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पाक को सबूत देने से कुछ नहीं होगा

पाकिस्तान भारत ही नहीं, अमेरिका सहित पूरी दुनिया की आंखों में धूल झोंकता आ रहा है।

पाक को सबूत देने से कुछ नहीं होगा
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पाकिस्तान से हम किस सभ्यतापूर्ण व्यवहार की बात कर रहे हैं? यह अपेक्षा ही क्यों कर रहे हैं कि वह भारत द्वारा सबूत दिए जाने पर अपने उन कायर जवानों के खिलाफ कार्रवाई करेगा, जिन्होंने पुंछ सेक्टर में दो भारतीय जवानों के सिर काटने की घिनौनी हरकत को अंजाम दिया है।

क्या अब से पहले सबूत सौंपे जाने पर पाकिस्तान ने किसी भी तरह की कार्रवाई की है? किन-किन मामलों में उसे डोजियर और सबूत नहीं सौंपे गए? चाहे संसद पर हमला हो। मुंबई पर नवंबर 2008 का हमला हो या भारत के अलग-अलग हिस्सों में भिन्न समय पर विस्फोट और आतंकी हमले हुए हों,

भारत ने हर बार अकाट्य सबूत सौंपे हैं, जिनसे साबित होता है कि वे सारे हमले सीमा पार से संचालित और वित्त पोषित थे। लखवी हों, हाफिज सईद, मसूद अजहर या दाऊद। भारत के ये गुनहगार कहां छिपे हुए हैं। उन्हें कौन पनाह दिए हुए है। अभी कुछ दिन पहले ही खबर आई है कि ओसामा बिन लादेन के दाहिने हाथ कहे जाने वाले अल जवाहिरी को पाकिस्तानी सेना और आईएसआई की निगरानी में कराची में कहीं छिपाकर रखा गया है।

पाकिस्तान भारत ही नहीं, अमेरिका सहित पूरी दुनिया की आंखों में धूल झोंकता आ रहा है। दस साल तक अमेरिका अलकायदा के सरगना और खूंखार आतंकी ओसामा बिन लादेन को तलाशता रहा, परंतु अंत में वह कहां मिला? पाक की एक सैन्य छावनी अबोटाबाद में, जहां वह अपनी कई बीवियों और बच्चों के साथ रह रहा था।

अमेरिकी सेना ने उसे पाक में घुसकर मारा था।दुनिया के किसी भी कोने में आतंकी वारदात हो, उसके तार किसी न किसी रूप में पाकिस्तान से जाकर क्यों जुड़ जाते हैं? अभी दो दिन पहले अमेरिका के एक बड़े अधिकारी का बयान आया है कि पाकिस्तान भारत और अफगानिस्तान में छद्म युद्ध छेड़े हुए है। उसे यह बंद करना होगा।

प्रश्न यह है कि यदि अमेरिका यह जानता है कि ऐसा हो रहा है तो वह पाकिस्तान को दी जा रही लाखों डॉलर की सहायता बंद क्यों नहीं कर रहा? चीन उसका सबसे बड़ा सहयोगी क्यों बना हुआ है? भारत जब मसूद अजहर और दूसरे आतंकियों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई की मांग करता है तो चीन सुरक्षा परिषद और संयुक्त राष्ट्र संघ में उनकी ढाल बनकर क्यों खड़ा हो जाता है।

पुंछ में पाकिस्तानी रेंजरों की मौजूदगी में दो भारतीय सैनिकों के साथ जो घटना हुई, वह खून खौला देने वाली है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। तीन बार पहले भी इसी प्रकार की दरिन्दगी भारतीय जवानों के साथ हो चुकी है। करगिल के समय कैप्टन सौरभ कालिया के शव के साथ ऐसा ही दुर्व्यवहार किया गया था।

पाक उच्चायुक्त अब्दुल बासित को भी पहली बार विदेश मंत्रालय में तलब करके कार्रवाई की मांग नहीं की गई है। अब तो बासित को भी याद नहीं होगा कि वह कितनी बार तलब किए जा चुके हैं, परंतु पाक की बेशर्मी देखिए कि वह अपना रवैया बदलने को तैयार नहीं है। पूरे देश में इस घटना से गुस्सा है।

लगभग वैसा ही आक्रोश देखने को मिल रहा है, जैसा सितंबर के दूसरे पखवाड़े में उरी सेक्टर में उन्नीस सैनिकों के मारे जाने के बाद हुआ था। तब केंद्र की मोदी सरकार को सीमा पार सर्जिकल स्ट्राइक कर देश को आश्वस्त करना पड़ा था कि सरकार चुप नहीं बैठेगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस तरह की हरकतों पर शून्य बर्दाश्त की बात पहले ही कह चुके हैं। उनकी अध्यक्षता में सुरक्षा मामलों की समिति की बैठक में आगे की रणनीति तय की गई है। देखना यही है कि बार-बार उकसावे और असभ्यता पर उतारू पाकिस्तान को किस भाषा में जवाब देने का फैसला सरकार करती है।

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