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सतीश सिंह का लेख : कसौटी पर तेल की कीमत

भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है। विगत 18 दिनों में डीजल की कीमत कुल 10.48 रुपये प्रति लीटर बढ़ी है, जबकि पेट्रोल 8.50 रुपये प्रति लीटर महंगा हुआ है।

सतीश सिंह का लेख : कसौटी पर तेल की कीमत
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डीजल

सतीश सिंह

देश में पेट्रोल और डीजल की कीमत लगातार उछाल पर है। देशभर में 24 जून को डीजल की कीमत में लगातार 18वें दिन बढ़ोतरी हुई है और दिल्ली में पहली बार 24 जून को यह पेट्रोल से ज्यादा महंगा हो गया। भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है। विगत 18 दिनों में डीजल की कीमत कुल 10.48 रुपये प्रति लीटर बढ़ी है, जबकि पेट्रोल 8.50 रुपये प्रति लीटर महंगा हुआ है। पेट्रोल और डीजल की कीमत में लगातार वृद्धि होने का कारण इन पर ज्यादा कर लगाना है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में मामूली वृद्धि हुई है। कोरोना महामारी के दौरान वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमत में मार्च और अप्रैल में भारी गिरावट आई थी। उस दौरान भारत में कच्चे तेल का बास्केट वर्ष 2019-20 के औसत 60.6 डॉलर प्रति बैरल स्तर का एक तिहाई यानी 20 डॉलर प्रति बैरल रह गया था। तेल की कीमत को नियंत्रित करने के लिए तेल उत्पादक देशों द्वारा इसके उत्पादन में योजनाबद्ध तरीके से कमी करने का फैसला लिया गया। इसी वजह से कच्चे तेल की कीमतों में फिलहाल मामूली वृद्धि हुई है।

भारत दुनिया में कच्चे तेल का तीसरा सबसे बड़ा आयातक देश है। यहां 75 से 80 प्रतिशत कच्चा तेल आयात किया जाता है, जबकि 20 से 25 प्रतिशत कच्चे तेल का उत्पादन भारत खुद करता है। भारत में कच्चे तेल का उत्पादन करने वाली ऑयल इंडिया, ओएनजीसी, रिलांयस इंडस्ट्री, केयर्न इंडिया आदि कंपनियां हैं। सरकार ने 2010 में पेट्रोल की कीमत को और वर्ष 2014 में डीजल की कीमत को नियंत्रणमुक्त कर दिया गया था। पेट्रोल एवं डीजल के खुदरा बिक्री मूल्य के रोज मूल्य निर्धारण की व्यवस्था को 16 जून, 2017 से देशभर में लागू किया गया। इसका यह अर्थ हुआ कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत में उतार-चढ़ाव के अनुरूप तेल की कीमत का निर्धारण भारत में होगा। यानी जब बाजार में तेल की कीमत ज्यादा होगी तो भारत में भी कीमत में बढ़ोतरी होगी।

रोज पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर आवश्यक वस्तुओं जैसे, खाद्य पदार्थों, अनाज, फल और सब्जियों की कीमतों पर पड़ता है। पेट्रोल एवं डीजल बढ़ने पर कारोबारी भी वस्तुओं, अनाजों एवं सब्जियों की कीमत को बढ़ा देते हैं।

सरकार को पेट्रोल एवं डीजल से मुख्य तौर पर दो तरह के फायदे हो रहे हैं। पहला, वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कम कीमत होने के कारण इसके आयात पर विदेशी मुद्रा कम खर्च करना पड़ रहा है। दूसरा, पेट्रोल एवं डीजल पर अधिक कर आरोपित करके केंद्र एवं राज्य सरकारें ज्यादा राजस्व कमा रही हैं। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगभग आधा हिस्सा केंद्र और राज्य सरकार के करों का होता है। पेट्रोल की कीमत में केंद्र और राज्य सरकारों का करों में 50 प्रतिशत हिस्सा होता है, जबकि डीजल की कीमत में करों में इनका 46 प्रतिशत हिस्सा होता है। मौजूदा समय में तेल के बाजार पर 95 प्रतिशत हिस्सा तीन सरकारी कंपनियों इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन और भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन का है, जिसके कारण तेल कंपनियों को मिलने वाला फायदा भी अप्रत्यक्ष रूप से सरकार को मिल रहा है।

कच्चे तेल के गणित को समझने के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में कैसे उतार-चढ़ाव होता है को समझना जरूरी है। कच्चे तेल की न्यूनतम खरीदारी 1,000 बैरल की होती है। एक बैरल में करीब 162 लीटर कच्चा तेल होता है। चूंकि,कच्चे तेल की कई किस्में व श्रेणियां होती हैं। इसलिए, खरीदार एवं विक्रेताओं को कच्चे तेल का एक बेंचमार्क बनाना होता है। इसके बरक्स ब्रेंट ब्लेंड कच्चे तेल का सबसे प्रचलित वैश्विक मानदंड है। इंटरनेशनल पेट्रोलियम एक्सचेंज के अनुसार दुनिया में दो तिहाई कच्चे तेल की कीमतें ब्रेंट ब्लेंड के आधार पर तय की जाती है। ओपेक बाजार में तेल पर नियंत्रण रखता है। ओपेक द्वारा निर्धारित जिस कीमत पर भारत पेट्रोल खरीदता है का लगभग 48 प्रतिशत उसका आधार मूल्य होता है, जो काफी कम होता है।

पेट्रोल और डीजल की कीमत की नई दरें देश में सुबह 6 बजे से लागू होती हैं। पेट्रोल एवं डीजल के आधार कीमत में कच्चे तेल की कीमत, प्रोसेसिंग चार्ज और कच्चे तेल को शोधित करने वाली रिफाइनरी चार्ज शामिल होता है। अमूमन, रिफाइनिंग चार्ज प्रति लीटर चार रुपये आरोपित किया जाता है। इसके बाद, ओएमसी कंपनी डीलर को तेल बेच देती है और डीलर तेल की कीमत पर अपना कमीशन और राज्य सरकार द्वारा लगाया जाने वाला कर वैट जोड़ता है। फिर, इस पर सेस जोड़कर पेट्रोल एवं डीजल की अंतिम कीमत का निर्धारण किया जाता है। इस तरह, पेट्रोल एवं डीजल की कीमत मूल कीमत से बढ़कर दोगुनी से अधिक हो जाती है।

कोरोना महामारी के कारण करोड़ों लोग अपने रोजगार से हाथ धो बैठे हैं। लॉकडाउन को अनलॉक करने से लोग पुनः रोजगार की तलाश में या नौकरी पर जाने के लिये यात्राएं कर रहे हैं, लेकिन पेट्रोल और डीजल की कीमत रोज बढ़ने से उनकी परेशानियां बढ़ रही हैं, लेकिन इससे राजस्व कमा रही है, जिसे किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं कहा जा सकता है।

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