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सुशील कुमार सिंह का लेख: जी सेवन जैसे वैश्विक समूहों की प्रासंगिकता

1975 में छह विकसित देश फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, इंग्लैंड और अमेरिका बाद में कानाडा को जोड़ते हुए पथगामी हुआ जी-7 आज विस्तार की एक नई राह पर खड़ा दिखाई देता है।

सुशील कुमार सिंह का लेख: जी सेवन जैसे वैश्विक समूहों की   प्रासंगिकता
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इन दिनों पूरी दुनिया एक शत्रु से लड़ रही है जो लाइलाज है साथ ही इसकी तबाही से सभी देश वाकिफ हैं। चीन से निकला दुश्मन कोरोना वायरस इन दिनों सभी की सांसों पर भारी पड़ा है। विश्व स्वास्थ संगठन से नाता तोड़ अमेरिका ने यह संकेत दे दिया है कि ऐसे संगठनों की प्रासंगिकता अब खटाई में है। कई अंतरराष्ट्रीय संगठन दौर के अनुपात में अप्रासंगिक होते रहे हैं और कुछ नये स्वरूप लेते भी रहे हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में इन दिनों जी-7 की चर्चा है। जिसमें दुनिया के 7 सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा बताई गई विकसित अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं।

1975 में छह विकसित देश फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, इंग्लैंड और अमेरिका बाद में कानाडा को जोड़ते हुए पथगामी हुआ जी-7 आज विस्तार की एक नई राह पर खड़ा दिखाई देता है। हालांकि दो दशक पहले आठवें देश के रूप में रूस भी इसका हिस्सा था पर अब वह बाहर है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का इरादा है कि जी-7 को जी-10 या जी-11 में तब्दील किया जाए। जिसमें भारत, आॅस्ट्रेलिया, रूस और दक्षिण कोरिया को शामिल करने की बात की जा रही है। गौरतलब है कि यह समूह आर्थिक विकास एवं संकट प्रबंधन, वैष्विक सुरक्षा, ऊर्जा एवं आतंकवाद जैसे वैष्विक मुद्दों पर आम सहमती को बढ़ावा देने हेतु सालाना बैठक आयोजित करता है। यह दुनिया के धनी देशों का समूह है। इतना ही नहीं दुनिया का आधे से अधिक धन अर्थात्ा 58 फीसदी की मालिक यही समूह है। साफ है कि यह समूह दुनिया को अपने आगे पीछे घुमाने की कूबत रखता है मगर कोरोना महामारी के बीच जापान और कुछ हद तक कानाडा को छोड़ दें तो बाकियों की आर्थिक उच्चस्थता और मजबूत सुरक्षा ढांचा स्वयं के नागरिकों के बचाने के काम न आ सका।

वैसे भारत को इस समूह में शामिल होने का अवसर मिलना बड़ी बात है मगर तुलनात्मक तौर पर देखें तो भारत की अर्थव्यवस्था न्यून है। सवाल है कि जी-7 अभी तक कितना प्रभावी रहा है। वैसे देखा जाए तो इसकी आलोचना इस बात के लिए होती रही है कि यह कभी भी प्रभावी संगठन सिद्ध नहीं हुआ। जी-7 का दावा है कि बीते दो दशकों में करीब 3 करोड़ लोगों की उसने जान बचाई है। दावा तो यह भी है कि 2015 के पेरिस जलवायु समझौते को लागू कराने के पीछे इसी की भूमिका है जबकि सच्चाई यह है कि इसी समझौते से अमेरिका अपने को अलग कर लिया है। देखा जाए तो 45 बरस पुरानी यह संस्था और इतनी बार ही शिखर सम्मेलन आयोजित करने वाला यह समूह अब नूतनता की तलाश में है। भारत सहित अन्य देशों को इसमें शामिल करने का दृष्टिकोण दो इशारा करते हैं। पहला यह कि चीन अमेरिका का इस समय सबसे बड़ा दुश्मन है और दक्षिण चीन सागर पर एकाधिकार रखना चाहता है। दक्षिण कोरिया, आॅस्ट्रेलिया, जापान सहित भारत और अमेरिका को यह बहुत अखरता है। दूसरा यह कि भारत को जी-7 में शामिल करने की वकालत करके अमेरिका एशियाई देशों में संतुलन साधने की फिराक में है जो चीन को काउंटर करने के काम आ सकता है।

जब बात जी-7 के विस्तार की है और उसमें भारत को शामिल करने की है तो एक सवाल यह मन में आता है कि इस समूह का हिस्सा चीन क्यों नहीं है जबकि वह अमेरिका के बाद दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। अगर चीन समूह में शामिल नहीं है, भारत को आमंत्रण मिला है तो साफ है वैश्विक पटल पर भारत की साख केवल सम्पत्ति से नहीं सदाचार से भी आंकी जा रही है। जिस मामले में चीन फिसड्डी है। भारत और चीन द्विपक्षीय संबंधों के साथ कई अंतरराष्ट्रीय समूहों में शिरकत करते हैं मगर सीमा विवाद और पड़ोसी देशों को भारत के विरूद्ध भड़काने में चीन मशगूल रहता है।

ऐसा नहीं है कि जी-7 दुनिया का कायाकल्प कर देगा। पहले से शामिल देशों के बीच कई असहमतियां हैं। कनाडा और अमेरिका के बीच पिछले सम्मेलन में बड़ा मतभेद उभरा था। अफ्रीका, लैटिन अमेरिका सहित दक्षिणी गोलार्द्ध के कोई देश जी-7 में नहीं है। ऐसे में यह उत्तरी गोलार्द्ध के यूरोप और अमेरिका महाद्वीप और एशिया के जापान तक ही यह सीमित है। फलस्वरूप यह एक घिसा-पिटा और पुराना माॅडल बन कर रह गया है। अन्यों के इसमें शामिल होने से नए विचार और ताकत ही नहीं बल्कि दक्षिणी गोलार्द्ध में भी इसकी पहुंच बढ़ेगी। भारत आसियान में अपनी उपस्थिति बढ़ाना चाहता है साथ ही प्रशांत महासागरीय देश एपेक समूह तक पहुंचना चाहता है। जी-7 का सदस्य बनना इन रास्तों को आसान कर सकता है। इसके साथ दक्षिण एशिया में भारत की साख भी बढ़ेगी और चीन की तुलना में वैश्विक कद ऊंचा होगा जिसे दक्षिण एशियाई देश सार्क समेत आसियान में संतुलन के काम आएगा। गौरतलब है कि आसियान के बाजारों पर भी चीन का कब्जा है। हालांकि कोरोना महामारी का जन्मदाता चीन इन दिनों दुनिया के निशाने पर है जिसे देखते हुए कई देश समूह और देश की दृष्टि से बदला लेंगे। ऐसे में बीमारी या परेशानी फिर न घटित हो और चीन जैसे देश संकट के सबब न बनें इसके लिए भी समीकरण वैष्विक स्तर पर बदलेंगे। जी-7 को जी-11 बनाने का दृश्टिकोण इस बात को पुख्ता करते हैं। फिलहाल भारत का इसमें सदस्य होने का कितना लाभ होगा यह आने वाली परिस्थितियां निर्धारित करेंगी।

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