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अविश्वास प्रस्ताव मामला: चुनौती स्वीकारे विपक्ष, संसदीय लोकतंत्र में होती है अहम भूमिका

बजट सत्र के दूसरे चरण के दौरान संसद की कार्यवाही सुचारू रूप से नहीं चल पा रही है। 15 दिनों से संसद में विधायी कामकाज अवरुद्ध है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से अलग हुई चंद्रबाबू नायडू की पार्टी टीडीपी ने संसद में अविश्वास प्रस्ताव लाने का ऐलान किया, जिसका कांग्रेस, वाम दल, राजद समेत कई दलों ने समर्थन किया।

अविश्वास प्रस्ताव मामला: चुनौती स्वीकारे विपक्ष, संसदीय लोकतंत्र में होती है अहम भूमिका

बजट सत्र के दूसरे चरण के दौरान संसद की कार्यवाही सुचारू रूप से नहीं चल पा रही है। 15 दिनों से संसद में विधायी कामकाज अवरुद्ध है। विपक्ष किसी न किसी बहाने सदन में हंगामा कर रहा है। अभी हाल में सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की कोशिश हो रही है। सबसे पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से अलग हुई चंद्रबाबू नायडू की पार्टी टीडीपी ने संसद में अविश्वास प्रस्ताव लाने का ऐलान किया, जिसका कांग्रेस, वाम दल, राजद समेत कई दलों ने समर्थन किया।

टीडीपी के बाद आंध्र प्रदेश की ही दूसरी पार्टी वाईएसआर कांग्रेस के मुखिया जगनमोहन रेड्डी ने भी अविश्वास प्रस्ताव पेश करने की कोशिश की। उसके बाद अब कांग्रेस ने भी 27 मार्च को सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की अनुमति मांगी है। हालांकि संख्या बल के हिसाब से राजग सरकार को कोई खतरा नहीं है। अगर अविश्वास प्रस्ताव आता भी है तो लोकसभा में सरकार के पास पूर्ण बहुमत है, और हालिया राज्यसभा चुनाव के बाद अब भाजपा उच्च सदन में भी सबसे बड़ी पार्टी बन गई है।

सच तो यह है कि विपक्ष संसद चलने ही नहीं दे रहा है। कभी कांग्रेस, तो कभी टीएमसी, वाईएसआर कांग्रेस जैसी पार्टियां अलग-अलग कारणों से सदन में हंगामा का खेल खेल रही हैं। सरकार की ओर से लगातार कहा गया है वह संसद में हर मसले पर चर्चा के लिए तैयार है, लेकिन विपक्ष की ओर से चर्चा में किसी की दिलचस्पी नहीं दिखती है। राजग से अभी-अभी अलग हुई टीडीपी, वाईएसआर कांग्रेस के बाद जब कांग्रेस पार्टी ने अविश्वास प्रस्ताव की धमकी सरकार को दी तो भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने चुनौती दी कि सरकार सामना करने को तैयार है, सरकार के पास पूर्ण बहुमत है।

सरकार हर मुद्दे पर बहस को राजी है, लेकिन विपक्ष सदन की कार्यवाही नहीं चलने दे रहा है। यह सही भी है। बजट सत्र के पहले चरण का अधिकांश समय भी विपक्ष के हंगामे की भेंट चढ़े। जब से राजग की सरकार केंद्र में आई है, कांग्रेस की संसद को बाधित करने की हर कोशिश रही है। यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। विपक्ष को सरकार की नीतियों की आलोचना करने का हक है, लेकिन संसद को बाधित करना कतई ठीक नहीं है। इससे जनता की गाढ़ी कमाई बर्बाद होती है।

विश्व में जितने भी लोकतांत्रिक देश हैं, उनमें से भारत में विपक्ष के हंगामे के चलते संसदीय कार्यवाही सबसे अधिक बाधित होती है। चुनाव दर चुनाव में मिल रही हार से विपक्षी दल अपनी कुंठा संसद में हंगामे के रूप में निकाल रहे हैं। अविश्वास प्रस्ताव लाने का कोई वाजिब कारण भी नहीं दिखता है। कानूनी रूप से बाध्य केंद्र सरकार अगर किसी राज्य को विशेष दर्जा नहीं प्रदान करने में सक्षम नहीं हो, तो *इसका मतलब कोई दल सरकार को अविश्वास प्रस्ताव लाने की चेतावनी दे, तो यह संघीय व्यवस्था का ही उल्लंघन है।

जहां तक कांग्रेस की बात है तो बार-बार मिल रही हार से लग रहा है कि उसने वजूद दिखाने के लिए संसद में हंगामे की राह चुनी है। विपक्ष में कोई भी हो, संसदीय लोकतंत्र में उनकी अहम भूमिका है। सरकार व विपक्ष के सहयोग से ही संसद के समय का देश हित में उपयोग हो सकता है। सरकार और विपक्ष दोनों इस बात को समझें। विपक्ष को हंगामे की राह पर चलने से कुछ भी हासिल *नहीं होने वाला है।

अविश्वास प्रस्ताव को राजनीतिक स्वार्थ पूर्ति का हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए। 26 मार्च से 6 अप्रैल के बीच बचे समय में संसद की कार्यवाही चलनी चाहिए, ताकि एक दर्जन से अधिक विधेयक पास हो सके।

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