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ओमकार चौधरी का लेख : ओबामा और कांग्रेस का संकट

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपनी पुस्तक में राहुल गांधी के संबंध में उन्होंने जो मत व्यक्त किया है, वह बहुत सटीक है। भारतीयों को राहुल गांधी की क्षमता आंकने में कई वर्ष लग गए, परंतु ओबामा एक घंटे की मुलाकात में समझ गए जो उन्होंने भारत आगमन के दौरान की थी। वे समझ गए कि जिसे सोनिया गांधी इस देश का नेता बनाना चाहती हैं, उसे विषयों की समझ ही नहीं है। वह अध्यापक के सामने स्वयं को सिद्ध करने की हड़बड़ी में गड़बड़ी कर जाता है। भारत को समय लगा, परंतु राहुल को कितनी समझ है, उसने अब यह बख़ूबी जान लिया है। राहुल की सुई कई वर्ष से एक जगह पर अटकी है। वह भाषणों में और ट्िवटर पर जो कहते हैं, उस पर लोग भरोसा नहीं कर रहे।

ओमकार चौधरी का लेख : ओबामा और कांग्रेस का संकट
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ओमकार चौधरी

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा राहुल गांधी और सोनिया गांधी से कितनी देर के लिए मिले होंगे। बस एक घंटा। वो भी रात्रि भोज पर, जो मनमोहन सिंह ने उनके भारत आगमन पर दिया था। दस साल पहले 2010 में। अपनी पुस्तक में राहुल गांधी और सोनिया गांधी के संबंध में उन्होंने जो मत व्यक्त किया है, वह बहुत सटीक है। भारतीयों को राहुल गांधी की क्षमता आकने में कई वर्ष लग गए, परंतु बराक ओबामा एक घंटे में समझ गए कि जिसे सोनिया गांधी इस देश का नेता बनाना चाहती हैं, उसे विषयों की समझ ही नहीं है। वह अध्यापक के सामने स्वयं को सिद्ध करने की हड़बड़ी में बहुत गड़बड़ी कर जाता है। भारत को समय लगा, परंतु देर से ही सही, राहुल गांधी को कितनी समझ है, उसने अब यह बख़ूबी जान और समझ लिया है। बराक ओबामा दुनिया को समझते हैं और राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने जो छाप छोड़ी है, वह निर्विवाद है। चाहे मनमोहन सिंह हों, सोनिया गांधी हों या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उन्होंने इनके व्यक्तित्व और कृतित्व का जो भी आकलन किया है, वह सच के बहुत निकट है। अब तो हम देख रहे हैं कि कांग्रेस के नेताओं ने भी बोलना शुरू कर दिया है, क्योंकि उनकी समझ में यह बात आ गई है कि अब भी नहीं बोले तो कांग्रेस समाप्त हो जाएगी।

अगर इसे 1885 में गठित कांग्रेस ही मानें तब इसकी आयु एक सौ पैंतीस वर्ष हो गई है। स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी एक भूमिका रही है। हालांकि ऐसा मानने वाले भी कम नहीं हैं कि यह वह कांग्रेस नहीं है, जिसका नेतृत्व दादाभाई नौरोजी, गोपालकृष्ण गोखले, मदनमोहन मालवीय, मोतीलाल नेहरू, लाला लाजपत राय, चितरंजन दास, अबुल कलाम आज़ाद, महात्मा गांधी, सरोजनी नायडु, जवाहरलाल नेहरू, वल्लभ भाई पटेल, राजेन्द्र प्रसाद, सुभाषचंद्र बोस, जेबी कृपलानी, पट्टाभि सीतारमैया, पुरुषोत्तम दास टंडन आदि ने किया था। इंदिरा गांधी के उद्भवकाल की बात करें तो उस समय भी इंदिरा गांधी, नीलम संजीव रेड्डी, के कामराज, एस निजलिंगपा, बाबू जनजीवन राम और शंकरदयाल शर्मा जैसे लोगों ने इसे नेतृत्व दिया। यह सही है कि 1885 में इसकी नींव एक अंग्रेज ने रखी, परंतु किसे कल्पना थी कि इसकी स्थापना के सौ वर्ष उपरांत एक विदेशी मूल की महिला सोनिया गांधी के रूप में अट्ठारह वर्ष से भी अधिक समय तक निरंतर इसकी अध्यक्ष बनी रहेंगी। पानी यदि एक स्थान पर ठहरा रहे तो उसमें बदबू आने लगती है। कीचड़ जमा हो जाता है। काई लग जाती है। तरह-तरह के जीव जंतु पैदा हो जाते हैं। वह पानी प्रयोग में लेने लायक नहीं रह जाता। यह सीधी सी बात कांग्रेसी नहीं समझ सके। सामने निरंतर परिवर्तनों के साथ भाजपा तेजी से उभर रही थी, उसे देखकर भी वो नहीं जागे। वहां शीर्ष से लेकर निचले स्तर तक परिवर्तन होते रहे।

भाजपा जन-जन में क्यों लोकप्रिय होती गई और कांग्रेस का ग्राफ क्यों निरंतर नीचे की ओर जाता रहा, यह समझने के लिए बहुत दिमाग खपाने की आवश्यकता नहीं है। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई अवसरों पर यह बात कही है। किसी भी संगठन, दल, संस्थान, गांव, जिले, प्रदेश, देश की प्रगति के साथ तीन अहम बातें जुड़ी होती हैं। नीति, नीयत और नेतृत्व। यदि नीतियां जनहित में बनी हैं। यदि नीयत सबसे कमजोर को महत्व देने की है और यदि नेतृत्व सक्षम है तो सही दिशा में तेजी से बढ़ने की संभावनाएं बलवती रहती हैं। इसके अलावा एक और महत्वपूर्ण तथ्य है प्राथमिकता। आप देश विदेश में देख लीजिए। अपने आस-पास देख लीजिए। यदि राष्ट्र से पहले परिवार और पार्टी अथवा संगठन को वरीयता देंगे तो वही होल होगा, जो वंशवाद परिवारवाद पर आधारित व्यवस्थाओं, संगठनों, दलों का होता है। केवल पीवी नरसिंहराव और मनमोहन सिंह के नाम लेकर यह तर्क देते रहने से लोग सहमत और संतुष्ट नहीं होंगे कि परिवार के बाहर के लोगों को भी परिवार ने शीर्ष पदों पर बैठने का अवसर दिया है। सब जानते हैं कि नरसिंहराव राजीव गांधी की अकस्मात्ा मृत्यु के कारण विवशता में प्रधानमंत्री बनाए गए थे और मनमोहन सिंह इस कारण बनाए गए क्योंकि राहुल गांधी न तब इस पद के लिए सक्षम थे और न अब हैं। बकौल बराक ओबामा, मनमोहन सिंह को सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री ही इसलिए बनाया क्योंकि भविष्य में वह राहुल के लिए खतरा नहीं थे। मनमोहन सिंह कैसे प्रधानमंत्री सिद्ध हुए, यह भी किसी से छिपा नहीं है। कमजोर और कठपुतली होने का गंभीर आरोप उन पर चस्पा हो गया। उनके प्रधानमंत्री काल में कई बड़े घोटाले होते रहे।

2011-12 से कांग्रेस का संकटकाल शुरू हुआ था। एक-एक कर उसने बहुत से राज्यों की सत्ता गंवा दी। 2014 का आम चुनाव ऐतिहासिक तरीक़ से हारा। स्वतंत्रता के उपरांत लोकसभा चुनाव में उसकी इतनी कम सीटें (44) कभी नहीं आई। 19 महीने के आपातकाल के उपरांत 1977 में हुए लोकसभा के छठे आम चुनाव में भी वह 154 सीटें जीतने में सफल हो गई थी। यह आश्चर्य का विषय था कि 2014 में मात्र 44 सीटें आने के उपरांत भी 10, जनपथ पर जैसे सवाल उठने चाहिए थे, नहीं उठे। जैसी मीमांसा होनी चाहिए थी, नहीं हुई। औपचारिकता के लिए एके एंटनी समिति बनी। उसकी संस्तुतियों पर कभी काम नहीं हुआ। उन्होंने कहा था कि कांग्रेस की छवि मुस्लिमपरस्त दल की बन गई है, परंतु अगले पांच वर्ष कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व पुनः पुनः वही गलती दोहराता रहा। इसका परिणाम उसे भुगतना पड़ा। पांच वर्षों में जितने राज्यों में चुनाव हुए, उनमें से कुछ को अपवाद स्वरूप छोड़ दें तो उसे पराजय ही मिली। उसने सत्ताएं गंवाई और 2019 में फिर ऐतिहासिक हार का सामना किया। 2014 में 44 सीटें तो 2019 में 54 सीटें। 2014 में तो फिर भी एंटनी समिति को हार के कारणों की समीक्षा करने और रिपोर्ट देने को कह दिया गया था। 2019 की करारी हार के बाद कुछ नहीं किया गया। बस, राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद छोड़ दिया। अब डेढ़ वर्ष उपरांत 10, जनपथ के मानसिक बंधक पुनः उन्हें ही अध्यक्ष पद पर लाने की मुहिम छेड़े हुए हैं।

सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा देश के समक्ष उपस्थित मुद्दों, प्राथमिकताओं, समस्याओं आदि की समझ को लेकर एक्सपोज हो चुके हैं। राहुल गांधी की सुई कई वर्ष से एक ही स्थान पर अटकी हुई है। वह भाषणों में और ट्वीटर पर जो कहते हैं, उस पर भी लोग भरोसा नहीं कर रहे। अब कांग्रेस के केन्द्रीय नेताओं ने भी साहस जुटाकर उनकी नेतृत्व क्षमता पर प्रश्न खड़े करने शुरू कर दिए हैं। बिहार के विधानसभा चुनाव और मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक से लेकर मणिपुर तक के उपचुनाव परिणामों ने राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा पर हमले का अवसर मुहैया करा दिया है। देश और पार्टी पर परिवार को महत्व देने वाली टोली फिर से 10, जनपथ के बचाव में सामने आकर ऐसे नेताओं को पार्टी छोड़ देने की सलाह दे रहे हैं, जो नेतृत्व में परिवर्तन चाहते हैं। लगता नहीं कि आत्महत्या पर उतारू कांग्रेस को ऐसा करने से वह रोक पाएंगे। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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