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डॉ. रहीस सिंह का लेख : भरोसे के काबिल नहीं पाक

भारत को पहल करने से न केवल बचना चाहिए बल्कि पाकिस्तान को ऐसी पहल करने देनी चाहिए। भारत हमेशा से आशावाद और अपनी उदार विदेश नीति के तहत ऐसी पहलें करता रहा है, लेकिन पाकिस्तान ने कभी भी मैत्री धर्म का अनुपालन नहीं किया। उसने हर बार भारत को कोई नया घाव ही दिया। 1947 की कबायलियों के बहाने पाकिस्तानी सेना की कश्मीर में घुसपैठ से लेकर पुलवामा घटना तक हम पाकिस्तान के चरित्र के अनेकानेक उदाहरण देख सकते हैं। अभी वह भरोसे के काबिल नहीं बना है।

डॉ. रहीस सिंह का लेख :  भरोसे के काबिल नहीं पाक
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पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की फाइल फोटो। 

डॉ. रहीस सिंह

एक चिठ्ठी नई दिल्ली से इस्लामाबाद इमरान खान और पाकिस्तान को शुभकामनाओं के साथ गई और बदले में एक खत इस्लामाबाद से नई दिल्ली प्रधानमंत्री का शुक्रिया अदा करते हुए आया। शायद रिश्तों की नई इबारत यहीं से शुरू हो और दोनों देशों के रिश्तों पर पड़ी गर्द कुछ हटे। बाकी कड़ियां इसके बाद जुड़नी हैं। लेकिन क्या इस आशा के अनुरूप पाकिस्तान अपना चरित्र, चेहरा और चाल बदल पाएगा? उम्मीद कम है। इसका उदाहरण कपास व चीनी आयात मामले में देखा जा चुका है। दूसरा यह कि पाकिस्तान दक्षिण एशिया में स्वतंत्र नीतियों का निर्माण नहीं करता। कभी वह अमेरिका के सिपहसालार के रूप काम कर रहा था जबकि आज वह चीन के प्यादे के रूप में कर रहा है। भले ही औपचारिक तौर पर चीन उसे अपना आॅल वेदर फ्रेंड नाम दे रहा हो। ऐसे में पाकिस्तान के प्रति भारत का उदारतापूर्ण कदम क्या विदेश नीति के 'रीयल पाॅलिटिक फैक्टर' का सम्मान कर पाएगा?

23 मार्च को पाकिस्तान दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाक प्रधानमंत्री इमरान खान को पत्र लिखकर बधाई दी और उनके कोविड पाॅजिटिव हो जाने पर ट्वीट कर शीघ्र स्वस्थ होने की कामना व्यक्त की। 29 मार्च को इमरान खान ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को धन्यवाद कहने के साथ ही यह भी लिखा है-'पाकिस्तान के लोग भी भारत समेत अपने सभी पड़ोसी देशों के साथ शांतिपूर्ण और सहयोगपूर्ण रिश्ते चाहते हैं। हम इस बात को लेकर निश्चिंत हैं कि दक्षिण एशिया में स्थाई शांति और स्थिरता भारत और पाकिस्तान के बीच सभी मुद्दों, जिनमें खासतौर पर जम्मू और कश्मीर का विवाद शामिल है, के सुलझ जाने से जुड़ी है।' उन्होंने यह भी लिखा है कि हमें विश्वास है कि दक्षिण एशिया में शांति और स्थिरता के लिए भारत एवं पाकिस्तान सभी मुद्दों को सुलझा लेंगे, खासकर जम्मू-कश्मीर विवाद। सकारात्मक और समाधान लायक बातचीत के लिए अनुकूल माहौल बनाना जरूरी है। पाक प्रधानमंत्री की तरफ से यह इसलिए लिखा गया क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी द्वारा इमरान खान को लिखे गये पत्र में पाकिस्तान दिवस की बधाई देने के साथ-साथ एक संदेश भी लिखा था- भरोसे के वातावरण की जरूरत है, जिसमें न आतंक हो और न शत्रुता। ये तीनों बातें पाकिस्तान के लिए इसलिए बहुत अहम हैं क्योंकि पाकिस्तान यदि ऐसा करता है तो उसका चरित्र ही बदल जाएगा। लेकिन क्या पाकिस्तान अपना चरित्र बदलने के लिए तैयार होगा?

इसी क्रम में पाक रियल स्टेट एक्टर यानि फौज भी बेहतर इरादों को व्यक्त करती हुई दिख रही है। उसके चीफ जनरल कमर वाहिद बाजवा ने भारत के साथ बेहतर रिश्ते बनाने की इच्छा जताई है। रियल स्टेट एक्टर और पाॅलिटिकल स्टैब्लिशमेंट की तरफ से व्यक्त की गयी ऐसी इच्छा स्वागत योग्य है, लेकिन कुछ स्वाभाविक से प्रश्न भी हैं। पहला प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में पाकिस्तान ने कभी भी भारत के साथ सम्बंधों को लेकर कोई वास्तविक सकारात्मक पहल की है? दूसरा- पाकिस्तानी आर्मी चीफ कहते हैं कि दोनों देशों को पीछे की बातों को भुला कर आगे की तरफ देखना चाहिए। लेकिन पाक फौज क्या सच में ऐसा कर पाएगी? यदि ऐसा है तो सबसे पहले पाकिस्तान को कश्मीर राग छोड़ देना चाहिए। एक बात और, क्या पाकिस्तान भारत के साथ अपनी पैदाइशी शत्रुता त्याग पाएगा? क्या पाकिस्तान उस थर्ड स्टेट एक्टर (चरमपंथी जमात) को समाप्त कर पाएगा जो भारत को 'इटरनल एनमी' मानता है ? चरमपंथ और पाकिस्तानी सेना का गठजोड़, जो सीधे तौर पर भारत के खिलाफ एक टैक्टिस के तौर पर बनाया गया है, जिसने भारत को काफी नुकसान भी पहुंचाया, क्या वह टूट पाएगा? यदि नहीं तो क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस उदार और भ्रातृत्वपूर्ण नेबरहुड फर्स्ट के महत्व को पाकिस्तान समझेगा?

पाकिस्तानी उच्चायोग के वरिष्ठ राजनयिक आफताब हसन खान भी मैत्री की पैरोकारी कर रहे हैं। उनका कहना है कि दोनों देशों को युद्ध के बारे में सोचने की बजाए अपने देश की गरीबी और अशिक्षा मिटाने के लिए काम करना चाहिए। लेकिन इस सलाह की तो पाकिस्तान को जरूरत है। यही नहीं आफताब हसन खान कश्मीर राग छेड़ने से नहीं चूके। उन्होंने कहा, 'सतत शांति और स्थिरता के लिए यह जरूरी है कि हम बातचीत से सभी द्विपक्षीय मुद्दों को हल करें। खासकर, जम्मू-कश्मीर के मुख्य मुद्दे को, जो बेहद जरूरी भी है और पिछले 70 सालों से लंबित है। फिर कैसे यह मान लिया जाए कि पाकिस्तान सद्इच्छा से भारत के साथ आगे बढ़ना चाहता है। मेरी समझ से भारत को पहल करने से न केवल बचना चाहिए बल्कि पाकिस्तान को ऐसी पहल करने देनी चाहिए।

भारत हमेशा से आशावाद और अपनी उदार विदेश नीति के तहत ऐसी पहलें करता रहा है लेकिन पाकिस्तान ने कभी भी मैत्री धर्म का अनुपालन नहीं किया। उसने हर बार भारत को कोई नया घाव ही दिया। 1947 की कबायलियों के बहाने पाकिस्तानी सेना की कश्मीर में घुसपैठ से लेकर पुलवामा घटना तक हम पाकिस्तान के चरित्र के अनेकानेक उदाहरण देख सकते हैं। एक बात और, कुछ अंतर्राष्ट्रीय खबरें बताती हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच मैत्री प्रयास स्वाभाविक नहीं हैं बल्कि बाहरी प्रयासों से ऐसा संभव हो रहा है। उदाहरण के तौर पर ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट को देख सकते हैं। इस रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि दोनों देशों के संबंधों को पटरी पर लाने के लिए संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) मध्यस्थता की भूमिका निभा रहा है। दूसरा पक्ष यह भी बताया जा रहा है कि जो बाइडेन प्रशासन की तरफ से यह कोशिश की जा रही है कि भारत-पाकिस्तान सम्बंधों में सुधार आए।

दरअसल अमेरिका को यह लगने लगा है कि ट्रंप प्रशासन के समय पाकिस्तान पूरी तरह से चीन की तरफ खिसक गया। चीन ने इसका फायदा उठाया। उसने इन्फ्रास्ट्रक्चर में सहयोग के साथ-साथ सैन्य सहायता देकर वाया पाकिस्तान दक्षिण एशिया में अपनी दखल के पुख्ता इंतजाम कर लिये। दक्षिण एशिया में अमेरिका पुरानी हैसियत पाना चाहता है और इसके लिए पाकिस्तान ही मुख्य जरिया हो सकता है। लेकिन अमेरिका भारत को आगे करना चाहता है। वजह यह कि भारत इस समय इंडो-पेसिफिक में एक तरह से अमेरिका का मिलिट्री एलायंस है, जिसके माध्यम से वह पेसिफिक में चीन की ताकत को काउंटर करना चाहता है। लेकिन भारत आज इस हैसियत में है कि वह विदेश नीति में स्वतंत्र निर्णय ले सके। दोनों देशों की तरफ से मैत्री के लिए जो प्रयास दिख रहे हैं उन्हें देखते हुए अभी तो किसी निष्कर्ष पर पहुंचा नहीं जा सकता क्योंकि पाकिस्तान एक अनिश्चित और समस्या प्रधान राष्ट्र है, उसका चरित्र भरोसे के काबिल नहीं है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।

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