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खेल को खेल ही रहने दें इसमें साजिश नहीं घोलें

कुश्ती संघ ने साई कैम्प की एक महिला पर नरसिंह यादव के खाने में कुछ मिलाने का शक जताया है

खेल को खेल ही रहने दें इसमें साजिश नहीं घोलें
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रियो ओलंपिक से महज दस दिन पहले सामने आए रेसलर नरसिंह यादव डोप टेस्ट विवाद पर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संज्ञान लेना इस मामले की गंभीरता को दर्शाता है। भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष ब्रजभूषण यादव ने प्रधानमंत्री को ताजा अपडेट से अवगत कराया। पीएम ने कुश्ती संघ से रिपोर्ट मांगी है। कुश्ती के 74 किलो वर्ग में भारत की ओर से रियो के लिए नरसिंह यादव का चयन हुआ था। कुश्ती संघ ने माना है कि नरसिंह के खिलाफ साजिश हुई है।
नरसिंह के रूममेट रेसलर संदीप तुलसी यादव भी डोप टेस्ट में फेल हो गए हैं। दोनों के टेस्ट में एक ही प्रतिबंधित केमिकल स्टेरायड मिले हैं। इससे संदेह को हवा मिलती है। कुश्ती संघ ने जिस तरह सोनीपत स्थित स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (साई) कैम्प की एक महिला पर नरसिंह यादव के खाने में कुछ मिलाने का शक जताया है और रेसलर सुशील कुमार ने ट्विटर पर नरसिंह यादव पर ताना मारा है, उससे इस पूरे मामले में साजिश की बू आ रही है। नरसिंह ने सीबीआई जांच की मांग की है। सरकार भी नाडा पैनल की जांच रिपोर्ट का इंतजार कर रही है।
नरसिंह डोप विवाद में सच क्या है, इसका पता जांच से ही लगेगा। बुधवार को नाडा की अंतिम सुनवाई है। उसके बाद पता चल जाएगा कि नरसिंह रियो जा पाते हैं या नहीं? लेकिन इस विवाद में नरसिंह को लेकर सुशील कुमार की 'टिप्पणी' निश्चित ही उनके गरिमा के अनुरूप नहीं है। सुशील ने विवाद सामने आने के बाद ट्वीट कर जिस तरह कहा कि 'सम्मान उनके लिए होता है, जो इसके हकदार होते हैं, न कि उसके लिए जो इसकी मांग करते हैं।' सुशील खुद तीन बार ओलंपिक में हिस्सा ले चुके हैं, दो बार मेडल जीत चुके हैं।
सौ के करीब नेशनल-इंटरनेशनल स्पर्धा जीत चुके हैं। उन्होंने देश का गौरव बढ़ाया है और देश ने भी उन्हें पर्याप्त मान-सम्मान दिया है। वे 74 किलोग्राम वर्ग में रेसलिंग करते भी नहीं थे। इस बार 74 किलोग्राम र्शेणी में वे पहली बार आए थे। नरसिंह यादव का रिकार्ड भी शानदार है। वे 50 नेशनल व इंटरनेशनल टूर्नामेंट जीत चुके हैं। इस बार रियो के लिए उनका चयन भी मेरिट के आधार पर हुआ है। इसलिए सुशील ने नरसिंह के चयन को जिस प्रकार से मुद्दा बनाया और अदालत तक मामले को ले गए, वह उनके र्मयादा के अनुरूप कतई नहीं था।
उनका ताना मरना भी उनके मान के अनुकूल नहीं है। नरसिंह से सुशील वरिष्ठ भी हैं। इस नाते भी उनका दायित्व नरसिंह का हौसलाअफजाई करना था। पर सुशील जिस तरह सामने आए, उससे ऐसा प्रतीत हुआ कि वे सबकुछ अपने लिए ही चाहते, दूसरे को कोई स्पेस नहीं देना चाहते हैं। किसी भी खिलाड़ी में ऐसी सोच उभरना अच्छी बात नहीं है। यह खेल भावना नहीं है। निश्चित ही नरसिंह व उनके साथी के मामले में न्याय होना चाहिए। खेल के विकास के लिए जरूरी है कि वह स्वस्थ सपर्धा ही रहे, उसमें 'साजिश का खेल' ना हो।
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