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आलोक पुराणिक का लेख : आम आदमी को केवल घाटा

निजी क्षेत्र की तरफ से सेवाओं का स्तर उन्नत उपलब्ध हो सकता है, पर इसका भुगतान अगर मरीज की जेब पर बहुत भारी हो जाए, तो मरीज एक समस्या से निकलकर दूसरी समस्या में फंस जाता है। यही हो रहा है, कोरोना का इलाज करा पाना हरेक के लिए संभव नहीं हो पा रहा है। बहुत आसान है कि नियम बन जाएं और अधिकतम वसूली जाने वाली कीमत की सीमा भी तय हो जाए, पर जमीनी सच्चाई कुछ और है। कई गंभीर मामलों में अस्पताल लाखों के बिल बना देते हैं। अगर पर मध्यमवर्गीय परिवार पर भी अगर लाखों के बिल का बोझ पड़ जाए, तो उसका अर्थशास्त्र पूरी तरह से गड़बड़ा जाता है।

आलोक पुराणिक का लेख : आम आदमी को केवल घाटा
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आलोक पुराणिक

आलोक पुराणिक

इलाज तो उपलब्ध है, पर सुप्रीम कोर्ट के स्वास्थ्य मौलिक के अधिकार से आशय सस्ते इलाज से है। समाज का संपन्न वर्ग तो फाइव स्टार अस्पतालों में भर्ती होकर स्वस्थ हो जाता है, धन उसके लिए कोई समस्या नहीं है, पर यह बात सभी पर लागू नहीं होती। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अशोक भूषण की अगुवाई वाली बेंच ने अपने अहम आदेश में कहा है कि कोविड के कारण विश्वभर के लोग परेशान हो रहे हैं। ये कोविड के खिलाफ एक तरह से विश्व युद्ध है। ऐसे में सरकार और पब्लिक के सहयोग से ही इस युद्ध को जीता जा सकता है। अदालत ने अपने अहम फैसले में कहा है कि राइट टु हेल्थ मौलिक अधिकार है और संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत जो जीवन का अधिकार है उसी में राइट टु हेल्थ शामिल है। इसके तहत सस्ते इलाज की व्यवस्था होनी चाहिए। राइट टु हेल्थ में इलाज आम लोगों के जेब के दायरे में होना चाहिए। ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी है कि वह आम लोगों के लिए सस्ते इलाज की व्यवस्था करे। राज्य की ये भी जिम्मेदारी है कि सरकार और स्थानीय प्रशासन की तरफ से चलाए जाने वाले अस्पतालों की संख्या ज्यादा से ज्यादा बढ़ाई जाए और इसकी व्यवस्था की जाए। अदालत ने कहा कि इसमें संदेह नहीं है कि कारण जो भी हो, इलाज महंगा हो चुका है और यह आम आदमी की जेब से बाहर जा चुका है। अगर कोविड के इलाज से कोई बच भी जा रहा है तो कई बार वह आर्थिक तौर पर खत्म हो रहा है।

सरकार या तो ज्यादा से ज्यादा इंतजाम करे या फिर सरकार और प्रशासन को चाहिए कि वह प्राइवेट अस्पतालों में इलाज के एवज में लिए जाने वाले चार्ज पर कैप लगाए। इसके लिए अथॉरिटी डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट के तहत प्रावधान का प्रयोग कर सकती है।

काफी बनाम इलाज

एक निजी अस्पताल की चेन के मालिक ने हाल में एक महत्वपूर्ण बयान दिया जिसका आशय था कि सरकार को निजी अस्पतालों द्वारा वसूले गए बिल पर बंदिश नहीं लगानी चाहिए। उनका तर्क था, काॅफी दस रुपये की भी मिलती है औऱ फाइव स्टार होटलों में सैकड़ों की भी मिलती है। सर्विस सर्विस का फर्क होता है तो कीमतें बढ़ जाती हैं। इसी तरह से इलाज के मामले में सेवाओं के फर्क हैं, इसलिए कीमत का फर्क तो होगा ही। यह तर्क सिर्फ मुनाफे के अर्थशास्त्र की कसौटी पर तो खरा उतर सकता है, पर मूल सवाल यह है कि जीवन काॅफी नहीं है। जीवन बहुत कीमती है। उसे हर हाल में बचाया ही जाना चाहिए और किसी की जान सिर्फ इसलिए नहीं जानी चाहिए कि महंगा इलाज करवा पाना उसके बस में नहीं था। काॅफी के बगैर जीवन बच सकता है, पर इलाज के बगैर जीवन नहीं बच सकता है। निजी क्षेत्र की तरफ से सेवाओं का स्तर उन्नत उपलब्ध हो सकता है, पर इसका भुगतान अगर मरीज की जेब पर बहुत भारी हो जाए, तो मरीज एक समस्या से निकलकर दूसरी समस्या में फंस जाता है। यही हो रहा है, कोरोना का इलाज करा पाना हरेक के लिए संभव नहीं हो पा रहा है। कई गंभीर मामलों में अस्पताल लाखों के बिल बना देते हैं। मरीज के परिजन कहीं से जुटाकर जमा करके राशि दे रहे हैं, पर मध्यमवर्गीय परिवार पर भी अगर लाखों के बिल का बोझ पड़ जाए, तो उसकी आर्थिक दशा समस्याओं में आ जाती है।

नियमों का हश्र

बहुत आसान है कि नियम बन जाएं और अधिकतम वसूली जाने वाली कीमत की सीमा भी तय हो जाए, पर जमीनी सच्चाई कुछ और है। वहां मामला मांग और आपूर्ति के हिसाब से चलता है। कोरोना के लिए अगर उपचार के लिए 100 बिस्तर उपलब्ध हैं और मांग 200 बिस्तरों की है, तो कोई नियम काम नहीं करता। निजी अस्पताल वसूली के लिए बहुत तरकीबें निकाल लेता है। ऐसा ही हुआ है हाल में। कोरोना से निपटने की जो व्यवस्थाएं सरकारी अस्पतालों में हैं, उनकी दशा और दुर्दशा की गाथाएं हम सबने हाल के महीनों में देखी हैं। देश की राजधानी के सरकारी अस्पतालों में कोरोना के मरीजों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। जो प्रभु वर्ग है, उसके लिए तो पंचतारा अस्पताल हैं, उन्हें कोई दिक्कत नहीं है, पर धनहीन जनता को कोई रखवाला नहीं है।

बीमा को लेकर जागरूकता

यह बात अपनी जगह सच है कि सरकार कुछ भी नियम बना ले, अंतत निजी अस्पताल वही काम करेंगे, जिनमें उन्हें अधिकतम मुनाफा होता हो, इसलिए नियमों के अलावा दूसरे विकल्पों पर विचार होना चाहिए। सेहत बीमा के बारे में ज्ञान प्रसार होना चाहिए। सेहत बीमा को और सस्ता बनाया जाना चाहिए। सेहत बीमायुक्त किसी गरीब मजदूर से भी पचास हजार जुगाड़ ने की आस दिखेगी, तो निजी अस्पताल उसे भी भर्ती करेगा, टरकाएगा नहीं। निजी अस्पतालों के चरित्र को बदलना मुश्किल है, खास तौर पर तब, जब उन पर तमाम नेताओं का हाथ हो, नेता खुद वहां इलाज करवाने जाते हों। सुप्रीम कोर्ट चिंता कर सकता है, उसने चिंता की भी है, पर ठोस नीतियों का निर्माण, सेहत बीमा को लेकर जागरूकता फैलाना, सेहत बीमा को सस्ता करना तो सरकार की जिम्मेदारी है। केंद्र सरकार और राज्य सरकारें इस संबंध में संयुक्त तौर पर काम कर सकती हैं। इसके लिए आपसी मतभेदों को भी भूलना होगा। लोकतंत्र में नागरिक की जान से बढ़कर कुछ भी नहीं है।

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