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Nirbhaya Rape Case : अब न रुके दरिदों की फांसी

Nirbhaya Rape Case : दया याचिका के चलते विलंब होता है तो मौत की प्रतीक्षा कर रहे कैदी मानसिक रोगी हो सकते हैं? निर्भया कांड में दोषी विनय इसी कारण मानसिक रोगी हुआ है। मानसिक रूप से विक्षिप्त कैदी को फांसी की सजा देना उचित नहीं माना जाता। वास्तव में दया याचिकाओं पर अंतिम निर्णय में होने वाली देरी के लिए राष्ट्रपति और राज्यपाल जिम्मेदार होते हैं। ये दोनों ही पद संवैधानिक हैं।

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निर्भया के दरिंदों को फांसी तीन मार्च को दी जाना तो तय हो गई हैं, लेकिन एक आरोपी पवन गुप्ता के पास फांसी से बचने के दो विकल्प बाकी हैं। वह क्यूरेटिव याचिका और फिर उसके निपटारे के बाद राष्ट्रपति के पास दया याचिका दाखिल कर सकता है। इनके निराकरण के बाद ही फांसी की सजा पर अमल संभव होगा। सर्वोच्च न्यायालय ने भी कहा है कि दोषियों को कानूनी विकल्प मौजूद रहने तक सजा नहीं दी जा सकती है।

इधर एक अन्य दोषी विनय कुमार भूख हड़ताल पर है और उसे गंभीर बीमारी है। इसलिए इस अवस्था के चलते उसे फांसी पर नहीं लटकाया जा सकता है। हालांकि वर्तमान में देश में जो माहौल है और संसद में महिला सांसदों ने जो आक्रोश जताया है, उससे लगता है कि दोषियों को शायद कोई रियायत मिलेगी? राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति भी सजा में देरी को लेकर चिंता जता चुके हैं। यह सही है कि भारत की न्याय व्यवस्था अंतिम समय तक मृत्युदंड पाए दोषी को बचाव का विकल्प देती है, लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि मृत्युदंड को लंबे समय तक टाला जाए। लिहाजा अब इन दोषियों के वकीलों को भी यह सोचने की जरूरत है कि इनकी फांसी को लटकाने के उपाय करना, न्यायालय का समय जाया करने के अलावा कुछ नहीं है।

कानून तो सख्त बन गया, लेकिन परिणाममूलक नहीं निकला। जबकि बलात्कार और फिर हत्या के मामलों को जल्द निपटाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर त्वरित न्यायालय भी अस्तित्व में आ गए हैं। कई न्यायालयों ने ऐसे जघन्य अपराधों में निर्णय दो से चार माह के भीतर सुना भी दिए, लेकिन अपील के प्रावधानों के चलते, उच्च व उच्चतम न्यायालयों और फिर राज्यपाल व राष्ट्रपति के यहां दया याचिका दाखिल करने की सुविधा के कारण इन मामलों का वही हश्र हुआ, जैसा अमूमन सामान्य प्रकरण में होता है।

दरअसल जघन्य से जघन्यतम अपराधों में त्वरित न्याय की तो जरूरत है ही, दया याचिका पर जल्द से जल्द निर्णय लेने की जरूरत भी है। शीर्ष न्यायलय ने यह तो कहा है कि दया याचिका पर तुरंत फैसला हो, लेकिन राष्ट्रपति व राज्यपाल के लिए क्या समय सीमा होनी चाहिए, यह तय नहीं किया। क्योंकि अकसर राष्ट्रपति दया याचिकाओं पर निर्णय को या तो टालते हैं, या फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलते हैं। हालांकि महामहिम प्रणब मुखर्जी इस दृष्टि से अपवाद रहे हैं। राष्ट्रपति बनने के बाद अफजल गुरू और अजमल कसाब की दया याचिकाएं उन्होंने ही खारिज करते हुए, उन्हें फांसी के फंदे पर लटकाने का रास्ता साफ किया था। जबकि पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभादेवी सिंह पाटिल ने या तो दया याचिकाएं टालीं या मौत की सजा को उम्रकैद में बदला। यहां तक कि उन्होंने महिला होने के बावजूद बलात्कार जैसे दुष्कर्म में फांसी पाए पांच आरोपीयों की सजा आजीवन कारावास में बदली।

दरअसलदया याचिका के चलते विलंब होता है तो मौत की प्रतीक्षा कर रहे कैदी मानसिक रोगी हो सकते हैं? निर्भया कांड में दोषी विनय इसी कारण मानसिक रोगी हुआ है। मानसिक रूप से विक्षिप्त कैदी को फांसी की सजा देना उचित नहीं माना जाता। वास्तव में दया याचिकाओं पर अंतिम निर्णय में होने वाली देरी के लिए राष्ट्रपति और राज्यपाल जिम्मेदार होते हैं। ये दोनों ही पद संवैधानिक हैं, इसलिए अदालतें इन पर टिप्पणी करने में संवैधानिक मर्यादा का पालन करती हैं। संविधान के अनुच्छेद 72 और 161 के तहत राष्ट्रपति और राज्यपालों को दया याचिका पर निर्णय लेने का अधिकार मिला हुआ है। चूंकि ये देश और राज्यों के सर्वोच्च पद हैं, इसलिए संविधान निर्माताओं ने दया याचिका पर निर्णय को समय की सीमा में नहीं बांधा। हालांकि दया-याचिका पर कानूनी प्रक्रिया संवैधानिक व्यवस्था की बाध्यता के चलते महज कागजी खानापूर्ति भर है, लिहाजा इन सर्वोच्च पदाधिकारियों को भी अपनी जवाबदेही महसूस करने की जरुरत है, जिससे भविष्य में दया-याचिकाओं पर अनावश्यक विलंब न हो?

हालांकि किसी भी देश के उदारवादी लोकतंत्र में न्याय व्यवस्था आंख के बदले आंख या हाथ के बदले हाथ जैसी प्रतिशोघात्मक मानसिकता से नहीं चलाई जा सकती, लेकिन जिस देशों में मृत्युदंड का प्रावधान है,वहां यह मुद्दा हमेशा विवादित रहता है कि आखिर मृत्युदंड सुनने का तार्किक आधार क्या हो? भारतीय न्याय व्यव्स्था में लचीला रुख अपनाते हुए गंभीर अपराधों में उम् कैद एक नियम और मृत्युदंड अपवाद है। इसीलिए अदालतें इस सिद्धांत को महत्व देती हैं कि अपराध की स्थिति किस मानसिक परिस्थिति में उत्पन्न हुई? अपराधी की समाजिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक स्थितियों व मजबूरियों का भी ख्याल रखा जाता है। क्योंकि एक सामान्य नागरिक सामाजिक संबंधों की जिम्मेदारियों से भी जुड़ा होता है।

ऐसे में जब वह अपनी बहन, बेटी या पत्नी को बलात्कार का शिकार होते देखता है तो आवेश में आकर हत्या तक कर डालता है। भूख, गरीबी और कर्ज की असहाय पीड़ा भोग रहे व्यक्ति भी अपने परिजनों को इस जलालत की जिदंगी से मुक्ति का उपाय हत्या में तलाशने को विवश हो जाते हैं। जाहिर है, ऐसे मजबूरों को मौत की सजा के बजाय सुधार और पुनर्वास के अवसर मिलने चाहिए? क्योंकि जटिल होते जा रहे समय में दंड के प्रावधानों को तात्कालिक परिस्थिति और दोषी की मनोवैज्ञानिक स्थिति पर भी आंकना जरूरी है। परंतु बलात्कार और फिर महिला की हत्या भिन्न प्रकृति के अपराध हैं।

दया याचिका पर सुनवाई के लिए यह मांग हमारे यहां उठ रही है कि इसकी सुनवाई का अधिकार अकेले राष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र में न हो? इस बाबत बहुसदस्दीय जूरी का गठन हो। इसमें सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश, उप राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, विपक्ष के नेता और कुछ अन्य विशेषाधिकार संपन्न लोग भी शामिल हों? यदि इस जूरी में भी सहमति न बने तो इसे दोबारा अदालत के पास प्रेसिडेंशियल रेंफरेंस के लिए भेज देना चाहिए। इससे गलती की गुंजाइश न्यूनतम हो सकती है? इसके उलट एक विचार यह भी है कि राष्ट्रपति के पास दया याचिका भेजने का प्रावधान खत्म करके सुप्रीम्र कोर्ट के फैसले को ही अंतिम फैसला माना जाए? यह विचार ज्यादा तार्किक है, क्योंकि न्यायालय अपराध की प्रकृति, अपराधी की प्रवृति और परिस्थिति के विश्लेशण के तर्कों से सीधे रूबरू होती है। फरियादी का पक्ष भी अदालत के समक्ष रखा जाता है। जबकि राष्ट्रपति के पास एकांगी पहलू होता है? जाहिर है न्यायालय के पास ज्यादा साक्ष्यजन्य पहलू होते हैं। लिहाजा तर्कसंगत उदारता अदालत ठीक से बरत सकती है?

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