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भारत-पाक रिश्ते: शह-मात के इस खेल में हमें करनी होगी पहल

पाकिस्तान जिस तरह का रवैया अपनाए हुए है, ऐसे में उससे बातचीत शुरू करना संभव ही नहीं है।

भारत-पाक रिश्ते: शह-मात के इस खेल में हमें करनी होगी पहल
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पाकिस्तान के साथ शह और मात का यह खेल क्या अनंत काल तक जारी रहेगा। इस तनाव का अंत आखिर कहां जाकर होगा। कई तरह के विचार इस बीच सामने आ रहे हैं। कुछ बड़ी आसानी से कह देते हैं कि पाक का हमेशा के लिए टंटा ही खत्म कर देना चाहिए।

किस तरह, यह वो भी नहीं जानते। कुछ का मत है कि जिस तरह पिछले सितंबर में सर्जिकल स्ट्राइक करके उसे सबक सिखाया था, वैसा ही फिर से कुछ करने की जरूरत है।

एक वर्ग चाहता है कि दीर्घकाल तक समग्र वार्ता को टाले रखना सही नहीं है,परंतु ऐसा विचार रखने वालों के पास इसका कोई जवाब नहीं है कि क्या प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से दोस्ती कायम करने और बातचीत को पटरी पर लाने में कोई कोर कसर बाकी छोड़ी थी? उन्हें अपने शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित किया।

खुद रूस और काबुल से लौटते हुए लाहौर रुके। बदले में क्या मिला। पठानकोट एयरबेस पर हमला। लगातार घुसपैठ। हमले और युद्ध विराम का उल्लंघन। यही नहीं, संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच पर बुरहान वानी को पाक प्रधानमंत्री ने शहीद घोषित करने की बेशर्मी तक दिखा डाली। भारत के खिलाफ उसने हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर जहर ही उगलने का काम किया।

लगता ही नहीं कि उसकी बातचीत में किसी तरह की दिलचस्पी है। वह लगातार पत्थरबाजों को भारतीय सुरक्षाबलों के खिलाफ इस्तेमाल कर रहा है। अलगाववादी उसके इशारे पर नाच रहे हैं। वह हर वो काम कर रहा है, जिससे भारत को तकलीफ पहुंचे। मुंबई के हमलावरों के खिलाफ जितने सबूत उसे सौंपे गए हैं, वह किसी भी दोषी को उसके अंजाम तक पहुंचाने में पर्याप्त हैं।

उन्हीं के आधार पर आमिर अजमल कसाब को फांसी दी जा चुकी है, परंतु वहां की पुलिस और अदालतें मुकदमे को आगे ही नहीं बढ़ने दे रहीं। पठानकोट एयरबेस पर हमले के सबूत भी उसे सौंपे गए। पहली बार किसी सरकार ने उसकी जांच टीम को मौके का मुआयना करने की अनुमति दी,परंतु नतीजा क्या निकला। उसके बाद भी उड़ी सेक्टर में सेना के कैंप पर हमला हुआ, जिसमें 19 सैनिक शहीद हो गए।

इसी के बाद भारत को सर्जिकल स्ट्राइक कर पाकिस्तान को बताना पड़ा कि बर्दाश्त और सब्र की भी एक सीमा होती है। अब जिस तरह नेवी के पूर्व कमांडर कुलभूषण जाधव को पाकिस्तानी सेना की विशेष अदालत ने आनन-फानन में फांसी की सजा सुना दी है,

उससे इसकी पक्के तौर पर पुष्टि हो गई है कि वहां का पूरा निजाम भारत को अपना दुश्मन नंबर एक मानता है और उसकी रिश्तों को सामान्य करने में कतई दिलचस्पी नहीं है। प्रश्न यही उठता है कि ऐसे में भारत के सामने रास्ता क्या है? पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा यूं तो लंबे समय से मोदी सरकार के खिलाफ अपनी नाराजगी जाहिर करते रहे हैं, परंतु उनका यह सुझाव गौर करने लायक है।

उनका कहना है कि पाकिस्तान से बातचीत बिल्कुल नहीं करनी चाहिए। बातचीत जम्मू-कश्मीर के अलगाववादियों के साथ होनी चाहिए। उनका कहना है कि अटल बिहारी वाजपेयी भी अलगाववादियों के साथ बातचीत के पक्षधर थे। मौजूदा मोदी सरकार ने उनसे बातचीत के दरवाजे बिल्कुल बंद कर रखे हैं, जो सही नीति नहीं है।

इसी का पाकिस्तान फायदा उठा रहा है। दरअसल, पाकिस्तान जिस तरह का रवैया अपनाए हुए है, ऐसे में उससे बातचीत शुरू करना संभव ही नहीं है। अलगाववादियों के साथ पाक हुक्मरानों का संवाद कमजोर पड़े, इसके लिए जरूरी है कि भारत सरकार को इनसे बातचीत की पहल करनी चाहिए। पाकिस्तान को अलग-थलग करने और उसके मंसूबों में नाकाम करने के लिए यह एक बेहतर रास्ता होगा।

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