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प्रभात कुमार रॉय का लेख : नई कट्टरता की गिरफ्त में पाकिस्तान

पाकिस्तान इन दिनों एक विकट अंतर्द्वंद्व के दौर से गुजर रहा है। पाकिस्तान में साद हुसैन रिजवी के नेतृत्व में तहरीक-ए-लब्बेक पार्टी (टीएलपी) ने पाकिस्तान के अनेक शहरों में भयानक हिंसक कोहराम मचा रखा है। विगत वर्ष 2020 में नवंबर माह से फ्रांस के विरुद्ध पाकिस्तान में टीएलपी द्वारा प्रदर्शन प्रारंभ किए गए थे। कुछ वक्त के बाद इमरान हुकूमत और टीएलपी के मध्य एक राजनीतिक समझौता अंजाम दिया गया, जिसके तहत टीएलपी की कुछ मांगों को स्वीकार कर लिया गया। मार्च 2021 में टीएलपी ने फ्रांस के सामान का संपूर्ण बायकॉट करने और फ्रांस से कूटनीतिक ताल्लुकात तोड़ देने की मांगों को लेकर पुनः प्रदर्शन शुरू कर दिए।

प्रभात कुमार रॉय का लेख : नई कट्टरता की गिरफ्त में पाकिस्तान
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प्रभात कुमार रॉय 

प्रभात कुमार रॉय

पाकिस्तान आजकल एक विकट अंतर्द्वंद्व के दौर से गुजर रहा है। पाकिस्तान में साद हुसैन रिजवी के नेतृत्व में तहरीक-ए-लब्बेक पार्टी (टीएलपी) ने पाकिस्तान के अनेक शहरों में भयानक हिंसक कोहराम मचा रखा है। टीएलपी के प्रमुख नेता मौलाना साद हुसैन रिजवी की गिरफ्तारी के पश्चात ये हिंसक प्रदर्शन और अधिक उग्र हो गए। टीएलपी द्वारा आयोजित हिंसक प्रदर्शनों में पाक़ पैरामिलिट्री फोर्स के तकरीबन एक हजार रेंजर्स जख्मी हो गए और दस लोगों की मौत हो गई।

उल्लेखनीय है कि विगत वर्ष 2020 में नवंबर माह से फ्रांस के विरुद्ध पाकिस्तान में टीएलपी द्वारा प्रदर्शन प्रारंभ किए गए थे। कुछ वक्त के बाद इमरान हुकूमत और टीएलपी के मध्य एक राजनीतिक समझौता अंजाम दिया गया, जिसके तहत टीएलपी की कुछ मांगों को स्वीकार कर लिया गया। मार्च 2021 में टीएलपी ने फिर फ्रांस के सामान का संपूर्ण बायकॉट करने और फ्रांस से कूटनीतिक ताल्लुकात तोड़ देने की मांगों को लेकर पुनः प्रदर्शन शुरू कर दिए। इमरान सरकार ने टीएलपी को 1997 के एंटी टैरैरिस्ट एक्ट के तहत प्रतिबंधित राजनीतिक संगठन करार दे दिया है। टीएलपी की बुनियाद साद हुसैन रिजवी के पिता मौलाना खादिम हुसैन रिजवी ने एक अगस्त 2015 रखी थी। पाकिस्तान के विगत आम चुनाव में टीएलपी ने भी प्रत्याशी उतारे और कुल वोटों की आठ प्रतिशत मत हासिल करके राजनीतिक पर्यवेक्षकों को हैरत में डाल दिया।

विचारधारा की दृष्टि से टीएलपी एक कट्टरपंथी इस्लामिक पार्टी है, जो सुन्नी इस्लाम के बरेलवी संप्रदाय को मानती है। महज पांच वर्ष के अंतराल में टीएलपी एक ऐसी विध्वंसक ताकत के तौर पर उभरी है, जो पाक़ सरकार को हिसंक चुनौती दे रही है। पाकिस्तान की सियासत में इस्लामिक कट्टरता कोई नया नजरिया नहीं है वरन यह टीएलपी के तौर पर एक नए रंगरूप और आकार में उभरा है। इमरान खान की राजनीतिक ताकत की पृष्ठभूमि में कट्टरपंथी इस्लामिक ताकतें विद्यमान रही हैं। पाक में जिआ-उल-हक की सैन्य तानाशाही के दौर में हुकूमत और फौज का कट्टर इस्लामीकरण शुरू हुआ था, जो अब तक पाक की राजसत्ता और फौज का वास्तविक चरित्र बना हुआ है। कट्टरपंथी इस्लाम के विषय में फ्रांस के राष्ट्रपति एमुनल मैक्रों का नज़रिया प्रजातांत्रिक और उदारवादी फ्रांस के संविधान के एकदम अनुरूप रहा है। फ्रांस का संविधान स्वयं को सेक्युलर संविधान घोषित करता है और किसी भी धर्म और विचारधारा की खुली आलोचना करने की स्पष्ट स्वतंत्रता प्रदान करता है। उल्लेखनीय है कि फ्रांस की एक व्यंग्य पत्रिका शार्ली एब्दो में हज़रत मोहम्मद का एक कार्टून प्रकाशित किया था। इस कार्टून को लेकर ही सारा बबाल खड़ा हुआ है। फ्रांस सरकार ने पत्रिका शार्ली एब्दो के विरुद्ध किसी प्रकार की प्रतिबंधात्मक कार्यवाही करने से स्पष्ट इंकार कर दिया।

सैमुएल पैटी नामक फ्रैंच अध्यापक की एक धर्मान्ध आतंकवादी द्वारा महज इसलिए हत्या कर दी गई कि उसने क्लास रूम में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को समझाते हुए मोहम्मद के पत्रिका शार्ली एब्दो में प्रकाशित कार्टून को अपने विद्यार्थियों के दिखाया था। यूं तो प्रायः सभी मुस्िलम देशों में फ्रांस के बरखिलाफ गुस्से का इजहार किया गया, किंतु टर्की ने मुस्लिम देशों का अगवा नेता बनने की चाहत में फ्रांस के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही करके हुए फ्रांसिसी सामान का बायकॉट करने का ऐलान कर दिया। टर्की के सुर में सुर मिलाते हुए पाकिस्तान में भी फ्रांस के विरुद्ध दुंदुभी बजने लगी है। पाकिस्तान हुकूमत के सामने आर्थिक दिवालिया हो जाने का संकट खड़ा है। फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) द्वारा पाक़ को ग्रे लिस्ट में डाला जा चुका है। फ्रांस के साथ यदि पाक़ अपने कूटनीतिक संबंधों को तोड़ देता है तो फिर यूरोपियन यूनियन के समस्त 27 देश पाकिस्तान के खिलाफ एकजुट हो जाएंगे। पाक को यदि निकट भविष्य में एफएटीएफ ने ब्लैक लिस्ट में डाल दिया तो उसे दिवालिया हो जाना पड़ेगा।

फिलहाल हालात की गंभीरता देखते हुए फ्रांस ने अपने 15 कूटनीतिज्ञों को पाकिस्तान से वापस बुला लिया है। फ्रांस के विषय में इमरान सरकार यदि टीएलपी के कट्टरपंथियों के समक्ष घुटने टिका देती है तो फिर पहले से दुनिया के पटल पर अलग-थलग पड़ा हुआ पाकिस्तान आत्म विनाश के कगार पर पंहुच जाएगा। अफ़गानिस्तान को लेकर भी पाकिस्तान पर नॉटो देश अपना यकीन खो चुके हैं। अफ़गानिस्तान से अमेरिका की कयादत में नॉटो फौज की संपूर्ण वापसी 11 सितंबर 2021 तक हो तय हुई है। अफगानिस्तान में इसके बाद जो हालात उत्पन्न होंगे, इसकी कल्पना तो अभी नहीं की जा सकती है। क्या नॉटो शक्ति के पलायन के बाद तालिबान अफगानिस्तान पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लेगा। नॉटो सेना विगत 20 वर्षों में तालिबान मुजाहिदों को परास्त करने में नाकाम सिद्ध हुई है। पाकिस्तान का समर्थन सदैव ही तालिबान को हासिल रहा है। अफ़गानिस्तान में सक्रिय जेहादी हक्कानी गिरोह को पाक़ फौज का प्रबल संरक्षण और समर्थन मिलता रहा है। विश्व की तमाम शक्तियों को पाक़ समर्थक तालिबान को अफगानिस्तान को हथियाने रोकना होगा।

अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका, भारत, रूस और चीन सभी जेहादियों की धर्मान्ध हिंसा के शिकार रहे हैं। दुनिया के पटल पर अलकायदा, इस्लामिक स्टेट आदि अनेक तंजीम अपना आतंकवादी कहर बरपा करते रहे हैं। दुर्भाग्यवश खुद जेहादी नृशंसता का शिकार रहे देश चीन ने पाकिस्तान के अंधसमर्थन में जेहादी तंजीम जैश के सरगना को ग्लोबल आतंकवादी घोषित करने के रोकने के लिए तीन दफा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो किया। कैसा पाखंड है कि अब चीन के कम्युनिस्ट शासक अफगानिस्तान से नाटो सेना के पलायन पर गहरी चिंता जता रहे हैं। पाकिस्तान को दरकिनार करके सभी विश्व शक्तियों को अफ़गानिस्तान की हुकूमत की सैन्य और आर्थिक मदद करनी चाहिए, ताकि वह अमेरिकी फौज के पलायन के बाद तालिबान दहशतगर्दों को निर्णायक शिकस्त दे सके। क्या कभी धर्मान्ध इस्लामिक जेहादियों का हृदय परिवर्तन संभव हो सकता है? अमेरिका ने अपनी सैन्य असफलताएं छुपाकर कथित तौर पर इज्जत के साथ पलायन करने की खातिर पाखंडी पाकिस्तान की मध्यस्थता में तालिबान के साथ एक शर्मनाक समझौता अंजाम दिया है। कतर की राजधानी दोहा में विगत दो वर्ष से अमेरिका और तालिबान के मध्य जारी शांतिवार्ता में अफगानिस्तान सरकार को शामिल तक नहीं किया गया और अमेरिका ने अफगानिस्तान को पूरी तरह से दगा देते हुए तालिबान के साथ एकतरफा समझौता अंजाम दे दिया। भारतीय उपमहाद्वीप और एशिया में शांति की दरकार है तो तालिबान सरीखी धर्मान्ध जेहादी आतंकवादियों को दुनिया की सभी उदार शक्तियों को एकजुट होकर शिकस्त देनी होगी।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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