भूमि या भवन पर अतिक्रमण किया हो, निर्वाचन के लिए अपात्र माना जायेगा ।

2015 में किये गये संशोधन में ग्राम पंचायत स्तर पर पांच स्थायी समिति के गठन का प्रावधान किया गया जिसमें सामान्य प्रशासन समिति, शिक्षा स्वास्थ्य समाजकल्याण एवं स्वच्छता समिति का पदेन सभापति सरपंच तथा शेष अन्य तीन स्थायी समिति के सभापति पंच अपने में से बहुमत के आधार पर निर्वाचन कर करेंगे।

छत्तीसगढ़ लोक सेवा गारंटी अधिनियम के तहत पंचायतों द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली सेवा प्रदान करने के लिए निश्चित की गई समय सीमा सेवा प्रदान करने वाले अधिकारी एवं अपीलीय अधिकारी नियुक्ति की गई है। 2016 में किये गये संशोधन में पंचायत के तीनों स्तरों पर सदस्यों के लिए निरर्हिताएं निर्धारण किया गया है, जिनमें प्रमुख है ग्राम पंचायत के वार्ड पंच के लिये 5वीं पास अनिवार्य है तथा सरपंच से ऊपर पद के लिए 8वीं पास होना अनिवार्य है।

जिनके निवास परिसर में जलवाहित शौचालय नहीं है, वे पंचायत के तीनों स्तरों पर निर्वाचन हेतु अपात्र होंगे। 2017 में किये गये संशोधन में छत्तीसगढ़ ग्राम पंचायत (कालोनाईजर का रजिस्ट्रीकरण, निर्बन्धन तथा शर्तें) नियम, 1999 में संशोधन किया जाकर संशोधन नियम, 2015 बनाया गया। 2018 में किये गये संशोधन में छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम के अंतर्गत धारा 77 अन्य कर की अनुसूची 4 के अंतर्गत बाजार में विक्रय के लिए गये माल के लिये टोकरी या सिर भार (जो थैला में ना हो) को कर से मुक्त रखा गया।

छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम, 1993 में वर्ष 2003 से 2018 तक किये गये इन संशोधनों का प्र्रभाव यह रहा कि पंचायत राज संस्थाओं में आरक्षण के प्रावधानों के फलस्वरूप 50 प्रतिशत की जगह वर्तमान में महिलाओं की भागीदारी 56.65 प्रतिशत तक बढ़ी है । हमारे देश के संविधान में सभी को एक स्थान से दूसरे स्थान जाने की पूरी स्वतंत्रता है।

शासन की महती योजनाओं के क्रियान्वयन के दृष्टिकोण से संविधान में यह बात कही गई हैं कि मूलभूत सुविधाएं प्रत्येक नागरिक का अधिकार है । इस दृष्टि से सरकार द्वारा लोगों तक नागरिक सुविधाएं पहुॅचाने में और विश्वास से विकास गढ़ने में आपकी भागीदारी हो। छत्तीसगढ़ में शासन के माध्यम से सभी आदिवासी समुदायों के साथ काम किया जाना है।

इसलिये यह समझना आवश्यक है कि हमारी संस्कृति तथा संविधान में किसी के मौलिक अधिकारों के हनन की परम्परा नहीं रही है । भारतीय संविधान के अनुच्छेद 244 कहीं नहीं कहता है कि केन्द्र या राज्य सरकार का क्षेत्राधिकार बाधित है। पत्थलगड़ी के सच और सोच को जानें एवं पत्थलगड़ी की आड़ में असंवैधानिक तथा भारत की एकता एवं अखंडता को खंडित करने वाले राष्ट्रविरोधी तत्वों द्वारा फैलाए जा रहे जहरीले भ्रम का विरोध करें।

पत्थलगड़ी हमारे आदिवासी समुदाय की प्राचीन परम्परा एवं रुिढ़यों का अभिन्न अंग है जिसे हमें संजोकर रखना है एवं उन्हें यथोचित सम्मान देना है। छत्तीसगढ़ में पंचायतराज संस्थाएं तथा ग्राम सभा लोकतंत्र का आधार स्तंभ एवं मेरूदंड हैं तथा हमारी संस्कृति और स्वतंत्रता की संरक्षक भी हैं, इनकी संवैधानिक प्रभुत्व एवं भूमिका को बनाए रखने के लिये हमारी सरकार कटिबद्ध है।

अंत में, यह कहना चाहूंगा कि हम सदियों पुराने विश्वास के सम्मानित शिलालेखों के आधार पर सकारात्मक सोच एवं नये विश्वास के साथ छत्तीसगढ़ के सामान्य एवं अनुसूचित क्षेत्रों में नया विकास गढ़ें। स्वच्छता के लिये किये गये प्रावधान के अनुसार पंचायत प्रतिनिधियों के आवासों में जलवाहित शौचालय होने की अनिवार्यता से आम जनता भी प्रेरित हो रही है जिसके परिणामस्वरूप आज प्रदेश खुले में शौचमुक्त हो रहा है।

शिक्षा की अनिवार्यता के फलस्वरूप आज पंचायती राज संस्थाओं में उच्च शिक्षा प्राप्त पदाधिकारियों की सहभागिता बढ़ रही है । छः ग्राम सभाओं की अनिवार्यता ने विकास के मुद्दों पर स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करने के अवसर निर्मित किये हैं । स्थायी समिति में सचिवीय व्यवस्था के प्रावधान ने ग्राम पंचायत विकास योजना निर्माण को गति प्रदान की है एवं पंचायतें सतत् विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने की ओर अग्रसर हैं।

देश के किसी भी राज्य में खाद्यान्न एवं स्वच्छता के संबंध में अपने पंचायत राज अधिनियम में स्वच्छता, खाद्यान्न सुरक्षा हेतु इस प्रकार के प्रावधान नहीं किये हैं । 01 क्विंटल खाद्यान्न मूलभूत की राशि से पंचायतों में रख जरूरतमंद व्यक्ति को निःशुल्क प्रदाय कर खाद्यान्न सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रदेश द्वारा एक छोटा सा बीज रोपा गया जो देश के अन्य राज्यों के लिये रोल मॉडल बना।

73वें संविधान संशोधन द्वारा पंचायतों को विभिन्न विकास गतिविधियों को क्रियांवित करने के लिये पर्याप्त निधियां एवं वित्तीय प्रवाह उपलब्ध कराने हेतु राज्य स्थापना के साथ ही राज्य वित्त आयोग का गठन किया गया । वर्तमान में तृतीय राज्य वित्त आयोग का कार्यकाल वर्ष 2020 तक प्रभावशील है । पंचायतों में मूलभत सेवा-सुविधाओं के विकास हेतु द्वितीय राज्य वित्त आयोग के मेरे कार्यकाल में राज्य की पंचायतों में स्वयं के स्त्रोत संसाधनों से प्राप्त राजस्व का 06.15 प्रतिशत व्यय का मूलभूत कार्यों हेतु प्रावधान किया गया।

73वॉ संविधान संशोधन विधेयक मील का पत्थर है, इसके 03 वर्ष बाद पांचवी अनुसूची क्षेत्रों के लिये पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रो में पंचायत का विस्तार) अधिनियम, 1996 लागू किया गया जिसे संक्षिप्त में पेसा अधिनियम, 1996 भी कहा गया। देश में पंाचवीं एवं छठी अनुसूची के क्षेत्रों में स्व-शासन में परम्परओं एवं रूढ़ियों को मान्यता दी गई है।

परन्तु देश के पंाचवीं अनुसूची अंतर्गत दस राज्यों एवं छठी अनुसूची के पूर्वोत्तर राज्यों के विषय में किसी वक्तव्य में चर्चा नहीं की जाती जिसके कारण इन महत्वपूर्ण कानूनी प्रावधानों के विषय में जागरूकता की कमी रही है । इस विधेयक के पारित होने के लगभग एक दशक तक यह कछुए की गति से चलता रहा। माननीय डॉ. रमन सिंह के सरकार में आते ही इसमें तेजी आई एवं छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम, 1993 के धारा 129 'क' से 'च' में किये प्रावधानों के क्रियान्वयन में गति आई।

राजनीतिक इच्छाशक्ति एवं ईमानदारी से किये गये प्रयासों से परवान चढ़ी पंचायतराज प्रणाली के माध्यम से ग्राम सभा क्रांति का सूत्रपात हुआ जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव प्रदेश के पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों की पंचायतों पर भी पड़ा है। ग्राम सभा को सशक्त करने हेतु पेसा क्षेत्रों में पेसा मोबलाईजर नियुक्त किया गया है। मेरे द्वारा द्वितीय राज्य वित्त आयोग के कार्यकाल में 13 पूर्ण एवं 06 आशिक रूप से पेसा आच्छादित जिले के 85 जनपद पंचायतों के 5,056 ग्राम पंचायतों के सशक्तिकरण हेतु मूलभूत की राशि से रूपये 2.00 लाख प्रति ग्राम पंचायत प्रति वर्ष राज्य सरकार द्वारा उनके धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक परंपराओं के संरक्षण एवं संवर्द्धन हेतु प्रावधान किया गया है।

इन क्षेत्रों की ग्राम पंचायतें इस राशि व्यय करने का निर्णय स्वयं ले पा रही हैं जिससे इन क्षेत्रों की पंचायतें में आर्थिक स्थिति और निर्णय लेते हुए विकासपरक कार्य करने की क्षमता मजबूती से निरंतर बढ़ रही है । पेसा क्षेत्र की पंचायतों में कुल स्थानों में आधे स्थान अनुसूचित जाति वर्ग के लिए तथा अनुसूचित जाति वर्ग के लिए उनकी संख्या के अनुपात में स्थान आरक्षित किये जायेंगे।

सभी स्तर की पंचायतों में प्रमुख (सरपंच/अध्यक्ष) का पद अनुसूचित जनजाति वर्ग के सदस्य के होंगे। आदिवासी बाहुल्य पांचवी अनुसूची क्षेत्रों के लिये पेसा अधिनियम के वर्ष 1996 में लागू होने के पूर्व भी सदियों से आदिवासी समुदायों में पारम्परिक रूप से स्व-शासन की प्रथा रही है । वर्तमान परिदृश्य में जहां एक ओर शासन का प्रयास पांचवी अनुसूची क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को सशक्त करने का है,

वहीं कुछ असामाजिक राष्ट्रविरोधी उत्पाती तत्वों द्वारा 'पत्थलगड़ी' जैसे पवित्र एवं पारम्परिक प्रथा को व्यक्तिगत हित के लिये तोड़मरोड़ कर प्रस्तुत कर राजनैतिक दुर्भावना से दुष्प्रेरित हो प्रदेश के भोले-भाले आदिवासियों को भटकाकर लोकतांत्रिक व्यवस्था को खंडित करने का षड्यंत्र रचा जा रहा है । विकास-विरोधी तत्वों द्वारा आदिवासी परम्पराओं को ढाल बनाकर विकासोन्मुखी सरकार के विरूद्ध सीधे-सादे आदिवासियों को बरगलाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करने की मंशा से यह कृत किया जा रहा है,

जिसका निहित उद्देश्य संवैधानिक ना होकर मात्र व्यावसायिक एवं कूटनीतिक लाभ लेना है । यदि ऐसा नहीं होता तो पत्थलगड़ी को कभी परम्पराओं के अभिलेख के रूप में, तो कभी संविधान द्वारा दिये अधिकारों की रक्षा के नाम पर, तो कभी पत्थरों पर उकेरे गये पेसा के अधिकारों के रूप में, तोे कभी धर्म एवं धर्मांतरण के नाम पर तो कभी कभी गांव की सीमा के सीमांकन के नाम पर दुष्प्रचार कर हथकंडे के रूप में दुरूपयोग नहीं किया जाता।

जिन अधिकारों को पत्थलगड़ी के माध्यम से मांगे जाने का भ्रामक आंदोलन संविधान-विरोधी ताकतों द्वारा चलाया जा रहा है, वो सरकार द्वारा पहले ही ग्राम सभाओं और पंचायतों को प्राप्त हैं। संविधान एवं पेसा अधिनियम के प्रावधानों अनुरूप जल, जंगल एवं जमीन संबधी अधिकार ग्राम सभाओं को प्राप्त है । आवश्कता ग्राम सभाओं द्वारा उन संवैधानिक अधिकारों का सही उपयोग करने की है।

उससे बड़ी आवश्यकता है कि ग्राम सभाएं वास्तविक रूप से इन अधिकारों का सदुपयोग कर, उन्हें सौंपे गये संवैधानिक अधिकारों और दायित्वों का निर्वहन करें एवं जागरूक हो जल, जंगल एवं जमीन की रक्षा करें । प्रदेश के 27 जिलों पंचायतों, 146 जनपद पंचायतों तथा 10,971 ग्राम पंचायतों में बसे 45,40,999 ग्रामीण परिवारों ने पिछले 02 दशकों में तेजी से विकास के नये कीर्तिमान रचे हैं।

इसके लिये प्रदेश सरकार के साथ मिलकर पंचायतों ने कड़ी मेहनत की है। प्रदेश सरकार का लक्ष्य 20,126 गांवों में बसे लोगों के लिए पंचायतों के माध्यम से आधारभूत सेवा-सुविधाएं सुनिश्चित करना और ग्रामवासियों के जीवन के स्तर में सुधार लाना है। प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार के आते ही सबसे बड़ी चुनौती सामाजिक न्याय की स्थापना एवं आर्थिक विकास को तेज करना रहा।

संविधान ने पंचायतों को अलग-अलग स्तरों पर जिम्मेदारी और शक्तियां सौंपी है। सरकार की लोकहितकारी योजनाओं एवं कार्यक्रमों को जन-जन तक पहंुचाने में पंचायतों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। पंचायतों में पोषण, आवास, स्वच्छता, पेयजल, स्वास्थ्य, आजीविका, शिक्षा, सड़क, बिजली, पेंशन, टिकाउ जैसे बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति राज्य शासन के द्वारा पंचायतों के माध्यम से किया जा रहा है जो कि विश्वस्तर पर सतत् विकास के लक्ष्यों में भी सम्मिलित है जिसकी प्राप्ति के लिये छत्तीसगढ़ सरकार अग्रसर है।

वर्ष 2002-03 में विभाग का बजट रू. 03.00 करोड़ था वहीं अन्त्योदय की भावना से विकास का लाभ जन-जन तक पहुॅचाने के उद्देश्य यह वर्ष 2017-18 में बढ़कर 10 हजार करोड़ हो गया और निचले स्तर तक निरंतर मजबूती प्रदान की जा रही है । सामान्य क्षेत्रों में रेत उत्खनन ग्राम सभा के प्रस्ताव के आधार पर खनिज विभाग द्वारा अनुज्ञा पत्र जारी किया जाता है एवं पांचवी अनुसूची क्षेत्रों में रेत उत्खनन एवं प्रबंधन ग्राम सभा के द्वारा पारित प्रस्ताव पर सीधा पंचायतों को सौंपी गई है।

गौण खनिज की रायल्टी की राशि पंचायतों को दी गई है। इस स्त्रोत से संबंधित खदान क्षेत्र वाले ग्राम पंचायतों के विकास हेतु राशि दी जा रही है। इससे एक तरफ जहां पंचायतों को आय प्राप्त हो रही है वहीं दूसरी ओर पंचायतों का विकास हो रहा है। पेसा क्षेत्र की पंचायतों में विभिन्न गतिविधियां जैसे भूमि अधिग्रहण, आबकारी, साहूकारी प्रथा इत्यादि से संबंधित गतिविधियों पर नियंत्रण के अधिकार पेसा क्षेत्र की पंचायतों और ग्राम सभा को सौंपे गये हैं।

प्रदेश के पांचवी अनुसूची क्षेत्र के पंचायतों में पंचायत उपबन्ध (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996 के संबंध में जागरूकता लाने के उद्देश्य से संबंधित जिलों एवं 85 जनपद पंचायतों में विशेष प्रशिक्षण-सह-कार्यशाला आयोजित कर जनप्रतिनिधियों की क्षमता का विकास किया जा रहा हैै। हमर छत्तीसगढ़' योजना के तहत राजधानी भ्रमण पर आये राज्य के पांचवी अनुसूची क्षेत्रों के पंचायत प्रतिनिधियों को पेसा कानून के संबंध में विशेष रूप से उनको जानकारी प्रदान की जा रही है।

प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के माध्यम से विभाग द्वारा वर्ष 2016 से 2019 तक कुल 6.88 लाख आवासहीन परिवारों को आवास उपलब्ध कराया जा रहा है जिसमें से वर्तमान में 3.59 लाख आवास पूर्ण हो चुके हैं एवं भारत सरकार द्वारा बनाये गये कार्यनिष्पादन सूचकांक में छत्तीसगढ़ राज्य को प्रथम स्थान प्राप्त हुआ है। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के अंतर्गत ग्रामीणों के आवास निर्माण हेतु निर्माण सामग्री भी उचित दरों पर उपलब्ध हो रहा है।

प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के तहत प्रदेश के विशेष पिछड़ी जनजाति के आवासहीन परिवारों को शत्-प्रतिशत सैचुरेशन अप्रोच के साथ आवास प्रदाय किया जा रहा है। माननीय प्रधानमंत्री जी के स्वच्छ भारत के सपने को विभाग साकार कर रहा है। हमारे मुख्यमंत्री महोदय ने लक्ष्य से 01 वर्ष पूर्व ही पूरे राज्य को खुले में शौचमुक्त बनाने का संकल्प लिया है, जिसे हम आज प्राप्त करने जा रहे हैं।

स्वच्छ भारत मिशन कार्यक्रम की शुरूआत में स्वच्छता का कवरेज 31 प्रतिशत से बढ़कर 100 प्रतिशत हो गया है। महात्मा गांधी नरेगा योजना ग्रामिणों को सबल बना रहा है। इसी तरह महिलाओं के सामुहिक आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए बिहान योजना संचालित है। इसमें भी नई उप योजनाएं जुड़ती जा रही है। सांसद/विधायक आदर्श ग्राम योजना एवं रूर्बन मिशन ग्रामों के समग्र विकास के लिए कार्यरत है।

ग्राम पंचायतों द्वारा योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन एवं योजनाओं के आय-व्यय पर ग्राम सभा एवं स्थानीय समुदाय द्वारा वित्तीय नियंत्रण हेतु सामाजिक अंकेक्षण इकाई काम कर रही है जो विभिन्न प्रशिक्षणों के माध्यम से ग्राम सभा को और भी जागरूक एवं सशक्त बना रही है। प्रदेश सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्र में 'श्रद्धांजलि योजना' लागू की गई है।

प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्र में निवासरत ऐसे परिवार जो सामाजिक आर्थिक एवं जातिगत जनगणना, 2011 के आंकडों के अनुसार वंचित परिवार के रूप में सम्मिलित हैं, इस योजना से लाभांवित होंगे योजना अंतर्गत परिवार के मुखिया या कमाऊ सदस्य के मृत्यु होने पर 24 घंटे की भीतर मृतक के अंतिम संस्कार हेतु राशि रू. 2000/- पंचायत के माध्यम से दिया जायेगा।

प्रदेश के ग्राम पंचायतों में संचालित नल-जल योजना, स्ट्रीट लाईट आदि के विद्युत देयकों का भुगतान प्रदेश सरकार द्वारा विद्युत वितरण कंपनी को दिया जा रहा है। इस व्यवस्था से अब ग्राम पंचायतों को अब विद्युत देयक का भुगतान करने की आवश्यकता नहीं हो रही है। मुख्यमंत्री समग्र ग्रामीण विकास योजना से अन्य योजनाओं में अभिसरण कर कार्य स्वीकृत किये गये हैं जैसे ग्राम पंचायत भवन, मिनी स्टेडियम एवं नाली निर्माण के कार्य इत्यादि।

सामाजिक सौहार्द को बढ़ावा देने, गरीब परिवारों तक पहंुच कायम करने और केन्द्र एवं राज्य सरकार की विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं एवं कार्यक्रमों से वंचित रह गये लोगों को दायरे में लाकर उन्हें लाभांवित करने उद्देश्य से पूरे देश में 14 अप्रैल से 05 मई 2018 तक अनवरत चलने वाला ग्राम स्वराज अभियान अपने आप में बहुत कुछ समेटे हुए है।

ग्राम स्वराज अभियान के दौरान गांवों के लिए विशेष पहल शुरू करना एवं छत्तीसगढ़ का इन योजनाओं में अच्छे रैंक पर आना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इस अभियान के तहत गरीबों की जिंदगी में खुशहाली लाने के लिए उज्जवला योजना, मिशन इन्द्रधनुष, सौभाग्य योजना, उजाला योजना, जन धन योजना, जीवन ज्योति बीमा योजना और प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना का शत-प्रतिशत आच्छादन किया गया।

इसी दौरान आयुष्मान भारत और किसान कल्याण कार्यक्रम भी आयोजित किये गये। गांव, गरीब, किसान व पंचायत को सशक्त बनाने की केन्द्र एवं राज्य सरकार की प्रतिबद्धता यह सिद्ध करती है कि वह दिन दूर नहीं जब ग्राम उदय से भारत उदय द्वारा ग्राम स्वराज की परिकल्पना जमीनीं हकीकत में बदल जायेगी। (टीप - यह लेखक के निजी विचार हैं) 2005 में किये गये संशोधन में प्रदेश के ग्राम पंचायतों में जरूरतमंद व्यक्तियों के लिए निःशुल्क अनाज उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया है।

इस योजना अंतर्गत मूलभूत राशि से जरूरतमंद व्यक्ति को उचित मात्रा में निःशुल्क खाद्यान्न की उपलब्धता हेतु प्रत्येक ग्राम में कम से कम 01 क्विंटल खाद्यान्न सदैव उपलब्ध रहेगा तथा उपयोग नहीं होने की स्थिति में राशन दुकान से अदला बदली की जा सकेगी । 2008 में किये गये संशोधन में प्रदेश में ग्राम सभा की वर्ष में कम से कम 06 बैठकें होगी जिसमें प्रत्येक 02 माह में कम से कम 01 बैठक होना अनिवार्य है।

इसके लिए निर्धारित तिथि प्रस्तावित की गई है - 23 जनवरी, 14 अप्रैल, 20 अगस्त, 02 अक्टूबर एवं माह जून तथा नवम्बर। इसके अतिरिक्त माह दिसम्बर में वार्षिक ग्राम सभा का भी प्रावधान किया गया। पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्र में पंचायतों का विस्तार अधिनियम) के तहत अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों की आबादी के समानुपात में, उस क्षेत्र में स्थापित पंचायतों में उनके लिये सीटों के आरक्षण की व्यवस्था है।

अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिये आरक्षित सीटों की आधी सीट (50 प्रतिशत) इन श्रेणियों की महिलाओं के लिये आरक्षित होगी। सीधे चुनावों से भरी जाने वाली सीटों की आधी सीट (50 प्रतिशत) महिलाओं के लिये आरक्षित होगी और ऐसी सीटें भिन्न-भिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में चक्रानुक्रम द्वारा आबंटित की जायेगी। ग्राम या किसी अन्य स्तर की पंचायतों में अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिये अध्यक्ष के पद, उस क्षेत्र में उनकी आबादी के समानुपात में आरक्षित किये जायेंगे।

प्रत्येक स्तर की पंचायत के कुल अध्यक्ष पदों की आधी सीट (50 प्रतिशत) महिलाओं के लिये आरक्षित किया गया। 2013 में किये गये संशोधन में स्थायी समिति में सचिव व्यवस्था का प्रावधान भी किया गया जिसमें ग्राम पंचायत का सचिव सामान्य प्रशासन समिति तथा निर्माण एवं विकास समिति का पदेन सचिव होगा शेष अन्य तीन समिति के सचिव कलेक्टर द्वारा नांमाकित ग्राम पंचायत स्तर के लाईन विभाग के कर्मचारी होंगे। छत्तीसगढ़ पंचायत (सामग्री तथा माल क्रय) नियम, 2013 प्रदेश में लाया गया है।

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