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संपादकीय लेख : कोविड के टीके के बाद अब स्वदेशी दवा 2डीजी

इस वक्त देश जहां मेडिकल ऑक्सीजन की कमी से जूझ रहा है, वहीं अस्पताल में मरीजों के लिए बेड की भी किल्लत हो रही है। ऐसे में ये दवा इन दोनों ही समस्याओं से निपटने में मददगार साबित हो सकती है।

संपादकीय लेख : कोविड के टीके के बाद अब स्वदेशी दवा 2डीजी
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संपादकीय लेख

Haribhoomi Editorial : भारत ने दो स्वदेशी वैक्सीन बनाने के बाद कोरोना की स्वदेशी दवा बना कर कोरोना से जंग में एक और कामयाबी हासिल कर ली है। डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ) ने एंटी कोविड-19 ड्रग 2डीजी बनाई है, जिसे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डा. हर्षवर्धन के हाथों आपात प्रयोग के लिए लांच किया गया है। डीआरडीओ का दावा है कि यह दवा कोरोना वायरस से संक्रमित कोशिकाओं पर सीधा काम करेगी, शरीर का इम्यून सिस्टम काम करेगा और मरीज जल्दी ठीक होगा। इसे मरीज के वजन और डॉक्टर के प्रिसक्रिप्शन के आधार पर कम से कम 5-7 दिन सुबह-शाम 2 डोज लेनी है।

यह दवा एक पाउडर के रूप में है, जिसे पानी में धोलकर दी जा सकता है। लांच के बाद डीआरडीओ प्रमुख जी. सतीश रेड्डी ने बताया कि अभी सप्ताह में 10,000 के आस-पास कुल उत्पादन होगा। अभी एम्स, एएफएमएस और डीआरडीओ अस्पतालों में दे रहे हैं। बाकी राज्यों को अगले चरण में देंगे। अभी थोड़ी देरी है। जून के पहले हफ्ते से सभी जगहों पर 2डीजी दवा उपलब्ध होगी। इस दवा को डीआरडीओ के इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर मेडिसिन एंड अलाइड साइंसेस (इनमास) ने डॉ. रेड्डीज लैबोरेट्रीज के साथ मिलकर बनाया है। क्लीनिकल रिसर्च के दौरान 2-डीजी दवा के मरीजों पर रिजल्ट अच्छे रहे। जिन मरीजों को दवा दी गई थी, उनमें तेजी से रिकवरी देखी गई। इसी आधार पर ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया ने इस दवा के इमरजेंसी इस्तेमाल को मंजूरी दी है। कहा जा रहा है कि कोरोना के इलाज में 2-डीजी दवा भारत में गेमचेंजर साबित हो सकती है। वह इसलिए कि यह दवा मरीजों की ऑक्सीजन पर निर्भरता कम होगी, साथ ही उन्हें ठीक होने में 2-3 दिन कम लगेंगे। मतलब अस्पताल से मरीजों की जल्द छुट्टी हो सकेगी।

इस वक्त देश जहां मेडिकल ऑक्सीजन की कमी से जूझ रहा है, वहीं अस्पताल में मरीजों के लिए बेड की भी किल्लत हो रही है। ऐसे में ये दवा इन दोनों ही समस्याओं से निपटने में मददगार साबित हो सकती है। दरअसल, यह दवा ग्लूकोज का ही एक सब्सटिट्यूट है। यह संरचनात्मक रूप से ग्लूकोज की तरह है, लेकिन असल में उससे अलग है। कोरोना वायरस अपनी एनर्जी के लिए मरीज के शरीर से ग्लूकोज लेते हैं, यह दवा केवल संक्रमित कोशिकाओं में जमा हो जाती है। कोरोना वायरस ग्लूकोज के धोखे में इस दवा का इस्तेमाल करने लगते हैं। इस तरह वायरस को एनर्जी मिलनी बंद हो जाती है और उनका वायरल सिंथेसिस बंद हो जाता है। यानी नए वायरस बनना बंद जाते हैं और बाकी वायरस भी मर जाते हैं। चूंकि यह केवल संक्रमित कोशिका में भर जाती है, इसके इस गुण के चलते केवल कैंसर-ग्रस्त कोशिकाओं को मारने की सोच से यह दवा तैयार की जा रही थी। इस दवा का इस्तेमाल कैंसर-ग्रस्त कोशिकाओं को सटीक कीमोथेरेपी देने के लिए भी करने की तैयारी है। यह दवा ग्लूकोज एनेलॉग है, यानी यह ऐसा ग्लूकोज है जो प्राकृतिक रूप से मिलने वाले ग्लूकोज की तरह है, लेकिन उसे सिंथेटिक तरीके से बनाया जाता है। इसका उत्पादन करना भी आसान है। यह दवा जेनेरिक मॉलिक्यूल यानी ऐसे केमिकल से बनी है जो जेनेरिक है, तो यह सस्ती रहनी चाहिए। भारत के लिए जरूरी भी है कि जीवनरक्षक दवा सस्ती दरों पर उपलब्ध रहे। इस दवा के आने से रेडमेसिविर जैसी दवाओं पर भारत की निर्भरता कम होगी। इसके साथ विश्व को भारत की इस खोज का फायदा होगा। एकबार फिर भारत के पास दो-दो टीके की तरह एक प्रभावी दवा होगा, देखना है विश्व स्वास्थ्य संगठन का कितना समर्थन मिलता है।

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