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एनपीए विश्लेषण / तीन महीने से घाटे में चल रहे हैं भारतीय बैंक

तीन महीनों से घाटे में चल रहे बैंकों के प्रमुख दावा कर रहे थे कि चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही तक वे मुनाफे में आ जाएंगे, लेकिन सरकारी बैंकों के लिए चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही का परिणाम मिला-जुला रहा। कुछ सरकारी बैंक दूसरी तिमाही में मुनाफे आ गए तो कुछ अभी भी घाटे में हैं। भारतीय स्टेट बैंक ने दूसरी तिमाही में 945 करोड़ रूपये का मुनाफा अर्जित किया।

एनपीए विश्लेषण / तीन महीने से घाटे में चल रहे हैं भारतीय बैंक
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तीन महीनों से घाटे में चल रहे बैंकों के प्रमुख दावा कर रहे थे कि चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही तक वे मुनाफे में आ जाएंगे, लेकिन सरकारी बैंकों के लिए चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही का परिणाम मिला-जुला रहा। कुछ सरकारी बैंक दूसरी तिमाही में मुनाफे आ गए तो कुछ अभी भी घाटे में हैं। भारतीय स्टेट बैंक ने दूसरी तिमाही में 945 करोड़ रूपये का मुनाफा अर्जित किया।

केनरा बैंक भी दूसरी तिमाही में 300 करोड़ रुपये का मुनाफा अर्जित करने में सफल रहा। हालांकि, बैंक ने इस अवधि में 1700 करोड़ रुपये की वसूली की, लेकिन इस राशि का अधिकांश हिस्सा फंसे कर्ज के लिए किए गए प्रावधान में चला गया। अन्यथा बैंक की मुनाफा राशि ज्यादा होती। बैंक ऑफ बड़ौदा ने भी दूसरी तिमाही में बेहतर प्रदर्शन किया, जिससे इसके विलय की राह आसान हुई है।

इधर, घाटे में रहने के बावजूद बैंक ऑफ इंडिया दूसरी तिमाही में फंसे कर्ज की उल्लेखनीय वसूली करने में सफल रहा। दूसरी तिमाही में पंजाब नेशनल बैंक को भले ही 4,532 करोड़ रुपये का घाटा हुआ, लेकिन यह फंसे कर्ज की बड़ी राशि वसूल करने में सफल रहा है। अपितु, फंसा कर्ज ज्यादा होने के कारण यह घाटे के दुष्चक्र से बाहर नहीं निकल सका। वैसे, बैंक का दावा है कि वह जल्द ही मुनाफे में आ जाएगा।

ज्ञात हो कि विगत महीनों में हीरा कारोबारी नीरव मोदी ने पंजाब नेशनल बैंक को 13,000 करोड़ रुपये का चूना लगाया था, जिसकी भरपाई अभी तक नहीं हो सकी है। फर्जीवाड़े के कारण बैंक को कुल 14,356 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है और समग्रता में बैंक को कुल 18,889 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है। वित्त वर्ष 2019 की दूसरी तिमाही में सिंडीकेट बैंक को 2,825 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है,

जबकि पिछले साल समान अवधि में इसे 158 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था। विगत दो तिमाहियों में सिंडीकेट बैंक ने फंसे कर्ज के लिए 3,953 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। देना बैंक को इस अवधि में 416 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है, जो पिछले साल के मुकाबले दोगुना है। दूसरी तिमाही में इंडियन ओवरसीज बैंक को 487 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है।

देखा जाए तो भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा एनपीए के नियमों को ज्यादा कठोर बनाने के बाद फंसे कर्ज का मर्ज और भी ज्यादा बढ़ गया है। नए नियमों की वजह से फंसे कर्ज की राशि में भारी बढ़ोतरी हुई है। रिजर्व बैंक के नियमों के अनुसार बैंकों को एक वर्ग में वर्गीकृत सभी खातों को एकसमान दृष्टि से देखना चाहिए।

इसके अलावा यदि ऋणी का एक खाता एनपीए है तो उसका दूसरा खाता स्टैंडर्ड होने के बावजूद फंसा हुआ कर्ज माना जाएगा। दिवालिया कानून को अस्तित्व में आए हालांकि अनेक महीने बीत गए हैं, लेकिन अभी तक मामले में अपेक्षित परिणाम नहीं निकल सका है। हां, इसके प्रावधानों से फंसे कर्ज में बढ़ोतरी की संभावना जरूर बढ़ गई है।

उदाहरण के तौर पर दिवालिया कानून के तहत अगर बैंक 2,000 करोड़ रुपये और इससे अधिक के कर्जदारों के लिए समाधान योजना लागू करने में समर्थ नहीं हो पाता है तो ऐसे मामलों को ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता के तहत राष्ट्रीय कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल के पास भेजे जाने का प्रावधान है, जिससे अनेक खाते फंसे हुए कर्ज में तब्दील हो जाएंगे।

रिजर्व बैंक द्वारा जारी चूककर्ता कंपनियों की दूसरी सूची में अधिकांश ऐसे ही चूककर्ता कंपनियां हैं। बढ़ते फंसे कर्ज के समाधान हेतु सरकार ने सरकारी बैंकों के लिए 2.11 लाख करोड़ रुपये पुनर्पंूजीकरण पैकेज घोषित किया है। कुल राशि में 18,000 करोड़ रुपये बजट से दिए जाएंगे, 58,000 करोड़ रुपये बाजार से इक्विटी के रूप में जुटाए जाएंगे और 1.35 लाख करोड़ रुपये सरकार द्वारा पुनर्पंूजीकरण बॉन्ड के रूप में उपलब्ध कराए जाएंगे।

इस प्रक्रिया को दो सालों में पूरा किया जाएगा। माना जा रहा है कि पुनर्पंूजीकरण पैकेज से कमजोर बैंक वैश्विक पूंजी पर्याप्तता के मानक का अनुपालन कर सकेंगे। साथ ही, बैंकों को नियामकीय जरूरतें पूरा करने में मदद मिलेगी। हालांकि, सरकार द्वारा दी जा रही राहत राशि को पर्याप्त नहीं माना जा सकता है, क्योंकि 31 मार्च, 2018 तक बैंकों का फंसा कर्ज बढ़कर 10 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया है।

बैंकों की प्रणाली को सशक्त बनाने के लिए ऋणदाताओं के समूह के आकार को भी छोटा किए जाने का प्रस्ताव है। अभी ऋणदाताओं के समूह में 20 से 22 वित्तीय संस्थान शामिल होते हैं, जिसे कम करके 7 से 8 किए जाने का प्रस्ताव है, ताकि ऋणी के खातों पर बारीकी से निगरानी रखी जा सके। रिजर्व बैंक की वर्ष 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय बैंकों का फंसा कर्ज कुल अग्रिम का 12.1 प्रतिशत था।

31 मार्च 2018 तक बढ़कर 10.25 लाख करोड़ रुपये हो गया। वित्त वर्ष 2018 में ही केवल इसमें 3.13 लाख करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई। 31 मार्च, 2018 में यह कर्ज 8.97 लाख करोड़ रुपये था, जिसमें भारतीय स्टेट बैंक का हिस्सा 2.23 लाख करोड़ रुपये का था। पंजाब नेशनल बैंक 86,620 करोड़ रुपये के फंसे कर्ज के साथ मामले में दूसरे स्थान पर था,

जबकि निजी बैंकों में एक्सिस बैंक का 34,249 करोड़ रुपये, जबकि आईसीआईसीआई बैंक का फंसा कर्ज 54,063 करोड़ रुपये था। बीते सालों में बैंकों के बीच बिजनेस बढ़ाने के लिए जबर्दस्त प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। बैंकों की संख्या बढ़ने से बिजनेस के अवसर कम हुए हैं। वित्तीय समावेशन की संकल्पना को साकार करने के लिए सरकार की कोशिश हर व्यक्ति को बैंकों से जोड़ने की है,

इसलिए हर साल बड़ी संख्या में बैंकों की शाखाएं खोली जा रही हैं। ग्राहक सेवा केंद्र, भुगतान व छोटे बैंकों के अस्तित्व में आने के बाद से बैंककर्मियों के बीच बिजनेस के लिए संघर्ष में इजाफा हुआ है। प्रबंधन चाहता है कि उनके बिजनेस में तेजी से बढ़ोतरी हो। इसके लिए प्रबंधकों को ऐसे लक्ष्य दिये जा रहे हैं, जिसे पूरा करना आसान नहीं होता है।

दबाव में ऋण प्रस्तावों के विश्लेषण में गलतियां होती हैं, जिससे कर्ज के फंसने की संभावना बढ़ जाती है। कर्ज वसूली में बैंक कर्मचारी असहाय हैं। बैंक चूककर्ताओं के खिलाफ सर्टिफिकेट केस करते हैं। वाद दाखिल होने के बाद अदालत को चूककर्ता के खिलाफ कुर्की-जब्ती का वारंट निकालना होता है, जिसे आमतौर पर बिना पैरवी या रिश्वत के जारी नहीं किया जाता है।

चूककर्ता के चल या अचल संपत्ति की कुर्की-जब्ती या उन्हें गिरफ्तार कराना बैंक अधिकारियों के लिए आसान नहीं होता है, क्योंकि इसके लिए बैंक बहुत हद तक दूसरी एजेंसियों या विभागों पर निर्भर हैं। अगर किसी तरह से बैंक अधिकारी वारंट निकलवा भी देता है तो पुलिस मामले को रफा-दफा कर देती है।

अमूमन कार्पोरेट्स से उम्मीद की जाती है कि वे आर्थिक सुधार की बुनियाद तैयार करेंगे, लेकिन आजकल अधिकांश कार्पोरेट्स जानबूझ करके बैंकों का कर्ज नहीं लौटा रहे हैं। कर्ज के फंसने के कारण बैंक पूंजी की कमी से जूझ रहे हैं। फंसे कर्ज की मौजूदा स्थिति भले ही भयावह है, फिर भी यह नहीं कहा जा सकता है कि फंसे कर्ज की समस्या एक लाइलाज बीमारी है।

चालू वित्त वर्ष में जिस तरह से कुछ सरकारी बैंकों ने फंसे कर्ज में कमी लाने में सफलता पाई है से मामले में उम्मीद जगती है। कुछ महत्वपूर्ण उपायों जैसे, फंसे कर्ज का प्रबंधन, बैंककर्मियों में जागरूकता लाने, कर्मचारियों के प्रशिक्षण की व्यवस्था, उन्हें प्रोत्साहित करने, कर्ज वितरण हेतु मानव संसाधन पर अनावश्यक दबाव बनाने से बचने, बीमा उत्पादों को बेचना बंद करने,

परिपत्रों के निदेशों का अनुपालन करने, दूसरी एजेंसियों के साथ तालमेल बनाने, धोखाधड़ी पर लगाम लगाने, फंसे कर्ज और धोखाधड़ी के डेटाबेस को मजबूत करने, बैंकों द्वारा फंसे कर्ज से संबंधित सूचनाओं को आपस में साझा करने, राजनीतिक हस्तक्षेप से परहेज, चूककर्ता बड़े कारोबारियों पर सरकार द्वारा शिकंजा कसने आदि से सकारात्मक परिणाम निकल सकते हैं। ऐसे ही उपायों से चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में भारतीय स्टेट बैंक, केनरा बैंक, बैंक ऑफ इंडिया ने फंसे कर्ज कम करने में उल्लेखनीय सफलता पाई है।

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