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आलोक पुराणिक का लेख : खुलने की चुनौतियां, बंद होने के खतरे

भारत के इस समझौते में न रहने से इस समझौते के आर्थिक और राजनीतिक महत्व में कमी आएगी फिर भी इस समझौते का अपना अलग महत्व है, अगर भारत आरसेप में शामिल हो जाता तो फिर समग्र तौर पर आरसेप देशों का बाजार इतना बड़ा हो जाता कि दुनिया की लगभग आधी आबादी इन देशों की निवासी होती और ग्लोबल सकल घरेलू उत्पाद में इसका योगदान एक तिहाई होता। समझौते के तहत तमाम देशों के एक दूसरे के बाजारों तक पहुंच हासिल होगी, जो सामान्य तौर पर उपलब्ध नहीं होती।

आलोक पुराणिक का लेख : खुलने की चुनौतियां, बंद होने के खतरे
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आलोक पुराणिक

भारत ने रीजनल कांप्रिहेंसिव इकनोमिक पार्टनरशिप में शामिल नहीं होने का फैसला किया है। इस फैसले के गंभीर आर्थिक और राजनीतिक परिणाम हैं। रीजनल कॉम्प्रीहेन्सिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप यानी आरसेप समझौता एक ऐसा प्रस्त‍ावित व्यापक व्यापार समझौता है, जिसके लिए आसियान के 10 देशों के अलावा 6 अन्य देश-चीन, भारत, दक्ष‍िण कोरिया, जापान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच बातचीत चल रही थी। इसके लिए बातचीत साल 2013 से ही चल रही थी। मोटे तौर पर इस आरसेप का उद्देश्य एक एकीकृत बाजार बनाने का था, यानी आरसेप के तमाम सदस्य देशों को एक दूसरे के बाजार में जाने मे आसानी सुनिश्चित की जा सके, ऐसी आरसेप से उम्मीद थी।

यूं भारत के इस समझौते में ना रहने से इस समझौते के आर्थिक और राजनीतिक महत्व में कमी आयेगी फिर भी इस समझौते का अपना अलग महत्व है। अगर भारत आरसेप में शामिल हो जाता तो फिर समग्र तौर पर आर सेप देशों का बाजार इतना बड़ा हो जाता कि दुनिया की लगभग आधी आबादी इन देशों की निवासी होती और ग्लोबल सकल घऱेलू उत्पाद में इसका योगदान एक तिहाई होता। इसमें आसियान के दसों देशों, ब्रुनेई, कम्बोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, म्यांमार, फिलीपीन्स, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम के अलावा चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड शामिल हैं। इस समझौते के तहत तमाम देशों के एक दूसरे के बाजारों तक पहुंच हासिल होगी, जो सामान्य तौर पर उपलब्ध नहीं होती।

पिछले साल ही मनाही

मोदी सरकार ने 2019 में ही यह साफ कर दिया था कि भारत आरसेप का हिस्सा नहीं बनेगा। इसके बावजूद भारत का यह फैसला आरसेप के लिए एक झटका था क्योंकि भारत उन देशों में शामिल था, जो 2012 में आरसेप के लिए पहली बार शुरू हुई पहली बातचीत के टेबल पर मौजूद थे। भारत ने 4 नवंबर 2019 को बैंकॉक में हुई बैठक में ही साफ कर दिया था कि वह इस समझौते से खुद को अलग कर रहा है।

भारत के पास क्या है देने को

भारत के पास बहुत ब़ड़ा बाजार है, आबादी के मामले में दुनिया का दूसरे नंबर का मुल्क होने के कई फायदे हैं। आबादी मतलब बाजार, जिसमें घुसने के लिए कई देश, कई कंपनियां उत्सुक होंगी, स्वाभाविक है। भारत की सेवा क्षेत्र में महाऱथ है, यानी भारत सेवा क्षेत्र में कई देशों में जाकर निवेश कर सकता है, वहां मुनाफा कर सकती हैं भारतीय कंपनियां। भारत की समस्या यह है भारत के पास एक मजबूत मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर या निर्माण सेक्टर ऐसा नहीं है जो सस्ती रेट पर बढ़िया आइटम तैयार कर सके। मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर में क्षमताओं के मामले में चीनी कंपनियां सबसे ऊपर हैं। यहां यह नोट किया जा सकता है कि अब भी जबकि आरसेप समझौता नहीं है, तब भी भारत में बिकने वाले दस स्मार्टफोनों में से करीब सात चाइनीज ब्रांड के हैं। आरसेप जब चाईनीज आइटमों को घुसने की लगभग खुली छूट देगा, तब भारत में बननेवाले आइटमों की हालत क्या होगी, यह सोचा जा सकता है। इसलिए भारत के तमाम उद्योग आरसेप का विरोध कर रहे थे, हालांकि इस विरोध में कई बार यह इच्छा भी शामिल थी कि हमें घटिया और महंगा सामान बेचने की छूट मिलती रहनी चाहिए। कड़ी प्रतिस्पर्धा में हमको ना डाला जाये। सच यह है कि अधिकांश व्यापार समझौतों से भारत लाभ नहीं उठा पाया है, वह क्यों नहीं उठा पाया है, यह अलग विश्लेषण का विषय है।

एसियान देशों के साथ हुए व्यापार घाटे के आंकड़े देखें, तो साफ होता है कि ग्लोबल कारोबार के मामले में भारत पिट रहा है। यानी भारत दूसरे देशों को माल नहीं बेच पा रहा है, दूसरे देशवाले भारत में आकर माल बेचकर मुनाफा कमा कर निकल लेते हैं। यानी आर्थिक व्यवस्था में भारत की भूमिका बतौर बड़े बाजार की है, जिसे माल बेचा जा सकता है। 2009-10 में एसियान देशों के साथ भारत का व्यापार घाटा करीब 8 अरब डालर का था, यह 2018-19 में बढ़कर 22 अरब डालर हो गया। यानी भारत एसियान देशों से लगातार ज्यादा आयात कर रहा है, और निर्यात कम ही कर पा रहा है। आरसेप में मूलत एसियान देश ही शामिल हैं, चीन आरसेप में अतिरिक्त खतरा है। अकेले चीन के साथ पचास अरब डालर से ज्यादा का व्यापार घाटा है। आरसेप समझौते का मतलब है कि चीन से तमाम आइटम आना बहुत सस्ता और आसान हो जायेगा। चीन से आनेवाले 80-90 प्रतिशत आइटम सस्ते हा जायेंगे यानी ये सस्ते चाईनीज आइटम घरेलू भारतीय उत्पादों को उस तरह से बाजार से बाहर कर देंगे जिस तरह से मोबाइल हैंडसेट बाजार में भारतीय कंपनियां बाहर हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि भारतीय कंपनियों को बेहतर नहीं होना चाहिए। इसका मतलब इतना है कि भारतीय कंपनियां अभी चीनी आइटमों का मुकाबला करने की हालत में नहीं हैं। भारत के डेयरी उद्योग को भी भारी खतरा इस समझौते से पैदा होने की आशंकाएं थीं।

चीन तत्व की अहमियत

चीन सस्ते आइटम बेचता है और तमाम वजहों से बेचता है। पर चीन अपने यहां आसानी से विदेशी कंपनियों को इजाजत नहीं देता, तमाम चीनी ब्रांड के फोन यहां बिक सकते हैं, पर भारत की टेलीकाम कंपनियों को व्यापक और सस्ती सेवाएं बेचने की इजाजत चीन नहीं देगा। यानी चीन एक हद तो मुक्त व्यापार का समर्थक है, पर एक हद के बाद वह कतई तानाशाह देश की तरह बरताव करता है। 2011 में एक किताब 2011 में पीटर नवारू और ग्रेग आट्री की एक किताब आयी थी-डैथ बाय चायना, इसमें लेखकों ने बताया था कि किस तरह से चीन अमेरिकन अर्थव्यवस्था को तबाह कर रहा है, ट्रंप इस किताब से बहुत प्रभावित हुए थे। डैथ बाय चायना के लेखकोँ का संक्षेप में आशय यह था कि चीन जानबूझकर अपनी करेंसी युआन को सस्ता रखता है, ताकि उसके आइटम दूसरे देशों में सस्ते मिल पायें। इसे यूं समझें कि जैसे अगर एक डालर में सात युआन आ रहे हैं तो सात युआन का कोई आइटम अमेरिका में एक डालर का मिलेगा। चीन अपने युआन की कीमत गिरा दे यानी एक डालर में चौदह युआन मिलने लग जायें, तो अमेरिका में वही आइटम आधा डालर का मिलेगा या एक डालर में वो आइटम दो मिलने लगेंगे। चीन विदेशी बाजारों में अपना माल खपाने के लिए इस तरह का फर्जीवाड़ा करता रहा है। खुद भारत भी इसका एक हद तक भुक्तभोगी है, चीनी मोबाइल चीनी आइटम इस कदर सस्ते मिलते हैं भारत में कि उद्योगपतियों के लिए उनका मुकाबला करना मुश्किल हो जाता है।

भारतीय कारोबारी मजबूत बनें

आरसेप में ना जाने की मतलब यह नहीं है कि कई भारतीय कारोबारी यह समझ लें कि उन्हें अपने हिसाब से महंगे व घटिया आइटम बेचने का लाइसेंस हासिल हो गया है। प्रतिस्पर्धा से उपभोक्ता का भला होता है। लंबे अरसे से कई भारतीय कारोबारी बहुत आसान माहौल में काम करने के आदी रहे हैं। हाल में प्रख्यात अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला की अध्यक्षता में एक रिपोर्ट आयी है इस विषय पर कि निर्यात कैसे बढ़ायें। इसमें सुरजीत भल्ला की सिफारिशों का एक आशय यह भी है पहले हमें अपना घर दुरुस्त करना होगा।

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