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मोदी के बयान के बाद, क्या राजनीति के शुद्धिकरण के लिए कठोर फैसले जरूरी

राजनीति के शुद्धिकरण को लेकर देश के भीतर बहस तो होती रही है परन्तु कभी भी राजनीतिक दलों ने इस दिशा में गंभीर पहल नहीं की।

मोदी के बयान के बाद,  क्या राजनीति के शुद्धिकरण के लिए कठोर फैसले जरूरी
नई दिल्ली. राजनीति के शुद्धिकरण को लेकर देश के भीतर बहस तो होती रही है परन्तु कभी भी राजनीतिक दलों ने इस दिशा में गंभीर पहल नहीं की। पहल की होती तो 2004 के मुकाबले संसद और उसके बाद हुए चुनाव में विभिन्न विधानसभाओं में दागी सांसदों और विधायकों की तादाद बढ़ती नहीं। 2009 में ऐसे 163 सांसद चुनकर लोकसभा पहुंचे थे, जिनमें से सत्तर से अधिक पर डकैती, अपहरण, हत्या, हत्या का प्रयास और बलात्कार जैसे जघन्य मामले अदालतों में लंबित थे। विधानसभाओं का भी बुरा हाल है।
संसद में यदि तीस प्रतिशत सदस्य अपराधी पृष्ठभूमि से हैं तो विधानसभाओं में यह आंकड़ा 31 प्रतिशत है। पिछले दिनों अभिनेता आमिर खान ने भी सत्यमेव जयते में इस अहम मुद्दे की तरफ देश का ध्यान आकृष्ट किया था। इस समस्या के दूसरे तमाम पहलुओं पर रोशनी डालते हुए उन्होंने प्रश्न खड़ा किया था कि यदि देश और प्रदेशों की कानून व्यवस्था को संचालित करने वाले और अपराधों को रोकने के लिए कानून बनाने वाले ही संदेह के घेरे में होंगे और वे दागी होंगे तो किस तरह का कानून बनाएंगे, यह बताने की जरूरत नहीं है।
पूरा देश इसका गवाह है कि दो-ढाई साल पहले इस देश में प्रभावी लोकपाल बिल की मांग को लेकर राष्ट्रव्यपारी आंदोलन चला, जिसमें अण्णा हजारे, स्वामी रामदेव, संतोष हेगड़े, अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण से लेकर किरण बेदी जैसे चेहरे शामिल हुए। इस कानून की मांग ने इसलिए जोर पकड़ा ताकि जनसेवकों के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जा सके। देश विदेश की अनेक संस्थाएं यह कह चुकी हैं कि भारत दुनिया के ऐसे देशों में शुमार है, जहां बिना लिए-दिए कुछ नहीं होता। जनप्रतिनिधियों की संपत्ति कई सौ गुणा बढ़ रही है।
राजनीति का अपराधीकरण और इसमें व्याप्त भ्रष्टाचार लोकतंत्र को भीतर ही भीतर खोखला करता जा रहा है। एक आम आदमी यदि चाहे कि वह चुनाव लड़कर संसद अथवा विधानसभा में पहुंचकर देश की ईमानदारी से सेवा करे तो यह आज की तारीख में संभव ही नहीं है। एडीआर ने जो तहकीकात की है, उसके हिसाब से तो कोई भी पार्टी ऐसी नहीं है, जिसके टिकट पर कोई दागी चुनाव नहीं लड़ रहा हो। यह अपने अपने में आश्चर्य का विषय है कि किसी भी राजनीतिक दल का कोई नेता अपने भाषणों में इस पर विचार तक जाहिर करना मुनासिब नहीं समझता।
सोमवार को भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी ने जरूर एटा (उत्तर प्रदेश) की सभा में कहा कि संसद और विधानसभाओं के शुद्धिकरण के लिए वे खास अभियान छेड़ेंगे। हाल में एक इंटरव्यू के दौरान भी मोदी ने कहा था कि प्रधानमंत्री बनने की सूरत में वे तमाम दागियों की सूची सुप्रीम कोर्ट को सौंपेंगे। अनुरोध करेंगे कि विशेष अदालतें बनाकर एक साल के भीतर उनके मामलों का निपटारा किया जाए ताकि अपराधियों को जेल भेजा जा सके और जिन पर मिथ्या आरोप हैं, उन्हें दोषमुक्त किया जा सके। निसंदेह यह अच्छी शुरुआत होगी परन्तु सबसे अहम सवाल यही है कि ऐसे लोगों को टिकट ही क्यों दिए जाते हैं?
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