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डाॅ. ए.के. अरुण का लेख : वेंटिलेटर पर ऑक्सीजन आपूर्ति तंत्र

जब देश में ऑक्सीजन की कमी ही नहीं है तो अस्पतालों में मरीज ऑक्सीजन के अभाव में क्यों दम तोड़ रहे हैं? अस्पतालों में ऑक्सीजन ट्रांसपोर्ट करने के लिए जो क्रायोजनिक टैंकर चाहिए वह उपलब्ध नहीं हैं, तो आखिर क्यों उपलब्ध नहीं हैं? क्योंकि शायद हमारी सरकारों की प्राथमिकता सूची में आकस्मिक आपदा, स्वास्थ्य, दवा का स्थान निर्धारित नहीं है।

डाॅ. ए.के. अरुण का लेख : वेंटिलेटर पर ऑक्सीजन आपूर्ति तंत्र
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डाॅ. ए.के. अरुण 

डाॅ. ए.के. अरुण

ऑक्सीजन का महत्व भला कौन नहीं जानता होगा। अभी कुछ ही महीने पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी डेनमार्क की विंड टरबाइन बनाने वाली एक कंपनी वेस्टाज के सीईओ हेनरिक एंडरसन को वीडियो कान्फ्रेंस पर विंड एनर्जी से संबंधित जो सुझाव दे रहे थे उसमें उन्होंने आइडिया दिया था कि नमी वाली हवा से पानी और ऑक्सीजन को अलग कर एक साथ कई लाभ लिए जा सकते हैं? उनका यह आइडिया कितना ऑक्सीजन उत्पादित कर पाया नहीं मालूम, लेकिन हकीकत यह है कि आवश्यकता से अधिक ऑक्सीजन उत्पादित करने वाले देश भारत में ऑक्सीजन के अभाव में मरीज दम तोड़ रहे हैं।

देश बीते एक वर्ष से ज्यादा समय से कोरोना वायरस संक्रमण को झेल रहा है, लेकिन इस भीषण आपदा में समुचित प्रबंधन की बात तो दूर सरकार आपदा में अवसर का लाभ लेने का जुमला ही बांटती नजर आई। चन्द बड़े औद्योगिक घरानों ने यह लाभ उठाया भी, लेकिन देश की जनता स्वास्थ्य और आर्थिक मोर्चे पर जूझती, लुटती या बर्बाद होती देखी गई। हमारे देश में ऑक्सीजन का रोजाना उत्पादन उसकी मांग से कहीं ज्यादा है। कोई 10 दिन पहले के आंकड़े के अनुसार देश में ऑक्सीजन उत्पादन की क्षमता 7287 मीट्रिक टन और खपत 3842 मीट्रिक टन बताई गई । अभी कोरोना के कारण विशेष स्थिति में ऑक्सीजन की मांग 5000 मीट्रिक टन हो गई है, फिर भी हमारे पास 2200 मीट्रिक टन ऑक्सीजन सरप्लस है। फिर सवाल है कि देश में ऑक्सीजनन की किल्लत क्यों है और इसकी कमी से मौतें क्यों हो रही हैं? कोरोना काल से पहले देश में लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन (एलएमओ) की मांग 700 मीट्रिक प्रतिदन थी जो 2020 में कोरोना काल में बढ़कर 2800 मीट्रिक टन हो गई थी और अब यह 5000 मीट्रिक टन हो गई है। जब देश में ऑक्सीजन की कमी ही नहीं है तो अस्पतालों में मरीज ऑक्सीजन के अभाव में क्यों दम तोड़ रहे हैं? बताया जा रहा है कि अचानक बढ़ी मांग की वजह से देश के सभी अस्पतालों में ऑक्सीजन ट्रांसपोर्ट करने के लिए जो क्रायोजनिक टैंकर चाहिए वह उपलब्ध नहीं हैं। क्यों उपलब्ध नहीं हैं? क्योंकि शायद हमारी सरकारों की प्राथमिकता सूची में आकस्मिक आपदा, स्वास्थ्य, दवा का स्थान निर्धारित नहीं है।

सवाल है कि यदि देश में ऑक्सीजन का उत्पादन सरप्लस है तो फिर हाहाकार की यह स्थिति क्यों? दरअसल मामला प्रशासनिक व्यवस्था का है। यदि प्रबंधन सही होता तो ऑक्सीजन की किल्लत नहीं होती। उदाहरण के लिए केरल राज्य को देखें। वहां अभी भी जब कोविड-19 से स्थिति बदतर है मगर ऑक्सीजन की स्थिति बहुत अच्छी है, केरल सरप्लस ऑक्सीजन पड़ोसी तमिलनाडु, कनार्टक, गोवा आदि को दे रहा है। केरल में ऑक्सीजन के बेहतर प्रबंधन की वजह से आज वह ऑक्सीजन संकट से बचा हुआ है। हालांकि हमारे देश में पेट्रोलियम एंड एक्सप्लोसिव सेफ्टी ऑर्गेनाइजेशन (पेसो) 125 वर्ष पुराना संगठन है जो देश में मेडिकल ऑक्सीजन की आपूर्ति की निगरानी करता है। पेसो की केरल शाखा ने मार्च 2020 से ही उद्योगों को दी जाने वाली ऑक्सीजन पर नियंत्रण किया और केरल के लिए 1325 मीट्रिक टन ऑक्सीजन के स्टोर को सुनिश्चित कर दिया। यह काम बड़ी आबादी वाले राज्यों को भी महीनों पहले कर लेना था मगर ज्यादातर मुख्यमंत्रियों को चुनावी रैली से फुर्सत मिलती तब न! खैर भारत में 'प्यास लगने पर कुआं खोदने' की कहावत आम है। यहां के राजनीतिक दलों व नेताओं की प्राथमिकता में जनता की जान और उससे जुड़े मुद्दे कभी प्राथमिकता में रहे ही कहां?देश में दवा, ऑक्सीजन व चिकित्सा के अभाव में मरते लोगों की परवाह वास्तव में किसी भी राजनीति दल और किसी सरकार को नहीं रही है। यदि होती तो ऑक्सीजन की कमी से मर रहे लोगों की भयानक स्थिति में नेता आरोप-प्रत्यारोप की बजाय तुरन्त निर्णय लेते नजर आते। विगत एक वर्ष में सरकारों की प्राथमिकताएं देखें। महंगे जहाजों की खरीद, महंगे स्टेडियम का निर्माण, कुंभ का आयोजन, गोबर पर अनुसंधान के लिए खर्च आदि। कोरोना काल में जहां आम नागरिकों ने अपने धन से राहत सामग्री जोड़कर देशवासियों की मदद की वहीं सरकार ने कोरोना राहत के नाम पर घोषित 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज को न जाने कहां खर्च किए यह जनता को पता ही नहीं। दिल्ली समेत देश के प्रमुख के अस्पतालों में ऑक्सीजन की स्थिति बेहद नाजुक है। दिल्ली के एक जाने माने कैंसर अस्पताल के प्रबन्धक ने बताया कि उनके अस्पताल के लिए दिल्ली सरकार के 7 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की आपूर्ति आदेश के बावजूद उन्हें नहीं मिल रही है। अस्पताल के सभी 250 गम्भीर रोगी जो ऑक्सीजन पर हैं उनकी जान खतरे में है।

ऑक्सीजन किल्लत की यह घटना अभूतपूर्व है। लोगों का सब्र जवाब दे रहा है। लोग बेहाल हैं। अस्पतालों में मौत का आंकड़ा नित डाराता है। ऑक्सीजन आपूर्ति की यह स्थिति सरकार के आपातकाल प्रबन्धन की हकीकत बताने के लिए पर्याप्त है।

बीते दिन जब पीएम ने विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों से ऑक्सीजन आपूर्ति पर बात की तब दिल्ली के मुख्यमंत्री की कातरता यह जाहिर कर रही थी कि एक प्रदेश का मुखिया होने के बावजूद वे असहाय हैं। दिल्ली में अॉक्सीजन बनाने का कोई प्लांट न होने की वजह से दिल्ली को दूसरे राज्यों से आपूर्ति पर ही निर्भर रहना पड़ता है। हालात गम्भीर हैं और ऑक्सीजन पर देश में सरकारों के बीच हो रही सियासत शर्मसार करने वाली है। पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव, राजनीतिक दलों का प्रचार करना कोरोना की तीव्रता को न्योता देने जैसा है। कम से कम केंद्रीय चुनाव आयोग को अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए था। एक राज्य में आठ चरणों में चुनाव कराने के चुनाव आयोग के फैसले उसको ही कटघरे में खड़ा करते हैं। सरकारों की प्राथमिकता में जन स्वास्थ्य नहीं है, शायद इसीलिए लोग इलाज, ऑक्सीजन और दवा के अभाव में दम तोड़ रहे हैं। देश के नागरिक भी अपनी दशा के लिए कम जिम्मेदार नहीं है, शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, बिजली, सड़क, रोजगार के मुद्दों पर वोटिंग के बजाय धर्म, जाति, क्षेत्र आदि भावनात्मक मसलों पर वोटिंग करते हैं। समझ में नहीं आता कि इस भीषण संकट के दौर में आम आदमी करे तो क्या करे।

(लेखक जन स्वास्थ्य वैज्ञानिक एवं राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त होमियोपैथिक चिकित्सक हैं। ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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