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डॉ. मोनिका शर्मा का लेख : आम महिलाएं बन रहीं खास

महिला प्रत्याशियों का हर वर्ग से आगे आना और जीत हासिल करना सुखद है क्योंकि हमारे यहां आज भी आधी आबादी का सियासी प्रतिनिधित्व कम ही है । इसके पीछे सामाजिक, पारिवारिक और महिलाओं से जुड़ी सोच जैसे कई कारण हैं। संयुक्त राष्ट्र महिला शाखा के एक अध्ययन के मुताबिक भारत में 90 प्रतिशत महिलाएं चाहकर भी राजनीति में नहीं आतीं, क्योंकि उन्हें शारीरिक और मानसिक हिंसा का डर होता है। कुछ समय पहले आई वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की महिला-पुरुष समानता से जुड़ी 156 देशों की रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में सबसे ज्यादा असमानता राजनीति के क्षेत्र में ही है।

डॉ. मोनिका शर्मा का लेख : आम महिलाएं बन रहीं खास
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डॉ. मोनिका शर्मा

डॉ. मोनिका शर्मा

हाल ही में देश के चार राज्यों पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और केंद्रशासित प्रदेश पुडुचेरी में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों में महिला शक्ति की प्रभावी दस्तक देखने को मिली है| पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की अगुआई कर रहीं ममता बैनर्जी खुद भले ही चुनाव हार गईं हैं पर उनकी पार्टी हैट्रिक लगा, लगातार तीसरी बार सत्ता में आई है। यही वजह है कि जीत हासिल करने वाली चुनावी रणनीति और जनमानस पर प्रभावी पकड़ रखने वाली ममता की पार्टी वापसी वाकई मायने रखती है| इतना ही नहीं टीएमसी प्रमुख ने इस बार महिला प्रत्याशियों पर ज्यादा भरोसा भी जताया था| कुल 291 सीटों में से ममता बनर्जी ने 50 महिला प्रत्याशियों को टिकट दिया था |

गौर करने वाली बात है कि इन विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस की मुखिया और भारतीय राजनीति का चर्चित चेहरा मानी जाने वाली ममता बैनर्जी के अलावा भी कई महिला प्रत्याशियों ने जीत हासिल की है| तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के नतीजों में बड़ा उलटफेर करते हुए कोयम्बटूर दक्षिण सीट पर बीजेपी की उम्मीदवार वनाति श्रीनिवासन ने मक्कलि नीधि मय्यम पार्टी के प्रमुख और चर्चित अभिनेता कमल हासन को पराजित किया है| पहली बार चुनावी मैदान में उतरे कमल हासन को शिकस्त देने वाली वनाति श्रीनिवासन की चर्चा अचानक सियासी दुनिया में एक चर्चित और मजबूत चेहरे के तौर पर होने लगी है| गौरतलब है कि वनाति श्रीनिवासन भाजपा की राष्ट्रीय महिला मोर्चा की अध्यक्ष हैं और यह सीट पहली बार भाजपा के खाते में आई और वनाति ने जीत दर्ज की।

बंगाल में बीजेपी की हार के बावजूद एक और महिला प्रत्याशी की जीत की खूब चर्चा हो रही है | धन बल का खेल कही जाने वाली भारतीय राजीनति में इस महिला उम्मीदवार की जीत भी कई मायनों में ऐतिहासिक मानी जा सकती है | बंगाल में बांकुड़ा क्षेत्र में सालतोरा विधानसभा सीट से बीजेपी उम्मीदवार चंदना बाउरी ने भी जीत हासिल की है | गौरतलब है कि चंदना एक दिहाड़ी मजदूर की पत्नी हैं | झोंपड़ी में रहती हैं और इनकी कुल जमा पूंजी मात्र 31985 रुपये है| सोशल मीडिया में चंदना बाउरी की जीत को बिना किसी राजनीतिक गठजोड़ के 'आम महिला' की जीत बताया जा रहा है | वहीं पहले से राज्य की राजनीति में दखल रखने वाली केरल की स्वास्थ्य मंत्री के के शैलजा ने भी मत्तानूर विधानसभा सीट से रिकॉर्ड तोड़ वोटों से जीत हासिल की है | जिसे अनुभव और उपलब्धि की बदौलत मिले जन-समर्थन से जोड़ा जा रहा है | ऐसे में महिला प्रत्याशियों का हर वर्ग से आगे आना और जीत हासिल करना सुखद है क्योंकि हमारे यहां आज भी आधी आबादी का सियासी प्रतिनिधित्व कम ही है | इसके पीछे सामाजिक, पारिवारिक और महिलाओं से जुड़ी सोच जैसे कई कारण हैं | संयुक्त राष्ट्र महिला शाखा के एक अध्ययन के मुताबिक भारत में 90 प्रतिशत महिलाएं चाहकर भी राजनीति में नहीं आतीं, क्योंकि उन्हें शारीरिक और मानसिक हिंसा का डर होता है। कुछ समय पहले आई वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की महिला-पुरुष समानता से जुड़ी 156 देशों की रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में सबसे ज्यादा असमानता राजनीति के क्षेत्र में ही है| देश में राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 22 फीसदी है | इतना ही नहीं राजनीतिक पटल पर कामयाब रहीं अधिकाँश महिला राजनेताओं का ताल्लुक भी किसी न किसी सियासी परिवार से ही रहा है| ऐसे में आम चेहरों का आगे आना वाकई बदलाव की बानगी है |

दरअसल, आम चुनाव हों, प्रादेशिक स्तर की सियासी जंग या पंचायत चुनाव | भारत के राजनीतिक जगत में महिला मतदाताओं के साथ ही महिला प्रत्याशियों की भूमिका भी अहम्ा हो चली है| इतना ही नहीं जीतकर आने वाली महिला राजनेता प्रभावी ढंग काम कर अपनी उपस्थिति भी दर्ज करवा रही हैं | ध्यान रहे कि अपने प्रतिद्वंदी के मुकाबले रिकॉर्ड मतों से जीतने वाली के के शैलजा को कोविड-19 महामारी से निपटने में अहम योगदान के लिए संयुक्त राष्ट्र भी सम्मानित कर चुका है | इतना ही नहीं बतौर केरल की स्वास्थ्य मंत्री, कोविड संकट के समय प्रबंधन को लेकर देश-विदेश में उनकी काफी सराहना हुई थी |

व्यापक रूप से देखा जाए तो महिलाओं की यह भागीदारी कई मायने में आधी आबादी की शिक्षा, सजगता और सामाजिक भूमिका में आ रहे बदलाव की भी द्योतक है| बंगाल में गरीब परिवार से आने वाली महिला विधायक चंदना अपने पति से ज्यादा पढ़ी हुई हैं उनके पति सिर्फ आठवीं पास हैं जबकि चंदना खुद बारहवीं वीं पास हैं| शिक्षा के साथ ही खुद महिलाओं का दृढ़ निश्चय भी सियासी जगत में उनकी जमीन पुख्ता कर रहा है| गौरतलब है कि वनाति श्रीनिवासन को चुनाव मैदान में स्थानीय नेताओं का सहयोग न मिलने की चर्चा भी सामने आई थी। इस पर बीजेपी नेत्री का कहना था कि महिला नेताओं को हर जगह समस्या का सामना करना पड़ता है लेकिन मेरा ध्यान जनता की सेवा पर है। ऐसे में चुनावी मैदान में उतरीं सभी पार्टियों के महिला प्रत्याशियों की जीत कई मायने में अहम्ा हो जाती है| पार्टी की अगुआ होने के नाते ममता बैनर्जी की रणनीति हो या किसी गरीब महिला प्रत्याशी का चुनाव जीतना | इस संकटकाल में एक राज्य की स्वास्थ्य मंत्री का फिर से जन समर्थन हासिल करना हो या कमल हासन जैसे जाने-माने चेहरे को शिकस्त देने की बात | महिला उम्मीदवारों की जीत का हर उदारहण एक नए बदलाव की आहट सा प्रतीत होता है| राजनीति में नई पटकथा लिख रही है।

जैसा कि हालिया बरसों में देखने आया है इन चुनावों में भी महिला मतदाताओं ने जमकर मतदान किया है| यही वजह है कि सभी दल महिला वोटर्स को लुभाने की ख़ास कोशिश भी करते नजर आये| पश्चिम बंगाल में महिला वोटर्स का समर्थन पाने के लिए अपनी बेटी के नारे की बात की तो बीजेपी ने भी महिला सुरक्षा के मुद्दे को उठाया| यहां 7.18 करोड़ मतदाताओं में से 3.15 करोड़ महिला मतदाता थीं । यकीनन वोटर्स की इतनी बड़ी संख्या हर पार्टी के लिए अहम्ा रही | ध्यान रहे कि महिला वोटर्स ने बिहार विधानसभा चुनाव में भी नतीजों को प्रभावित किया था| ऐसे में मतदाता हो या प्रत्याशी, राजनीति में हर तबके, हर क्षेत्र की महिलाओं का दखल बढ़ना आवश्यक भी है| इस भागीदारी से आने वाली जागरूकता और मुखरता आधी आबादी से जुड़े दूसरे मोर्चों पर भी असमानता की खाई को पाटने में मददगार साबित होगी।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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