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विकेश कुमार बडोला : अपरिहार्य हो एक देश एक चुनाव

प्रधानमंत्री माेदी ने एक राष्ट्र एक चुनाव की बात पुनः उठाई है। वे एकाधिक मंचों से सभी प्रकार के चुनाव एक साथ कराने के कई मौखिक प्रस्ताव रख चुके हैं। प्रधानमंत्री अपने दीर्घकालिक राजनीतिक अनुभवों के आधार पर यह बात कह रहे हैं कि राष्ट्र में लोकसभा से लेकर ग्राम प्रधान तक के चुनाव एक ही समयावधि में एकल मतदाता-सूची में प्रविष्टि नागरिकों के मतदान द्वारा सम्पन्न कराए जाने चाहिए। उनके अनुसार, इस अभूतपूर्व निर्वाचन-व्यवस्था के लागू होने से भारत राष्ट्र का धन, संसाधन और समय तो बचेगा ही बचेगा, साथ ही चुनाव प्रचार और मतदान की समयावधि में होने वाली अराजक गतिविधियों पर भी पूर्णतः रोक लग जाएगी।

विकेश कुमार बडोला : अपरिहार्य हो एक देश एक चुनाव
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पीएम मोदी, फोटो एएनआई

विकेश कुमार बडोला

अभी प्रधानमंत्री माेदी ने एक राष्ट्र एक चुनाव की बात पुनः उठाई है। वे एकाधिक मंचों से सभी प्रकार के चुनाव एक साथ कराने के कई मौखिक प्रस्ताव रख चुके हैं। प्रधानमंत्री अपने दीर्घकालिक राजनीतिक अनुभवों के आधार पर यह बात कह रहे हैं कि राष्ट्र में लोकसभा से लेकर ग्राम प्रधान तक के चुनाव एक ही समयावधि में एकल मतदाता-सूची में प्रविष्टि नागरिकों के मतदान द्वारा सम्पन्न कराए जाने चाहिए। उनके अनुसार, इस अभूतपूर्व निर्वाचन-व्यवस्था से भारत राष्ट्र का धन, संसाधन और समय तो बचेगा ही बचेगा, साथ ही चुनाव प्रचार और मतदान की समयावधि में होने वाली अराजक गतिविधियों पर भी पूर्णतः रोक लग जाएगी। एक साथ चुनाव से बार-बार होने वाले चुनावी कार्यक्रमों से प्रभावित नहीं होगा। शासन-प्रशासन के कर्मचारियों पर चुनावी कार्यों का बोझ नहीं होगा। यदि विश्लेषण किया जाए तो एक साथ चुनाव का विकल्प अंगीकार करने के बाद भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था सशक्त, पारदर्शी और अधिक उत्तरदायी बनेगी।

यद्यपि दो निरंतर कार्यकालों के लिए बहुमत के आधार पर चुने गए प्रधानमंत्री मोदी यह मौखिक प्रस्ताव विपक्ष, नागरिकों, लोकतांत्रिक संस्थाओं, शासकीय-प्रशासकीय अधिकारियों कर्मचारियों और जनसंचार संस्थानों के सम्मुख रख रहे हैं तो इस पर गंभीर एवं व्यापक विचार-विमर्श किए जाने की जरूरत है और राष्ट्र को सभी की सहमति से एक चुनाव की दिशा में शीघ्र ही निर्णायक स्थिति में पहुंचना चाहिए। भारत में विभिन्न स्तरों और प्रकारों के चुनावी कर्तव्य भारतीय चुनाव आयोग निभाता है। भारतीय चुनाव आयोग द्वारा राज्यों में भी अपने अधीन राज्य चुनाव आयोगों की स्थापना की गई है, जो राज्य में चुनाव संपन्न कराने के अपने स्वत्वाधिकारों के साथ चुनाव से संबंधित अपने दायित्वों का निर्वहन करते हैं। हालांकि चुनावी नीतियों, प्रक्रियाओं और कार्यान्वयन के संबंध में नए दिशा-निर्देश भारतीय चुनाव आयोग ही निर्गत करता है, परंतु वास्तव में राज्य स्तर पर स्थितियां भिन्न होती हैं। यह विचारणीय तथ्य है कि केंद्रीय सत्ता में आरूढ़ दल के लोकतांत्रिक चाल-चलन के आधार पर ही चुनाव आयोग से लेकर अन्य लोकतांत्रिक संस्थाएं, आयोग और विभाग अपने कर्तव्यों के संबंध में अपना अच्छा-बुरा एवं उचितानुचित दृष्टिकोण बनाते हैं तथा वे उसी के अनुरूप अपनी क्रियात्मक भूमिका में होते हैं।

कहने का आशय यह है कि यदि केंद्र अथवा राज्यों में सत्तारूढ़ राजनीतिक दल भ्रष्टाचार और अलोकतांत्रिक गतिविधियों में लिप्त होते हैं तो स्वाभाविक है कि चुनाव आयोग भी अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान नहीं बना रह सकता। परिणामस्वरूप किसी भी स्तर के चुनाव एवं मतदान निष्पक्ष, उचित प्रकार से संपन्न नहीं होते। और यदि केंद्र में सत्तारूढ़ राजनीतिक दल लोकतांत्रिक दायित्व निर्वहन के प्रति पूर्णतः निष्ठावान रहता है, जैसे कि इस समय भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री मोदी हैं, तो चुनाव आयोग ही नहीं प्रत्येक लोकतांत्रिक संस्था को चाहे-अनचाहे निष्ठावान व उत्तरदायी होना ही पढ़ता है। लोगों को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि एक देश एक चुनाव का आह्वान प्रधानमंत्री का निष्ठाजन्य प्रस्ताव ही है। इस प्रस्तावना के पीछे जो राजनीतिक भावना गुप्त है, वह हर संभाव्य तरीके से राष्ट्र हित में ही है। नागरिकों के इस प्रस्ताव पर सहमति दिखानी चाहिए। प्रत्येक नागरिक को इस दिशा में गंभीरता के साथ अपनी आवाज उठानी चाहिए।

प्रधानमंत्री मोदी स्वतंत्र भारत के सर्वाधिक दायित्वबोधी कर्तव्यनिष्ठ प्रधानमंत्री हैं। इस बारे में दो राय हो ही नहीं सकती। एक चुनाव के सफल आयोजन से भारत देश के लोकतंत्र के संबंध में परिव्याप्त अनेक विसंगतियां स्वतः समाप्त हो जाएंगी। एक चुनाव का नियम बन जाने के बाद देश की चुनावी प्रक्रिया सरल, पारदर्शी, अराजकतामुक्त, मितव्ययी, समय बचत करने वाली और नागरिकों की अभिरुचि बनेगी। चुनाव प्रक्रिया से संबंधित इतने सकारात्मक पहलुओं के मौजूद होने से निश्चित रूप से चुनाव भारत में आदर्श हो जाएंगे। जिस प्रकार निम्न से लेकर उच्च स्तरीय चुनावों में हर बार नए-नए राजनीतिक दल व निर्दलीय प्रत्याशी निर्वाचन-प्रतिस्पर्धा में हिस्सेदारी कर रहे हैं, उस कारण चुनाव आयोग के पर चुनावों से संबंधित कार्य दायित्वों का बोझ बढ़ता जा रहा है। केंद्र और राज्य सरकारों के शासन-प्रशासन के लिए भी इस स्थिति में शासकीय-प्रशासकीय कार्य दायित्व बढ़ जाते हैं। भारत में राजनीति और शासन-प्रशासन के क्षेत्र में यही विकार पनपते रहे हैं। इसी कारण चुनाव, मतदान और चुनाव परिणाम संदिग्ध बनते रहे हैं। सभी स्तर के चुनाव एक साथ कराने से इन सभी समस्याओं का पूर्ण निराकरण संभव है।

इस संबंध में अति ध्यान देने योग्य जो बात है वह यही है कि यदि मोदी को छोड़कर किसी अन्य भ्रष्ट राजनीतिक दल और उसके प्रधानमंत्री या प्रमुख नेता द्वारा एक देश एक चुनाव का प्रस्ताव रखा जाता, तो उस पर विश्वास करना असंभव होता। ऐसा प्रस्ताव भी इसलिए संकल्पित हो पाया है क्योंकि प्रधानमंत्री ने अपने स्तर पर देश को हर तरह भ्रष्टाचारमुक्त किया है। हां, जो अभाजपायी राज्य सरकारें हैं, उनके भ्रष्टाचार पर अभी प्रधानमंत्री द्वारा कोयी नियंत्रण नहीं किया जा सका है। लोकतंत्र की विसंगतियों के कारण ऐसा हो पाना संभव भी नहीं है। संभवतः एक देश एक चुनाव की संकल्पना इन विसंगतियों और अभाजपायी राज्य सरकारों के भ्रष्टाचार से मुक्ति अवश्य दिलाएगी।

संसद के मानसून सत्र में संसद से पारित तीन नव कृषि विधेयकों के विरोध और इन विधेयकों को वापस लेने की मांग के चलते इस समय दिल्ली में पंजाब के किसानों का जो तथाकथित आंदोलन चल रहा है और जिसमें देश का मोदी विरोधी हर राजनीतिक दल, इन दलों के महत्वाकांक्षी नेता, देशविरोधी समूह, लोग और अन्य व्यक्ति शामिल हैं यह सब कुछ ओछी और राष्ट्रघाती राजनीति के कारण हो रहा है। यदि एक देश एक चुनाव का प्रस्ताव कार्यरूप में परिणत होता है, तो निश्चित ही अभी की अनावश्यक किसान आंदोलन जैसी परिस्थितियां भी निर्मित नहीं हो पाएंगी। कृषि व कृषकों की आड़ लेकर परिव्याप्त वर्तमान आंदोलन भी आगमी अप्रैल-मई में पांच राज्यों में होनेवाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए षड्यंत्रपूर्वक आयोजित किया गया है। यदि देश में एक बार सभी चुनाव का नियम होता, तो अवश्य ही पंजाब के कृषकों की आड़ लेकर उठा वर्तमान आंदोलन होता ही नहीं। ऐसे निरर्थक, कृषकों को भ्रमित करनेवाले आंदोलनों का अस्तित्व भी बार-बार होनेवाले चुनावों पर टिका होता है। यही नहीं, विविध प्रकार के समय-समय पर होनेवाले चुनावों के कारण अनेक ऐसी गुप्त, अरेखांकित और तात्कालिक रूप में उभरनेवाली समस्याएं भी देश में फैलती हैं, जिनका समुचित समाधान केवल और केवल समस्त चुनाव एक बार के नियम में निहित हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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