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कूटनीति: धारा 370 पर पाकिस्तान को अब तक का सबसे बड़ा झटका

पाकिस्तान को सबसे बड़ा झटका रूस की सरकार द्वारा दिया गया, जिसने कि भारत द्वारा संविधान की धारा 370 को समाप्त करने भारत के कदम को अपना प्रबल समर्थन प्रदान किया और कहा कि आर्टिकल 370 को निरस्त किया जाना, वस्तुतः भारत का अंदरूनी मामला है और भारत के इस कदम पर किसी बाहरी देश को प्रश्न खड़ा करने का कोई हक ही नहीं है। इस मामले में विस्तार से अपनी बात रख रहे हैं वरिष्ठ लेखक प्रभात कुमार रॉय...

कूटनीति: धारा 370 पर पाकिस्तान को अब तक का सबसे बड़ा झटका
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Pakistan China Loss Credibility On Article 370 In United Nations

संयुक्त राष्ट्र में विश्व के 193 देशों द्वारा बाकायदा अपनी उपस्थिति दर्ज कराई गई है। शुक्रवार 16 अगस्त को पाकिस्तान की गुजारिश पर चीन द्वारा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की क्लोज डोर मीटिंग आयोजित की गई। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य हैं- अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन और दस अस्थायी सदस्य हैं- जर्मनी, पोलैंड और दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया, बेल्जियम, कोटे डि आइवर, डोमिनिक रिपब्लिक, इक्वेटोरियल गिनी, कुवैत, पेरू।

पाकिस्तान का दुर्भाग्य देखिये यूएन सुरक्षा परिषद की मीटिंग की कश्मीर विवाद पर पाकिस्तान के पक्ष में चीन के अतिरिक्त किसी अन्य राष्ट्र द्वारा अपनी आवाज बुलंद नहीं की गई। वैश्विक जेहादी आतंकवाद को प्रश्रय और परिपोषण प्रदान करने के कारण पाकिस्तान विश्व पटल पर एकदम अलग-थलग पड़ गया है, फिर भी दुस्साहसी पाकिस्तान द्वारा यूएन सुरक्षा परिषद के समक्ष खड़े होने की हिमाकत की गई।

रूस ने धारा 370 पर भारत का समर्थन करते हुए पाकिस्तान को सबसे बड़ा झटका दिया है। रूस के बाद, फ्रांस द्वारा भारतीय पक्ष का जोरदार समर्थन किया गया। अमेरिका और ब्रिटेन भी विश्व से सर्वोच्च कूटनीतिक मंच पर भारतीय पक्ष के साथ खड़े दिखाई दिए। यूएन में चीन के राजदूत झांग जुन ने कहा कि कश्मीर विवाद पर चीन गहरा सरोकार रखता है और चीन सरकार ने कश्मीर की वर्तमान स्थिति को चिंताजनक करार दिया है।

पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी द्वारा यह कथन सत्य सिद्ध हुआ कि यूएन सिक्योरिटी काउंसिल कश्मीर विवाद पर पाकिस्तान की दलीलों पर कदापि अपनी तव्वजो प्रदान नहीं करेगी। यूएन सुरक्षा परिषद में पाकिस्तान के पक्ष से यूएन में पाक राजदूत मलाही लोधी द्वारा पैरवी अंजाम दी गई। यूएन में भारत के राजदूत सैयद अकबरुद्दीन द्वारा भारतीय पक्ष पेश किया गया।

उल्लेखनीय है कि आजकल यूएन सुरक्षा परिषद का अध्यक्ष पद पोलैंड द्वारा संभाला जा रहा है। यूएन सुरक्षा परिषद के पोशिल प्रेजिडेंट द्वारा भी कुछ इस तरह की बात कही गई कि दिल्ली और इस्लामाबाद को द्विपक्षीय वार्ता द्वारा कश्मीर समस्या का निदान निकालना चाहिए। उल्लेखनीय है कि 1948 में पाकिस्तान द्वारा कभी भी संयुक्त राष्ट्र सिक्योरिटी काउंसिल के प्रस्ताव का अनुपालन नहीं किया गया,

जिसके तहत यह कहा गया था, सबसे पहले पाकिस्तानी सेनाओं को पाक अधिकृत कश्मीर को तुरंत खाली किया जाना चाहिए और भारत को भी इसी तरह पेश आना चाहिए। समझ नहीं आता कि आखिर किस मुंह से पाकिस्तान यूएन सुरक्षा परिषद में कश्मीर विवाद को ले जाने के लिए इतना बेचैन हो उठा, पाकिस्तान की सरकार जानती है कि उसको चीन के अतिरिक्त किसी अन्य देश का समर्थन यूएन सुरक्षा परिषद में हासिल नहीं है।

यहां तक कि इस्लामिक देश भी पाकिस्तान उसके साथ नहीं खड़े हैं। अभी हाल ही में पहले संयुक्त अरब अमीरात और मालदीव द्वारा द्वारा कश्मीर समस्या पर भारतीय पक्ष का समर्थन किया गया और संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने को भारत का आंतरिक मामला करार दिया और कहा गया कि पाकिस्तान को दखलअंदाजी करने का कोई नैतिक और कानूनी अधिकार नहीं है।

यह बात स्पष्ट है की जम्मू-कश्मीर की जमीन पर पाकिस्तान विगत 30 वर्षों से एक खूंखार और बर्बर प्रॉक्सी वॉर का संचालन कर रहा है, ताकि बलपूर्वक जेहादी आतंकवाद के माध्यम से कश्मीर पर आधिपत्य स्थापित किया जा सके। पाकिस्तान को जेहादी आतंकवाद के संचालन के बाद भी जम्मू-कश्मीर में कोई कामयाबी हासिल हो नहीं पाई। पाक हुकूमत और उसकी फौज़ कश्मीर को हड़पने की खातिर आगामी दौर में भी अपनी जेहादी प्रॉक्सी वॉर को बाकायदा जारी रखेंगे।

भारत को बहुत सतर्कता के साथ पाकिस्तान के आक्रमणों और साजिशों से निपटना होगा। एक बात पाकिस्तान के हुक्मरानों को कभी समझ नहीं आई कि चार युद्धों में जबरदस्त पराजय के बाद भी पाकिस्तान आज भी युद्ध की भाषा में ही क्यों सोचता समझता है? भारत के विरुद्ध सीधे युद्ध करने की हिम्मत पाकिस्तान में कदापि नहीं है, इसलिए पाकिस्तान द्वारा अप्रत्यक्ष युद्ध का तौर तरीका अपनाया गया,

फिर भी कोई ठोस कामयाबी पाकिस्तान को हासिल हो नहीं पाई और भविष्य में भी कामयाबी प्राप्त होने की कोई संभावना नहीं। घनघोर वित्तीय संकट में फंसा हुआ पाकिस्तान आंतरिक विद्रोहों से जूझ रहा है, किंतु न तो बलूचिस्तान में न ही अन्य किसी इलाके में पाकिस्तान को कोई निर्णायक सफलता हासिल हो पाई है। अतः पाकिस्तान कश्मीर विवाद को अत्याधिक महत्व प्रदान करते हुए अपने विखंडित हो रहे अस्तित्व को बचाने के प्रयास में लगा हुआ है।

भारत के लिए भी कश्मीर वस्तुतः अस्मिता और अखंडता का ज्वलंत प्रश्न है। भारत किसी भी कीमत पर कश्मीर घाटी को पाकिस्तान के हाथों में जाने नहीं दे सकता और साथ ही साथ संपूर्ण कश्मीर को भारत का अभिन्न हिस्सा बनाने का काम अभी अधूरा पड़ा हुआ है, जिसे भारत को अपने ही दमखम पर एक न एक दिन पूरा जरूर करना होगा। तभी कहीं जाकर जम्मू-कश्मीर पर संसद द्वारा एकमत से लिया गया संकल्प साकार हो सकेगा।

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