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संत समीर का लेख : नफा-नुकसान का एक साल

लॉकडाउन के चलते लोग घरों में कैद हुए तो शरीर की हरकत कम या बंद हुई, इससे कमरदर्द से लेकर सर्वाइकल, क़ब्ज़, बवासीर, नर्व पेन, अवसाद जैसे तमाम रोग उभरने लगे। नफे की बात करें तो लॉकडाउन के दौरान ‘वर्क फ्राम होम’ कल्चर में वृद्धि हुई। परिवार में रिश्तों की नज़दीकियाँ बढ़ीं। सेहत के प्रति जागरूकता बड़ी। प्रकृति मुस्कुराई। हवा शुद्ध हुई।

संत समीर का लेख :  नफा-नुकसान का एक साल
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कोरोना वायरस

संत समीर

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के 'कोविड-19 से निपटने की सरकारी कोशिशों के ट्रैकर' ने कहा था कि भारत का लॉकडाउन दुनिया का सबसे सख़्त लॉकडाउन है। इस लॉकडाउन से कोविड-19 पर क्या कुछ काबू पाया जा सका, इसकी ज़रूरत कितनी थी, या कि इससे देश को घाटा-नफ़ा कितना हुआ? अब जब एक साल बीता है तो ठहर कर ज़रा सोचने की ज़रूरत है। नुक़सानों की बात करें तो ऐसे अप्रत्याशित फैसले आमजन को एकबारगी मुश्किल में डालते ही हैं। नोटबंदी के समय आवाम ने भुगता। मजदूर तबके का सबसे अधिक नुकसान हुआ। लाखों नौकरियां चली गईं। सैलरी कट का दंश चला। उद्योग धंधे ठप हुए। ग़रीब आबादी की ज़िंदगी और कठिन हुई। आज साल भर बाद भी लेबर चौराहों पर उम्मीदें ठीक से रौशन नहीं हो पाई हैं। लोन चुकाने में लोग असमर्थ होते गए। लॉकडाउन के चलते घरों में कैद हुए तो शरीर की हरकत कम या बंद हुई, इससे कमरदर्द से लेकर सर्वाइकल स्पॉण्डिलाइटिस, कब्ज, बवासीर, नर्व पेन, अवसाद जैसे तमाम रोग उभरने लगे। घर में क़ैद खेलकूद से महरूम बच्चों का मानसिक विकास कितना अवरुद्ध हुआ होगा, यह अभी शोध का विषय है। नुक़सानों की फेहरिश्त लंबी हो सकती है।

लॉकडाउन के दौरान 'वर्क फ्राम होम' कल्चर में वृद्धि हुई। परिवार में रिश्तों की नज़दीकियाँ बढ़ीं। लोगों में सेहत के प्रति जागरूकता बड़ी। लॉकडाउन की शांति में प्रकृति को मुस्कराते हम सबने देखा। पर्यावरण साफ-सुथरा हुआ, तो महानगरों का धुआँ-धूल भी छंट गया और आसमान में तारे गिनने के दिन कुछ दिनों के लिए जैसे फिर लौट आए। राजमार्गों पर जानवरों की प्रकृति के साथ वैसी अठखेलियाँ हमने देखीं, जिनके बारे में कभी सोचा नहीं था। अस्थायी ही सही, पर इन सब बदलावों ने एक जरूरी विमर्श को जन्म दिया कि प्रकृति को बनाए और बचाए रखना सबसे अहम है, वरना कब कौन अदना-सा वायरस या बैक्टीरिया मानवी सभ्यता पर भारी पड़ जाय, कुछ कहा नहीं जा सकता। कोरोना के बहाने आधुनिक जीवनशैली पर सवाल खड़े हुए और यह चर्चा शुरू हुई कि प्रकृति विरोधी विकास की गाड़ी को पटरी पर कैसे लाया जाय। स्वदेशी का मुद्दा फिर प्रासंगिक हो उठा।

सेहत के बारे में बड़ी बात यह हुई कि वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों में लोगों का भरोसा और ज़्यादा बढ़ा। कोविड-19 चिकित्सा की गाइडलाइनों में भले ही होम्योपैथी, आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा को इलाज की खुली छूट नहीं दी गई, पर देश की बड़ी आबादी इन्हीं की वजह से कोविड से सही-सलामत रही। लोग जंकफूड से भी दूर हुए। साफ़-सफ़ाई के प्रति एक ख़ास तरह की जागरूकता पैदा हुई।

इन तमाम अच्छे-बुरे नतीजों के बीच एक बड़ा सवाल यह भी उभरा कि क्या वास्तव में कोविड-19 को महामारी माना जाना चाहिए या यह आसान बीमारी है व इसे सुनियोजित तरीके से खतरनाक बनाया गया? सवाल इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल (अमेरिका) के अनुसार दुनिया भर में हृदयरोगों से हर दिन क़रीब पचास हज़ार लोग मरते हैं, कैंसर से क़रीब छब्बीस हज़ार, तो श्वसनतंत्र की बीमारियों से क़रीब अट्ठाह हज़ार लोग हर दिन मौत के शिकार होते हैं। यहीं पर कोरोना की बात करें तो इसमें मरने वालों का हर दिन का औसत क़रीब छह हज़ार है। यह छह हज़ार भी तब है, जबकि इसमें एनफ्लूएंजा और न्यूमोनिया जैसी बीमारियों से मरने वाले वाले क़रीब-क़रीब सब और हृदयरोग वग़ैरह से मरने वालों का भी कुछ हिस्सा शामिल है। मतलब यह कि कोरोना संक्रमण की वजह से वास्तविक मौतें बहुत कम हैं। इसे महामारी न मानने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि यह सर्दी-ज़ुकाम-फ्लू की तरह बेहद आसान बीमारी है और यदि मीडिया पर रोज़-रोज़ शोर न मचवाया गया होता तो यह कब आई और लोगों को सर्दी-ज़ुकाम-बुख़ार की हल्की-फुल्की तकलीफ़ देकर चली गई, ज़्यादातर लोगों को पता तक न चलता।

डॉक्टरों के व्यावहारिक अनुभव बताते हैं कि कोविड-19 को क़ाबू करने में होम्योपैथी, आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा सबसे ज़्यादा कारगर साबित हुई हैं। इन पद्धतियों से जिनका इलाज किया गया, उनमें से एक भी व्यक्ति की मौत नहीं हुई। यदि इन पद्धतियों को बड़े पैमाने पर इलाज की छूट दी गई होती तो अधिकतर लोगों की जान बचाई जा सकती थी। इलाज के तौर-तरीक़े ने इस आशंका को और बल दिया कि बीमारी तो यह आसान थी, पर फार्मा कंपनियों ने सोची-समझी साज़िश के तहत इसे डरावना प्रचारित किया और कठिन बनाया। लोग डर कर बचने के लिए उन दवाओं को हलक के नीचे उतारते रहे, जो इस बीमारी के लिए थीं ही नहीं।

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