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सभ्यता का अर्थ अब केवल लूटखसोट

युवा अंगरेज कवि जॉन कीट्स ने अपनी सुप्रसिद्ध कविता का शीर्षक लिखा ‘धरती की कविता कभी नहीं मरती।‘

सभ्यता का अर्थ अब केवल लूटखसोट
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धरती अब भी घूम रही है' शीर्षक प्रसिद्ध गांधीवादी लेखक विष्णु प्रभाकर की मर्मस्पर्शी कहानी का है। उसकी कथा एक निजी जीवन की करुणा और वेदना को इतना उभारती है। शर्म और ग्लानि के थपेड़े पाठक के दिमाग पर पड़ते हैं।

युवा अंगरेज कवि जॉन कीट्स ने अपनी सुप्रसिद्ध कविता का शीर्षक लिखा ‘धरती की कविता कभी नहीं मरती।‘ उसका संदर्भ पूरी तौर पर एक रूमानी किस्म के फलसफे के साथ जुड़ता है।

संदेश गहरा है। धरती के चुंबकत्व से हर मनुष्य लोहे का कण बना जुड़ता रहता है। वही धरती सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक जीवन में जहर की पुड़िया बनाई जा रही है।

धरती पर इंसानी बसाहट का इतिहास में कोई समयसिद्ध लेखाजोखा नहीं है। सब कुछ कुदरत और वक्त के सहारे होता चला गया। सभ्यताएं बसीं। देश बने। राजेरजवाड़ों ने हुकूमत की। आदिवासी जंगलों में छुपे।

दलितों के साथ जानवरों जैसा सुलूक किया जाता रहा। धरती अपने असंतुलित संतुलन में वक्त के बियाबान में अब भी जी रही है। सभ्यता का अर्थ अब केवल लूटखसोट के अर्थ में ज्यादा समझा जाता है।

रेलें चलानी हों। सड़कें बनानी हों। कारखाने लगाने हों। उद्योग बसाने हों। खेलकुंभ का शिगूफा हो। जंगल हो। हर इंसानी जरूरत के लिए धरती की बुनियाद जरूरी है। जंगलों में छुपे पशु पक्षी और आदिवासी हैं।

उन्हें लूटखसोट की सभ्यता से कुछ लेना देना नहीं रहा। सभ्यों की लूटखसोट की जीभ सांप की जीभ की तरह लपलपाती रहती है। सभ्य आदमी का जहर असभ्य आदमी के जीवन में चढ़ जाने से उसका जीवन ही विकलांग हो जाता है।

अपनी मर्मांतक कविता में प्रसिद्ध कवि सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय‘ ने जहरीले नाग को संबोधित कर यही तो कहा था कि यदि वह शहर और सभ्यता के साथ नहीं रहा तो उसने काटना कहां से सीखा। विष कहां से पाया।

धरती के जिस्म को बोटी बोटी में काटना सभ्यता की नफासत का एक और लक्षण है। धरती अब मनुष्यों के अस्तित्व का संकट बनाई जा रही है। वह कमजोर का बिस्तर, पालना या गोद नहीं रही।

कारपोरेटिए हजारों एकड़ जमीन अपने उद्योगों के लिए निगल रहे हैं। जैसे अजगर छोटे सांप, कीड़े मकोड़ों और मेढ़कों को आसानी से निगल जाते है। सरकारें कारपोरेटियों के दरवाजे पर उनकी लालच से कमीशन लेती खड़ी रहती हैं।

कभी जमाना था। हिदुस्तान में बेशुमार जंगल थे। मिथकों, कथानकों, महाकाव्यों, उपनिषदों वगैरह का आंगन जंगल की धरती रही है। वह सब तेजी से नष्ट हो रहा है। प्रदूषण, रसायन, विध्वंस और जहर फैलाने वाले कारखाने धरती का बलात्कार कर रहे हैं।

लालच की इंतिहा नहीं है। हिमालय से गंगा और यमुना जैसी सदियों पुरानी सांस्कृतिक नदियां निकली हैं। उनके दोनों किनारों पर रसायन, चमड़े और अन्य बेशुमार उद्योग लग गए हैं।

केदार घाटी का भयावह हादसा उसी कारण भी हुआ। पहाड़ काटे जा रहे हैं। जंगल उजाड़े जा रहे हैं। नदियों का पानी तक एक पूर्व केंद्रीय मंत्री ने बंधक बना लिया था। उन पर सुप्रीम कोर्ट ने पचास लाख रुपये का जुर्माना लगाया।

विशेष आर्थिक क्षेत्र के नाम पर अंबानी, अदानी, टाटा, अनिल अग्रवाल जैसे कई उद्योगपतिों को हजारों एकड़ जमीन औने पौने दामों में आवंटित होती जा रही है। वे कारखाना लगाएं या न लगाएं। वह धरती उनकी पूंजीवादी हविश के लिए बंधक हो रही है।

बाबा रामदेव योग की भौतिक शिक्षा व्यायाम शिक्षक की तरह देते देते हजारों करोड़ रुपयों की मिल्कियत के मालिक बन बैठे। स्वदेशी का प्रचार करने की आड़ में स्वदेश की बहुत सी जमीन औने पौने हथियाए जा रहे हैं। नए नगर बस रहे हैं।

नई राजधानियां चमचमा रही हैं। बच्चा बच्चा जानता है विधायक बने नगरसेठों ने मौके की सब जमीनें अपने नजदीकी लोगों के नाम रजिस्टरी करा हथिया ली हैं। ये औद्योगिक जमींदार बन गए हैं। हजारों एकड़ जमीन अय्याशियों के लिए गरीब किसानों और आदिवासियों से जबरिया हथियाई जा रही है।

कुछ जमीन गोल्फ मैदान बनाने के लिए छत्तीसगढ़ के रायपुर में किसानों से हथिया ली गई है। उद्योगपति अपनी काली कमाई को सफेद करने के लिए बड़े बड़े खेतीघर और फार्म हाउस बनाते हैं। भूतल में गहराई में खुदाई कर ट्यूबवेल लगाते हैं।

आसपास के किसानों के खेतों में जल स्तर गिर जाने से सूखा पड़ने लगता है। देश इसी तरह विकास कर रहा है। महाभारत की लड़ाई इस बात पर हुई थी। कौरव दुर्योधन ने कहा था कि पांडवों के मांगने पर पांच गांव तो क्या एक तिल के बराबर भी जमीन नहीं देगा।

बस धरती ने चुटकी बजाई। साम्राज्य उजड़ गए। भारत पाक सरहद या दो देशों के बीच एक एक इंच जमीन की रक्षा के लिए गरीब सिपाही फना होते रहते हैं। अमीरों के उद्योग धरती पर बेजा कब्जा करते हैं। जनविश्वास के आधार पर बनने वाले मंदिरों, मस्जिदों और गिरजाघरों को कभी भी हटाया जाता है।

अकबर के सेनापति राजा मानसिंह ने अटक नदी को पार करते सैनिकों के डर को देखकर दोहा बनाया। ‘सबै भूमि गोपाल की यामे अटक कहां। जाके मन में अटक है सो अटक यहां।‘ यहूदियों का देश इजराइल खुद को पुण्य भूमि का वंशज मानता है।

फिलिस्तीन की लड़ाई 1948 में अपने मुकाम पर पहुंची। उसके पहले सैकड़ों बरस तक यहूदी अरब आक्रमण के कारण दुनिया के कई देशों में फैल गए थे। इस कौम ने महान आर्थिक विचारक कार्ल मार्क्स, मनोवैज्ञानिक सिगमण्ड फ्रायड, दाशनिक फ्रेडरिक नीत्शे और आसाधारण वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन पैदा किए हैं।

यहूदी अपने प्रार्थना गृहों सिनेगाॅग में यही प्रार्थना करते रहे। ‘ऐ पवित्र यरूशलम की धरती जिस दिन तेरा ख्याल मेरे जेहन से निकल जाए उस दिन मेरा यह दायां हाथ गलकर गिर जाए।‘ पवित्र हिन्दू विश्वास ने धरती को मां का दर्जा दिया है। जन्म देने वाली मां के साथ धरती को स्वर्ग से भी ज्यादा श्रेष्ठ मानते हैं।

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