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अवधेश कुमार का लेख : जिद में रास्ता नहीं निकल सकता

जब हम किसी बातचीत में शामिल होते हैं तो लोकतांत्रिकता का तकाजा है कि उसमें जिद, नहीं होनी चाहिए। तीनों कृषि कानून एक दिन में पैदा नहीं हुए। अगर कृषि कानूनों में दोष या कमी है तो उनमें परिवर्तन, संशोधन की बात समझ में आती है। उच्चतम न्यायालय की समिति भी समीक्षा करेगी। इसमें यह जिद कि जब तक आप कानून वापस नहीं करेंगे हम अपना आंदोलन जारी रखेंगे वास्तव में आर-पार के युद्ध का स्वर सुनाई देता है। यह लोकतांत्रिक आंदोलनकारियों की भाषा नहीं है। यह कहना उचित नहीं होगा कि सरकार की ओर से आंदोलनरत संगठनों को मनाने की कोशिश नहीं की गई। आंदोलन में दोनों पक्ष पीछे हटते हैं तभी समझौता होता है।

अवधेश कुमार का लेख : जिद में रास्ता नहीं निकल सकता
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किसान आंदोलन

अवधेश कुमार

उच्चतम न्यायालय ने भले कृषि कानूनों के लागू होने पर अगले आदेश तक रोक लगाने के साथ इसकी समीक्षा के लिए समिति का गठन कर दिया है, लेकिन इससे आंदोलन खत्म हो जाएगा ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है। न्यायालय ने भी आंदोलन पर कोई आदेश नहीं दिया है। वास्तव में कृषि कानूनों के विरोध में चल रहा आंदोलन ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है जहां से अनुमान लगाना कठिन है कि आगे क्या होगा।

आठवें दौर की बातचीत में सरकार की ओर से वार्ता में शामिल 40 संगठनों के नेताओं से तीन बातें कहीं गई। एक, आप लोग कृषि कानून के विरोध में हैं, लेकिन काफी लोग समर्थन में हैं। दो, आप देश हित का ध्यान रखकर निर्णय करिए और तीसरी, आपके पास कानूनों की वापसी का कोई वैकल्पिक प्रस्ताव हो तो उसे लेकर आइए जिस पर बातचीत की जा सके। अगर आप इन तीनों बिंदुओं का गहराई से विश्लेषण करें तो बातचीत में सरकार की ओर से कुछ बातें पहली बार साफ कही गई हैं। देश में कृषि कानूनों का समर्थन है और आप देश हित का ध्यान रखते हुए निर्णय करें इसका मतलब यह है कि आपका विरोध देश हित में नहीं है। दूसरे, आपका विरोध क्षेत्रीय स्तर पर है और हमें पूरे देश का ध्यान रखना है। बातचीत के बाद कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा भी कि हमने उनसे वैकल्पिक प्रस्ताव की बात की थी...कोई वैकल्पिक प्रस्ताव आया नहीं इसलिए चर्चा हुई नहीं। उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय के फैसले का सम्मान करना हम सबका दायित्व है। प्रश्न है कि अब आगे होगा?

आंदोलनरत लोग साफ कह रहे हैं कि उन्हें कृषि कानूनों की वापसी के अलावा कुछ भी स्वीकार नहीं। वार्ता में ही एक प्रतिनिधि ने जीतेंगे या मरेंगे का प्लेकार्ड उठा लिया। देखा जाए तो सरकार और आंदोलनकारी इस मामले पर पहले दिन से ही दो ध्रुवों पर हैं। आंदोलन की शुरुआत के साथ ही सरकार ने साफ कर दिया था कि वह कृषि कानूनों को वापस नहीं लेगी। वैसे देश में एक बड़े वर्ग का मानना है कि यह किसानों का आंदोलन नहीं है। इसमें किसान जरूर हैं, लेकिन उनको भ्रमित करके, मन में डर बिठाकर, गलतफहमी पैदा करके भड़काया गया है। आंदोलन का सूत्र ऐसे लोगों के हाथों आ गया है जो किसी सूरत में समझौता होने नहीं देंगे। यही लोग उच्चतम न्यायालय के आदेश से प्रभावित नहीं होने का भी माहौल बना रहे थे। जब हम किसी बातचीत में शामिल होते हैं तो लोकतांत्रिकता का तकाजा है कि उसमें जिद, आग्रह, दुराग्रह, पूर्वाग्रह आदि नहीं होना चाहिए। दुर्भाग्य से इसमें ये सारे नकारात्मक तत्व शामिल हैं।

तीनों कृषि कानून एक दिन में पैदा नहीं हुए। अगर कृषि कानूनों में दोष या कमी है तो उनमें परिवर्तन, संशोधन की बात समझ में आती है। उच्चतम न्यायालय की समिति भी समीक्षा करेगी। इसमें यह जिद कि जब तक आप कानून वापस नहीं करेंगे हम अपना आंदोलन जारी रखेंगे वास्तव में आर-पार के युद्ध का स्वर सुनाई देता है। यह लोकतांत्रिक आंदोलनकारियों की भाषा नहीं है। यह कहना उचित नहीं होगा कि सरकार की ओर से आंदोलनरत संगठनों को मनाने की कोशिश नहीं की गई। आंदोलन में दोनों पक्ष पीछे हटते हैं तभी समझौता होता है। सरकार ने अपने प्रस्तावों में कई मांगों को संशोधन में शामिल करने की बात कह कर पीछे हटने का संकेत दिया। न्यायालय के आदेश के पूर्व ही यह प्रस्ताव दिया कि विशेषज्ञों सहित किसान संगठनों एवं अन्यों की समिति बना दी जाए। आंदोलनकारी कह रहे हैं कि हमको समिति नहीं चाहिए। तो क्या चाहिए? उनका स्टैंड ये भी है कि हमको इसमें सुप्रीम कोर्ट का दखल भी नहीं चाहिए। कुछ संगठनों के नेताओं का बयान है कि हम तो सुप्रीम कोर्ट गए नहीं थे तो आंदोलन क्यों खत्म करें। सुप्रीम कोर्ट से क्या समस्या हो सकती है? लेकिन है तो कारण समझना होगा।

ऐसा लगता है कि इस आंदोलन में प्रकट और परोक्ष रूप से जो गैर कृषि शक्तियां राजनीतिक मंसूबों के साथ भूमिका निभा रही हैं उन्होंने यह माहौल बनाया है कि हम उच्चतम न्यायालय गए तो लड़ाई हार जाएंगे। इनमें कई कानूनविद हैं, कृषि मामलों के जानकार हैं। उनके सामने यह साफ है कि इन कानूनों में ऐसा कुछ नहीं है जिससे उच्चतम न्यायालय निरस्त करने का आदेश दे। ये तत्व गैरकानूनी तरीके से किए गए आंदोलनों पर उच्चतम न्यायालय की टिप्पणियों से भी आशंकित रहे हैं। इसमें दो राय नहीं कि वामपंथी दल, कांग्रेस, राकांपा, अकाली दल, सपा, राजद आदि विरोधी दल तथा मोदी और भाजपा विरोध से भरे गैर दलीय संगठन व एक्टिविस्ट आंदोलन को मोदी विरोधी राजनीति के बलवती होने का अवसर मानकर हरसंभव भूमिका निभा रहे हैं। आंदोलनरत संगठनों का स्टैंड तो यही है कि हमें किसी राजनीतिक दल का साथ नहीं चाहिए, लेकिन प्रच्छन्न रूप में सब कुछ चल रहा है। मीडिया रिपोर्टों में सच्चाई लगातार सामने आई है। सरकार के भी अपने खुफिया सूत्र हैं। अगर उसे मालूम है कि कृषि कानूनों को हथियार बनाकर हमारे विरोधी हमको दबाव में लाने तथा अशांति और अस्थिरता पैदा करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं तो वह इनके सामने क्यों झुकेगी।

यह दुर्भाग्य है कि कृषि और किसानों से संबंधित अनेक मुद्दों को लेकर रचना और संघर्ष दोनों स्तरों पर काम करने की जरूरत है। आप धरातल पर कृषि सुधारों के लिए निर्माण का सकारात्मक अभियान चलाएं, जहां सरकारी बाधाएं हैं उनके लिए संघर्ष करें। इस आंदोलन में वे वास्तविक मुद्दे गायब हैं। इनमें कई संगठन ऐसे हैं जिन्होंने कानून सामने आने पर समर्थन किया था। योजनापूर्वक ऐसा माहौल बनाया गया कि वे सब दबाव में आकर विरोध करने लगे। आंदोलन आगे बढ़ने के साथ ही कई संगठनों को लगा कि सामने भले चेहरा उनका है पीछे से हथियार चलाने वाले ऐसे दूसरे भी हैं जो इसमें सरकार के साथ समझौता नहीं होने दे रहे। लेकिन माहौल का दबाव ऐसा है जिसमें अगर वे पीछे हटे तो वे हाशिए में फेंक दिए जाएंगे। ऐसी स्थिति में न किसी की मध्यस्थता संभव है और न ही बीच का रास्ता। कायदे सेे सड़क घेरने के विरुद्ध कार्यवाही होनी चाहिए। आंदोलन के लिए उनको निरंकारी मैदान दिया गया था। इनके खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई जिसका कुछ अर्थ तो हैै।

दूसरी ओर विरोधियों की रणनीति से साफ है कि वे ऐसे हालात पैदा करना चाहते हैं जिसमें अंततः प्रशासन को मजबूर होकर बल प्रयोग करना पड़े, हिंसा में कुछ लोग हताहत हों और फिर मोदी सरकार के विरुद्ध माहौल की जमीन तैयार हो। उच्चतम न्यायालय के आदेश पर आंदोलन स्थगित करते ही उनकी रणनीति विफल हो जाएगी। इसमें आंदोलनरत संगठनों और किसान नेताओं में जो भी दल निरपेक्ष हैं उनको साहस के साथ आगे आना चाहिए। वास्तविक किसान संगठन सरकार के अंध विरोधियों का साथ छोड़ें तो रास्ता निकल जाएगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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