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बजट 2018ः एक प्रतिशत अमीरों के पास देश का 73 प्रतिशत हिस्सा, ऑक्सफेम की रिपोर्ट से हुआ खुलासा

इस सर्वेक्षण के मुताबिक देश की 67 करोड़ आबादी की संपत्ति में महज एक प्रतिशत की वृद्धि हुई है। हालांकि वैश्विक स्तर पर यह स्थिति और भी चिंताजनक है।

बजट 2018ः एक प्रतिशत अमीरों के पास देश का 73 प्रतिशत हिस्सा, ऑक्सफेम की रिपोर्ट से हुआ खुलासा
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ऑक्सफेम के ताजे सर्वेक्षण के मुताबिक पिछले साल भारत में कुल संपत्ति सृजन का 73 प्रतिशत हिस्सा केवल 1 प्रतिशत अमीर लोगों के पास है। इस सर्वेक्षण के मुताबिक देश की 67 करोड़ आबादी की संपत्ति में महज एक प्रतिशत की वृद्धि हुई है। हालांकि वैश्विक स्तर पर यह स्थिति और भी चिंताजनक है।

पिछले साल दुनियाभर में सृजित 82 प्रतिशत संपत्ति एक प्रतिशत लोगों के पास सीमित रही है, जबकि 3.7 अरब लोगों की संपत्ति में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई, जो गरीब आबादी का आधा हिस्सा है। उल्लेखनीय है कि ऑक्सफेम के वार्षिक सर्वेक्षण की दुनिया में बहुत ही ज्यादा पूछ-परख है और विश्व आर्थिक मंच की वार्षिक बैठक में इस पर विस्तार से चर्चा की जाती है।
पिछले साल सर्वेक्षण में बताया गया था कि भारत के एक प्रतिशत अमीर लोगों के पास देश की कुल संपत्ति का 58 प्रतिशत हिस्सा है, जो करीब 50 प्रतिशत के वैश्विक आंकड़े से भी अधिक है। इस साल के सर्वेक्षण के मुताबिक वर्ष 2017 के दौरान देश के एक प्रतिशत अमीरों की संपत्ति बढ़कर 20.9 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गई, जो 2017-18 में केंद्र सरकार के कुल बजट के बराबर रकम है।
ऑक्सफेम ने कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था अमीरों को और ज्यादा संपत्ति जुटाने में सक्षम बना रही है, जबकि करोड़ों लोग दो वक्त की रोटी का इंतजाम नहीं कर पा रहे हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पिछले साल अरबपति बनने की तादाद में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई और यह दर प्रत्येक दो दिन में एक अरबपति बनने की है। वर्ष 2010 के बाद से अरबपतियों की संपत्ति में औसतन 13 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि हुई, जो सामान्य कामगारों के वेतन की तुलना में छह गुना ज्यादा है और इसमें औसतन दो प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि हुई।
रिपोर्ट पर विश्वास किया जाए तो भारत में ग्रामीण इलाके के एक न्यूनतम वेतन पाने वाले कामगार को देश के एक प्रमुख कपड़ा कंपनी में शीर्ष अधिकारी की एक साल की कमाई जितनी रकम जुटाने में 941 वर्ष लगेंगे, जबकि अमेरिका में एक साधारण कामगार पूरे साल में जितनी कमाई करता है, उससे थोड़ा ज्यादा कमाई किसी कंपनी का सीईओ एक दिन में कर लेता है।
इस सर्वेक्षण में 10 देशों के 70,000 लोगों को शामिल किया गया है। दावोस में डब्ल्यूईएफ की बैठक में शामिल हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ऑक्सफेम इंडिया ने आग्रह किया कि भारत सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि देश की अर्थव्यवस्था में सभी लोगों का विकास हो और सरकार श्रम आधारित क्षेत्रों को प्रोत्साहित कर समावेशी वृद्धि को बढ़ावा देने, कृषि में निवेश करने और सामाजिक योजनाओं का प्रभावी तरीके से क्रियान्वयन करने के लिए प्रयास करे।
ऑक्सफैम की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2015 से विश्व के एक प्रतिशत अमीरों के पास दुनिया के बाकी लाेगों से अधिक संपत्ति है। रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया की आधी गरीब आबादी की संपत्ति पहले से कम हुई है। चीन, इंडोनेशिया, लाओस, भारत, बांग्लादेश और श्रीलंका में 10 प्रतिशत अमीरों की आय में 15 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज हुई है, जबकि गरीबों की 10 प्रतिशत आबादी की आय में 15 प्रतिशत से अधिक की गिरावट देखी गई है।

पिछले साल बने 17 नए अरबपति

रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में पिछले साल 17 नए अरबपति बने, जिससे अरबपतियों की संख्या बढ़कर 101 हो गई है। वर्ष 2017 में भारतीय अमीरों की संपत्ति 4.89 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 20.7 लाख करोड़ रुपये हो गई है, जो कई राज्यों के शिक्षा और स्वास्थ्य बजट का 85 प्रतिशत हिस्सा है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि देश की 10 प्रतिशत आबादी के पास 73 प्रतिशत संपत्ति है, जबकि 37 प्रतिशत भारतीय अरबपतियों को विरासत में संपत्ति मिली है।

टॉप पर मुकेश अंबानी

मौजूदा समय में देश की कुल संपत्ति लगभग 3100 अरब डॉलर है, जिसमें 19.3 अरब डॉलर की संपत्ति के साथ मुकेश अंबानी शीर्ष पर हैं, जबकि दिलीप सांघवी के पास 16.7 अरब डॉलर और अजीम प्रेमजी के पास 15 अरब डॉलर की संपत्ति है। इसी तरह विश्व की कुल संपत्ति 2.56 लाख अरब डॉलर है, जिसमें से लगभग 6,500 अरब डॉलर संपत्ति पर अरबपतियों का आधिपत्य है। 75 अरब डॉलर की संपत्ति के साथ बिल गेट्स शीर्ष पर हैं, जबकि 67 अरब डॉलर की संपत्ति के साथ एमैनसियो ऑर्टेगा दूसरे और 60.8 अरब डॉलर की संपत्ति के साथ वारेन बफेट तीसरे स्थान पर हैं।

कुपोषण से प्रभावित राज्य

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ज्यांद्रेज की मानें तो देश के कुछ राज्य मसलन बिहार, झारखंड, ओडिशा, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश आदि कुपोषण की समस्या से बुरी तरह से त्रस्त हैं। गरीबी की वजह से इन राज्यों में कुपोषण के मामलों में लगातार इजाफा हो रहा है। ग्रामीण भारत में लगभग 83.3 करोड़ लोग निवास करते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के रूप में कृषि को छोड़कर कोई दूसरा विकल्प नहीं है। कुटीर उद्योग के अभाव में लोगों की निर्भरता सिर्फ कृषि पर है, जिसके कारण कृषि क्षेत्र में छद्म रोजगार की स्थिति बनी हुई है। खेती में दो वक्त रोटी का इंतजाम करना आज मुश्किल हो गया है।

रोजगार न मिलने से युवा भ्रमित

रोजगार के अभाव में युवा दिग्भ्रमित होकर गलत रास्ता अख्तियार करते हैं या फिर कर्ज एवं भुखमरी की वजह से आत्महत्या कर लेते हैं। लगभग एक सौ तीस करोड़ आबादी वाले इस देश में अधिकांश लोगों के घर का सपना पूरा नहीं हो पा रहा है। हालांकि मामले में सरकार संवेदनशील है, इसलिए आधारभूत संरचना को मजबूत करने के लिए रोजगार में वृद्धि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मजबूती, खेती-किसानी की बेहतरी आदि के लिए सरकार ने ‘मेक इन इंडिया' की संकल्पना की शुरुआत की है।

बैंकों की मदद से अर्थव्यवस्था में सुधार

इस दिशा में स्वयं सहायता समहू, वित्तीय संस्थान आदि की मदद से मेक इन इंडिया के कार्यों को गति दी जा रही है। वैसे सरकार इस संदर्भ में अनेक योजनाएं जैसे पीएमईजीपीए एसजीएसवाई आदि चला रही है जिससे इस तरह के कुटीर उद्योगों को बढ़ावा मिल रहा है, लेकिन इन प्रयासों को तब तक पर्याप्त नहीं माना जा सकता जब तक स्वदेशी सामानों के समुचित विपणन की व्यवस्था न की जाए। लोगों को आत्मनिर्भर एवं देश में समावेशी विकास को गति देने के लिए ही महात्मा गांधी ने सबसे पहले 1918 में हथकरघा की मदद से घर-घर में हाथों से कपड़ा बनाने का आह्वान किया था। मजबूत अर्थव्यवस्था की रीढ़ बैंकिंग क्षेत्र को माना गया है।

निचले स्तर तक भ्रष्टाचार

बैंकों की मदद से ही अर्थव्यवस्था को संतुलित रखा जा सकता है। आज भ्रष्टाचार की जड़ समाज के निचले स्तर तक पेवस्त हो चुकी है। सरकारी महकमों में चपरासी लेकर बड़े साहब तक रिश्वत लेना अपना अधिकार समझते हैं। निजी क्षेत्र के मानव संसाधन भी मामले में पीछे नहीं हैं। मजदूर, सब्जीविक्रेता आदि भी अपने हिस्से की रोटी से अधिक पाने की कोशिश गलत रास्ता अख्तियार करके कर रहे हैं।

वैश्विक स्तर स्थिति चिंताजनक

जाहिर है, जब तक मौजूदा स्थिति में सुधार नहीं होता है, तब तक कुछ धनवानों के हाथों में संकेंद्रित संपत्ति का वितरण आम लोगों के बीच संभव नहीं है। आक्सफेम के ताजा सर्वेक्षण के मुताबिक पिछले साल भारत में कुल संपत्ति सृजन का 73 प्रतिशत हिस्सा केवल 1 प्रतिशत अमीर लोगों के पास है। इस सर्वेक्षण के मुताबिक देश की 67 करोड़ आबादी की संपत्ति में महज एक प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वैश्विक स्तर पर यह स्थिति चिंताजनक है। पिछले साल दुनियाभर में सृजित 82 प्रतिशत संपत्ति एक प्रतिशत लोगों के पास सीमित रही है, जबकि 3.7 अरब लोगों की संपत्ति में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई, जो गरीब आबादी का आधा हिस्सा है।

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