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प्रभात झा का लेख: जागा राष्ट्रीय कर्तव्य

हमारा जीवन जन्म से मरण तक कर्तव्यों से जुड़ा हुआ है। जो जीवन कर्तव्य की भूमिका से परिपूर्ण होता है, उसके जीवन को राष्ट्र कभी नहीं भूलता। आज क्या हम उन्हें भूल सकते हैं जो कोरोना संकट की लड़ाई में अपने जीवन को जोखिम में डाले हुए हैं। हम कैसे भूल सकते हैं चिकित्सकों, प्रशासकों, राजस्वकर्मियों, पुलिस बलों, स्वास्थ्यकर्मियों, सफाई कर्मचारियों। सभी राष्ट्र कर्तव्य का पालन कर रहे हैं। उनके कर्तव्य समर्पण से ही प्रधानमंत्री का आत्मविश्वास जगा है।

प्रभात झा का लेख: जागा राष्ट्रीय कर्तव्य

प्रभात झा

संविधान सभा में अपना अंतिम भाषण देते हुए डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा कि संविधान की सफलता जनता और राजनीतिक दलों के आचरण पर निर्भर करेगी। आज यह बात सत्य साबित हो रही है। संविधान नागरिकों के अधिकार और कर्तव्य का सुरक्षा कवच है। जहां संविधान अधिकारों की रक्षा करने का सामर्थ्य रखता है, वहीं कर्तव्य के प्रति जागृत करता है। संविधान से परे कोई नहीं। संविधान से ऊपर भी कोई नहीं। हम सभी संविधान से बंधे हुए हैं। विधायिका हो, कार्यपालिका हो या न्यायपालिका। डॉ. अंबेडकर ने संविधान सभा के एक भाषण में संवैधानिक नैतिकता के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा था कि संविधान को सर्वोच्च सम्मान देना और वैचारिक मतभेदों से ऊपर उठकर सम्मत प्रक्रियाओं का पालन करना संवैधानिक नैतिकता का सारतत्त्व है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी केंद्र की सत्ता में दोबारा आने पर जब सांसदों को संबोधित कर रहे थे तो उन्होंने अपने संबोधन की दूसरी तरफ भारत के संविधान की प्रति रखी थी। उस भाषण में अंत में उन्होंने कहा था, सबका साथ और सबका विकास के साथ-साथ हमें सबका विश्वास भी जीतना है। मतलब साफ था, भारत के संविधान से बंधे एक-एक नागरिक का विश्वास जीतना उनका राष्ट्रीय कर्तव्य है। उस भाषण के बाद उन्होंने संविधान की प्रति के समक्ष हाथ जोड़कर संविधान को प्रणाम किया और देश को संदेश दिया कि संविधान भारत की आत्मा है। संविधान नागरिकों में सुरक्षा की गारंटी है। हमारे संविधान में नागरिकों के मौलिक अधिकार के रूप में सुरक्षा की जो गारंटी प्रदान की गई है उसमें छह अधिकार शामिल हैं, समता या समानता का अधिकार (अनुच्छेद14-18),स्वतंत्रता का अधिकार(अनुच्छेद 19-22), शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23-24), धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25-28), संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29-30), और संवैधानिक अधिकार (अनुच्छेद 32)। समता या समानता के अधिकार के तहत विधि के समक्ष समानता, धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेद-भाव का निषेध, अवसर की समानता, अस्पृश्यता का उन्मूलन और उपाधियों का अंत के रूप में नागरिक को सुरक्षा प्रदान की जाती है। वहीं संविधान छह प्रकार की स्वतंत्रता भी नागरिकों को प्रदान करता है, जिसमें बोलने की स्वतंत्रता और देश के किसी भी क्षेत्र में निवास करने और जीवन-निर्वाह की स्वतंत्रता मुख्यतया: शामिल हैं।

उन सभी अधिकारों की रक्षा करते हुए वैश्विक महामारी कोरोना के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस धर्म और साहस का परिचय दिया है, उससे प्रत्येक नागरिक का आत्मविश्वास जगा है। जन-जन के मन में राष्ट्र के प्रति समर्पण का भाव जगा है। लोगों ने भूखे रहकर भी इस वैश्विक संकट में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर अटूट विश्वास जताया है। आज किसी पर भी दोषारोपण का समय नहीं है। न यह समय श्रेय और होड़ लेने की है। पर इस बात से कैसे इनकार किया जा सकता है कि जो अच्छा कर रहे हैं उनकी प्रशंसा नहीं होनी चाहिए। बुरा करने पर बुराई करने का अधिकार है, तो अच्छा करने पर प्रशंसा करने का भी अधिकार होना चाहिए। यह समय गुमराह करने का नहीं, सभी को एक राह पर चलने का है।

यहां एक प्रसंग याद आता है एक पति- पत्नी के दो पुत्रियां और दो पुत्र थे। परिवार में पिता की आमदनी बहुत कम थी। रात को सोते समय पति-पत्नी अपनी पुत्री जो बड़ी हो रही थी, उसके विवाह के विचार में डूबे रहते थे। एक रात यह चर्चा बड़ी बिटिया ने सुन लिया और सोच में पड़ गई। मां से कहा, मेरे विवाह की चिंता मत करो। मेरे विवाह न करने मात्र से मेरे भाई-बहन पढ़ लेंगे, आर्थिक स्थिति भले ही सुदृढ़ न हो पर पटरी पर बनी रहेगी। अतः विवाह के लिए कर्ज नहीं लेना है। माता-पिता चिंतित हुए। बेटी को मनाया लेकिन नहीं मानी। अपने दैहिक जीवन का समर्पण कर परिवार के कर्तव्य को निभाया। परिणाम हुआ, तीनों भाई-बहन ने पढ़ाई की और घर की हालत भी नहीं बिगड़ी। दैहिक रूपी समर्पण कर्तव्य से वह अपने माता-पिता से बड़ी हो गई। जब तक जीवित रही कोई भी उससे पूछे बिना कोई काम नहीं करते। समर्पण रूपी कर्तव्य भारत में कर्तव्य की मूल आवधारणा है।

संविधान में हमारे ग्यारह मौलिक कर्तव्य हैं। पहला, संविधान का पालन करना और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज एवं राष्ट्र गान का आदर करना। दूसरा, स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय संघर्ष को प्रेरित करने वाले महान आदर्शों का पालन करना। तीसरा, भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को बनाए रखना और उसकी रक्षा करना। चौथा, देश की रक्षा करना और आह्वान किये जाने पर राष्ट्र की सेवा करना। पांचवां, भारत के लोगों में समरसता और समान भातृत्व की भावना का निर्माण करना; जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग आधारित सभी प्रकार के भेदभाव से परे हो। छठा, हमारी समग्र संस्कृति की समृद्ध विरासत को महत्त्व देना और संरक्षित करना। सातवां, वनों, झीलों, नदियों और वन्यजीवन सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा एवं सुधार करना। आठवां, मानवतावाद, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा ज्ञानार्जन एवं सुधार की भावना का विकास करना। नौवां, सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा करना एवं हिंसा से दूर रहना। दसवां, व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधि के सभी क्षेत्रों में उत्कृष्टता के लिए प्रयास करना। ग्यारहवां, 6 से 14 वर्ष तक के उम्र के अपने बच्चों को शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना।

हमारा जीवन जन्म से मरण तक कर्तव्यों से जुड़ा हुआ है। जो जीवन कर्तव्य की भूमिका से परिपूर्ण होता है, उसके जीवन को राष्ट्र कभी नहीं भूलता। आज क्या हम उन्हें भूल सकते हैं जो कोरोना संकट की लड़ाई में अपने जीवन को जोखिम में डाले हुए हैं। हम कैसे भूल सकते हैं चिकित्सकों को, प्रशासकों को, राजस्वकर्मियों को, पुलिस बलों को, स्वास्थ्यकर्मियों को, सफाई कर्मचारियों को। सभी राष्ट्र कर्तव्य का पालन कर रहे हैं। उनके कर्तव्य समर्पण से ही प्रधानमंत्री का आत्म विश्वास जगा।

अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, रूस, जापान, इटली, स्पेन अपने को विकसित राष्ट्र मानता है। उनकी और हमारी आबादी के बारे में अगर हम विचार करते हैं तो पाते हैं, अधिक आबादी होते हुए भारत का हर नागरिक अपनी कर्तव्यपरायणता में शत-प्रतिशत उतीर्ण हो रहा है। हम भारत को सिर्फ भारत नहीं कहते। भारत हमारी माता है। माता के प्रति प्रत्येक पुत्र का कर्तव्य होता है। यह संकट का समय भले ही महामारी कोरोना के कारण आया है, पर हमें माता के प्रति कर्तव्य निभाने का समय ने एक ऐतिहासिक अवसर प्रदान किया है।

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